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करवा चौथ-21 श्रेष्ठ नारीमन की कहानियां चंडीगढ़
Karwa Chauth-Nariman ki Kahaniyan

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

हर रोज़ सुबह सूरज की किरणें खिड़की से कूदकर नन्हें रखरगोश की तरह जब तक राधा के बिस्तर पर अठखेलियाँ न करतीं, तब तक राधा दड़ मारे पड़ी रहती या फिर श्याम बाबू जब तक उसे जादू की झप्पी न दे दें, तब तक तो कतई नहीं उठती थी। छोटी-सी गृहस्थी में वे दोनों अपने दो बच्चों के साथ इस तरह से रहते थे जैसे नीड़ में चिड़ा-चिड़िया अपने नन्हें नाजुक चिकलों के साथ रहते हैं। चिड़ा चुग्गा लाता तो चिड़िया अपने जिगर के टुकड़ों को खिलाती। सच, कुदरत की ये “मोह-लीला” ही तो परिवार को जोड़े रखती है।

मगर आज न तो हर रोज़ की तरह किसी नन्हें खरगोश ने उसके बिस्तर पर अठखेलियाँ की और न ही आज किसी ने उसे जादू की झप्पी दी। फिर भी वह पौ फटने से पहले ही उठ गई थी और चिरई-सी इधर-उधर फुदक भी रही थी। राधा का मन आज पुलकित व उमंगित था, बिलकुल नवयौवना-सा।

उठते ही उसने इष्टदेव को नमन किया। धरती को दायें हाथ से स्पर्श कर माथे से चुचकारा और फिर रसोई में से एक कटोरी-भर बाजरा लेकर दिनचर्या की भाँति कूलर पर रखे माटी के कसोरे में भर दिया। छज्जे पर बाट निहारते कबूतर पलक झपकते ही कूलर पर उतर आए और गुटर-पुटर की आवाजें करते, गोल-गोल चक्कर लगाते-लगाते दाना चुगकर अपनी खुशी जताने लगे। कूलर पर चुग्गा चुगते कबूतर नित्य सूर्यादय से पहले आकर हाँक-सी मारने लगते और थोड़ी-सी देर भी हो जाने पर तो उनकी गुट्टर गूं में क्रोध झलकने लगता था। क्या मजाल कि उन चार सदस्यों के अलावा कोई और परिन्दा अपना पँख भी कूलर से छुआ दे। उसे उड़ा कर वे दूर तक छोड़ कर आते थे।

तभी राधा की नजर पड़ोसी के छज्जे पर पड़ी तो उसने देखा कि वहा पर बैठे तीन कबूतर याचक दृष्टि से उसे निहार रहे हैं। मानो, कह रहे हों

“आज अपुन के लिए भी थोड़ा मेहरबानी हो जाए तो दिन अच्छा गुजर जाएगा।”

राधा ने मुट्ठी भर बाजरा लाकर चुपके से पड़ोसी के छज्जे पर फेंक दिया था। फिर क्या था, पड़ोसियों के मेहमान भी फुदकते-फुदकते अपने नाश्ते में व्यस्त हो गए थे। सचमुच प्यार व अधिकार की परिभाषा बड़ी जटिल है। सरकारी फ्लैट में दूसरी मंजिल पर बनी बालकनी में राधा ने अपने गमलों में तुलसी, गुलाब, मोगरा, गैंदा के बूटे व मनी प्लांट की बेल तो शायद यह सोच कर लगा रखी थी कि ज्यों-ज्यों मनी प्लांट बढ़ेगा त्यों-त्यों घर में पैसा भी बढ़ेगा। उसने अपनी फुलवारी में दो ताजा खिले हुए जुड़वाँ गुलाब देखे तो उनमें से एक में उसने श्याम की छवि देखी तो दूसरे में उसने स्वंय को महसूस किया। उसके होंठ खुशी में बुदबुदा उठे, “वाह! आज तो सचमुच बड़ा ही शुभ दिन है, प्रेम का प्रतीक।”

एक गुलाब राधा के मन-प्रांगण में भी खिला हुआ था। भीतर आकर राधा अपने नित्य कर्म में जुट गई। नहा-धोकर रसोई चमकाई। बच्चों का टिफिन तैयार कर, उनके बैग में डालकर बच्चों को नाश्ता खिला-पिला कर आज स्वंय ही उन्हें मन्दिर के सामने बने स्कूल बस स्टॉप पर उनकी बस में चढ़ा आई। वैसे तो बच्चों को छोड़ने श्याम बाबू ही जाया करते थे।

वापस घर लौटकर उसने मुख्य द्वार धोकर दरवाजे पर सतिया (स्वास्तिक चिन्ह) बनाया और फिर घर में बने मन्दिर की सफाई करके पजा अर्चना में लग गई। तुलसी व सूर्य को जल अर्पण कर वह श्याम के पैर छूने के लिए उनके पास गई तो श्याम बाबू के मुँह से यकायक निकल पड़ा, “अरे! आज सूरज पश्चिम से निकला है क्या जो हमारे पैर छुए जा रहे हैं? अरे भई आज तो हमारी मोटो बड़ी एनर्जेटिक लग रही है। सूरज के उगने से पहले ही उठ ली।”

“जी।”

“कमाल है! मैने तुम्हें मोटो कहा तो आज तुम चिढ़ी नहीं। पलट कर उत्तर भी नहीं दिया। अजब-गज़ब हो गया!”

राधा ने मुस्कुरा कर कहा, “इसमें गज़ब की क्या बात है जी। इस सच्चाई को मैं स्वीकार करती हूँ कि मैं मोटी हो चुकी हूँ।” श्याम हैरानी से, “कल शाम को तो तुम इसी बात पर मुहँ बना बैठी थी और तुमने आवेश में आकर यह भी तो कहा था कि मैं ऐश्वर्या राय से कम नहीं हूँ।” बस देखने वाले की नज़र चाहिए।

राधा पहले तो मुस्कुरा दी और फिर कहा, “हाँ, मगर वो तो वैसे ही पागलपन में…”

श्याम बाबू ने उसे छेड़ते हुए कहा, “जय हो राधे-राधे। फिर अट्ठाहस के साथ” काश! “तुम स्वीकार कर लो कि तुम में पागलपन है।”

“जी, वो तो है।”

“सच्ची! हाय! फिर काहे का झगड़ा गोरी, फिर काहे का बैर। जीवन धन्य है राधे, जीवन धन्य है,” कहते हुए श्याम बाबू ने बिस्तर से पाँव नीचे धरे तो राधा ने झट से उन्हें टोक दिया, “ठहरो! आप बैठे रहिए। मैने पीने के लिए गुनगुना पानी कर रखा है।”

श्याम बाबू ने राधा के बर्ताव पर मुग्ध होकर उसका हाथ पकड़ अपनी ओर खींचा तो राधा हाथ छुड़ा कर ये कहती हुई रसोई की तरफ चली गई, “सुबह-सवेरे कुछ और नहीं सूझता। भगवान का नाम लिया करो। दिन अच्छा गुजरेगा।”

“अरे भई, आज सुबह-सुबह तो केवल तुम्हारी भक्ति करने का मूड है।”

राधा ने पीने के लिए गुनगुना पानी जैसे ही श्याम बाबू को दिया तो श्याम बाबू की नजरें राधा के मेंहदी भरे हाथों पर जा पड़ी। वे पूछ बैठे, “अरे मेंहदी रचा रखी है! मेंहदी रचाने को कैसे मन कर गया तुम्हारा?”

राधा ने खुशी जाहिर करते हुए कहा, “जी, वो आज करवा चौथ है न, इसलिए।”

“ओह! यानि साल में एक बार आने वाला दिन।” राधा ने तब मुस्कुराकर श्याम की ओर देखकर जवाब दिया, “मेरा तो हर दिन ही करवा चौथ है जी।” लेकिन भाग्यवान, मेरा साल में एक दिन। और फिर वे दोनों एक-दूसरे की आंखों में देखते-देखते ठहाका मार कर ज़ोर से हँस दिये थे।

“चलो उठो जी, नहा-धो लो। मैंने बाथरूम में तौलिया, बनियान तुम्हारा अण्डरवियर सब टांग दिए हैं और हाँ, शूज भी पॉलिस कर दिए हैं। “मेरे उठने से पहले बच्चे स्कूल चले गए। पता भी न चला सब काम आगे से आगे, सचमुच तुम बहुत अच्छी बीबी हो मोटो। परन्तु, आज अपनी खुशनसीबी पर…”

इतने में राधा पूछ बैठी, “पर…क्या?” श्याम बाबू ने झट से कहा,

“श…अ…अ…क…शक हो रहा है।”

और फिर श्याम ने तुरन्त टॉयलेट का दरवाजा बन्द कर लिया था। इधर राधा नाश्ता व लंच तैयार करने में जुट गई थी। नाश्ते में उसने श्याम बाबू की पंसद का विशेष ध्यान रखते हुए देसी पिज्जा बनाया और टिफिन में आलू की चटपटी सब्जी व चार नरम-नरम पूड़िया पैक कर दीं। नहा-धोकर श्याम बाबू जब टेबल पर आए तो अपनी पसंद का नाश्ता देखकर चहक उठे,

“भई राधा! आज तो सचमुच मजा आ गया। देसी पिज्जे की खुशबू रोम-रोम में पहुंच रही है बगैर खाए ही।”

नाश्ता करते-करते श्याम बाबू को कुछ स्मरण हो आया तो उन्होंने पूछ लिया, राधा से, “राधा! शर्मा जी को तुम्हारा देसी पिज्जा काफी पसंद आया था। याद है न. जो तमने उस दिन घर पर खिलाया था उन्हें। वो कह रहे थे भाभी से पूछना, देसी पिज्जा कैसे बनाते है?”

“इसमें क्या मुश्किल है! एक कटोरी बेसन में एक शिमला मिर्च, एक प्याज, पाँच-सात हरी मटर, दो हरी मिर्च और नमक स्वादानुसार डालकर घोल तैयार कर लो फिर नॉन स्टीक तवे पर घोल फैला दो और देसी घी से दोनों तरफ से परांठे की तरह सेंक दो और लो हो गया देसी पिज्जा एकदम स्वादिष्ट तैयार।”

“बस-बस, अरे और न कहो, तुम्हारा व्रत है, कहीं तुम्हारे मुंह में पानी आ गया तो पिज्जा खाकर ही संतुष्टि मिलेगी तुम्हें और फिर व्रत तुड़वाने का पाप मेरे सिर मढ़ा जाएगा।”

राधा मुस्कराकर रह गई थी। थोड़ी ही देर में श्याम बाबू एक हाथ में टिफिन लिए तो दूसरे हाथ से राधा को बाय-बाय कहते हुए सीढ़ियाँ उतरते-उतरते दफ्तर के लिए निकल लिए थे। राधा दरवाजा बंद करके सीधा बालकनी में आ गई थी और श्याम बाबू को स्कूटर स्टार्ट करते हुए देखने लगी। श्याम बाबू ने जैसे ही ‘क्लेचर’ मरोड़ा, स्कूटर ने अपनी गति पकड़ी और देखते ही देखते श्याम बाबू राधा की आँखों से ओझल हो गए। भीतर को मुड़ते वक्त राधा की नजर अपनी पड़ोसन निशा पर जाकर ठहर गई, जो उसे देखकर मुस्कुरा रही थी।

दोनों की नजरें मिलते ही निशा राधा से पूछ बैठी, “अरे! झाडू-पोछा तो सवेरे-सवेरे ही कर लिया तुमने।

“हाँ दीदी, वह तो हो गया था पर कपड़े व बर्तन तो अभी बाकी है।”

“राधा! आज कपड़े मत धो।”

“मगर क्यों?”

“अरे, नाहक थक जाओगी। सारा दिन भूखा जो रहना है। राधा ने भोलेपन से कहा, “दीदी, व्रत-त्योहार से दिनचर्या के काम-काज थोड़े ही न रुकते हैं।”

इस पर निशा ने पूछ लिया, “कितने बजे उठी थी सुबह?”

“जी, साढ़े चार बजे।”

“सर्गी कितने बजे खाई तुमने?”

“हमारे यहाँ सर्गी खाने का रिवाज नहीं है। जो रात को खाया, बस वही।”

राधा ने जबाब दिया तो निशा ने समझाते हुए प्रत्युत्तर “लेकिन वो तो शुभ होती है।” मैंने कहा, “यह पता नहीं दीदी, पर न तो मेरे मायके में और न ही ससुराल में कोई सर्गी का रिवाज है। इसलिए मैंने भी कभी नहीं ली।”

“अरी, आजकल तो फिल्मों में भी खाते हैं।”

“फिल्मों ने तो इंसान को न जाने क्या-क्या खाना सिखा दिया है।” राधा की बात से निशा सहमत हुई तो दोनों हँस बैठीं। फिर राधा ने वार्तालाप को विराम लगाते हुए कहा, “अच्छा तो मैं अपना काम निपटा लेती हूँ, काम करके फिर मिलते हैं।”

“मेरी काम वाली तो अभी तक नहीं आई। मैं तो बैठी-बैठी उसका इन्तज़ार कर रही हूँ। वो आए, सफाई करे तो मैं नहा-धो कर पूजा करूं।” राधा भीतर आई, टेपरिकार्डर में कैसेट लगाई, गाने के बोल थे।

“झिलमिल सितारों का आँगन होगा, रिमझिम बरसता सावन होगा।” गाने की धुन पर गुनगुनाती, थिरकती हुई वह सारे बर्तन व कपड़े कब धो बैठी, इसका उसे भी खुद पता नहीं चला। उसके बाद कपड़े सूखाने के लिए राधा बालकनी आई तो उसने देखा कि निशा अभी भी काम वाली के इन्तज़ार में बैठी थी।

उसे कपड़े झाड़ते देखकर निशा से रहा नहीं गया। उसने पूछ लिया, “धो लिए तुमने कपड़े?” “दीदी, आज नहीं तो कल तो धोने ही थे, आज नहीं धोती तो कल डबल हो जाते।”

निशा ने मशविरा देते हुए कहा, “वॉशिंग मशीन क्यों नहीं ले लेती हो। हफ्ते में दो बार धो लो बस और यदि न भी धो पाओ तो मशीन में डाले रखो। किसी को क्या पता चलता है कि घर में मैले कपड़े हैं भी या नहीं।

“क्या करना है वॉशिंग मशीन का? मुझको ऑफिस थोड़ा ही न जाना है और फिर अभी तक तो ज़रूरत महसूस नहीं हुई।”

निशा ने उसे फिर अपने विश्वास में लेते हुए कहा,

“राधा! सोम्या के पापा ने यह अंगूठी गिफ्ट करी है मुझे सवेरे-सवेरे। डिज़ाइन कैसा है? देखो तो और हाँ, तू तो बतला तुझे आज क्या गिफ्ट मिला?”

“अँगूठी का डिज़ाइन तो नहीं दिख रहा है, लेकिन यह जरूर पता चल रहा है कि अंगूठी नई है।”

“अच्छा! नहीं दिख रहा है डिज़ाइन तो दरवाज़ा खोल अपना, मैं आकर दिखाती हूँ।”

“इसकी नई चीज़ दिखाने की यह आदत कब छूटेगी, पता नहीं! अब सवेरे-सवेरे दिमाग चाटेगी। जब तक दो-चार लोगों को अपनी अंगूठी दिखा न लेगी चैन ही नहीं आएगा।” राधा ने मन ही मन ऐसा सोचते हुए दरवाजे की चिटकनी खोली तो निशा ने उसके घर में प्रवेश करते ही कहा, “ले… देख ले अंगठी। बिलकल नया डिजाइन है कि नहीं।

“अच्छा, अन्दर तो आओ।”

राधा के आग्रह पर निशा कुर्सी पर बैठ तो गई पर जब उसने मेंहदी रचे हाथ देखे राधा के तो उसे फटकार बैठी।

“ये क्या राधा? गवारों की तरह हाथ भर रखे हैं। झाडू की सींक से लगाई है क्या मेंहदी?”

“हाँ दीदी! क्योंकि मुझे कुप्पी बनानी ही नहीं आती।”

“और ये क्या? हाथ में देहातियों की तरह चाँद-सूरज बना रखे हैं, दादी-परदादी के जमाने की तरह। तू तो ख्वाहमख्वाह छोटा-मोटा लोभ करती है। बरस भर का त्योहार है, बाज़ार में लड़कियाँ बैठी होती हैं मेंहदी रचाने के लिए। एक से बढ़कर एक डिज़ाइन, राधा तू भी बड़ी भोली है।

राधा ने अपने चिरपरिचित अंदाज़ में कहा, “दीदी! बाहर जाने की तो छोड़ो, मुझे तो रात को एकदम से याद आया कि मेंहदी लगानी है। बस उसी वक्त मैंने रात को मेंहदी घोली और एक घण्टे के बाद लगा ली।” इतने में सीढ़ियों से हँसने की आवाजें आई। देखते-देखते राधा की डोरबेल बजी। राधा ने दरवाज़ा खोलते ही पल्लवी, रूही का स्वागत अपनी बाँहे फैलाकर किया और फिर सभी ने एक-दूसरे को करवा चौथ बधाई दी।

भीतर कुर्सी पर बैठते ही शुरुआत होने लगी थी, एक दूसरे की खूबसूरती और लुभावनेपन की राधा ने पल्लवी की तारीफ करते हुए कहा, “चमाचम लग रही हो पल्लवी, आज तो भाई साहब पर बिजलियाँ गिराने का इरादा लगता है।”

सुनकर पल्लवी खिलखिला उठी तो रूही ने झट से कहा, “मैंने तो सुबह-सवेरे ही गिरा दी।” राधा ने तुरन्त उसे छेड़ते हुए कहा, “ये काम तुमसे बढ़कर भला कौन कर सकता है? चौबीस घण्टे तैयार रहती है बिजलियाँ गिराने को।”

सब सहेलियाँ ठहाका मारकर हँसी तो उसकी गूंज नीचे सीढ़ियों तक भी पहुंच गई थी। पल्लवी ने महसूस किया कि राधा ने कुछ नया नहीं कर रखा। वह आज भी सिम्पल ही लग रही थी तो उससे रहा न गया, “राधा तुमने तो आई-ब्रो भी नहीं बनवाई।”

“बच्चों के ‘एग्जाम’ जो चल रहे हैं। ‘होम-वर्क’ इतना था कि वक्त ही नहीं मिला. जाने का।” तभी रूही बोल उठी. “आज तो पार्लर में पैर रखने की भी जगह नहीं होगी, कल ही इतना बुरा हाल था। बाप रे! रेट भी तो डबल हैं हर चीज़ के।” राधा ने चकित-सी होकर पूछ लिया, “किस चीज़ के डबल रेट हैं?” जवाब में, रूही ने अपनी बॉड़ी पर कराये गए सारे प्रयोगों का सक्षमता से बयान करना शुरू कर दिया था, “वैकसिंग के 400 रुपये, फेशिएल के 700 रुपये, कटिंग के 500 रुपये तो कलरिंग के भी 350 रुपये हैं, इसके अलावा पैडीक्योर, मैनीक्योर व मसाज के रेट भी और दिनों के मुकाबले डबल हैं।”

राधा ने हैरानी से पूछा, “फिर तो हज़ार के नोट को भेंट चढ़ाकर आई होगी।”

रूही अपने दिल को कहाँ रोक पाई थी, “दो-तीन हज़ार नहीं, पूरे चार हज़ार लगे, पार्लर से आते वक्त बाहर मेन गली में मेंहदी वाली भी तो बैठी थी। लौटते वक्त हमने मेंहदी भी तो लगवाई थी। कोहनी तक मेहंदी बनवाने में 400 रुपये लेती है, सो वो भी लगवा ली, चाहे तो पल्लवी से पूछ लो, ये भी मेरे साथ ही करवा के आई है सब कुछ।

तभी पल्लवी ने झट से हाँ में हाँ मिला दी। निशा ने पूछ ही लिया, “तुम कौन से पार्लर जाती हो?”

रूही ने तपाक से जवाब दिया, “पैरिस ब्यूटी पार्लर।”

“अच्छा वो जो छोटा-सा सीढ़ियाँ चढ़ कर है।” पल्लवी बीच में कूद पड़ी, “हाँ, हाँ वो ही” निशा ने उन्हें आगाह करते हुए कहा, “वो सब तो घटिया है, ठीक से मसाज भी नहीं कर सकते, मैं तो पैराडाइज में जाती हूँ। वहाँ मसाज करने वाली लड़कियाँ एक्सपर्ट हैं। इतनी अच्छी बॉडी मसाज करती हैं कि सारी थकान दूर हो जाती है।”

राधा मन ही मन सोचने लगी, “सत्तासी किलो वजनी देह पर जब रगड़ाई होगी तो मज़ा तो अपने आप ही आएगा।”

राधा को तब पल्लवी ने झकझोरते हुए पूछ लिया था, “मैडम! कहाँ खो गई?”

राधा ने जवाब दिया, “हाय! तुम कितनी सुन्दर लग रही हो, काश मैं भी तुम्हारी तरह होती।”

यह सुनकर उसे रूही ने आश्वस्त करते हुए कहा, “अब भी देर नहीं हुई, पार्लर खुले हैं।”

सब हँस दिये। फिर निशा ने बात को आगे बढ़ाते हुए शाम को बनने वाले व्यंजनों की सूची ‘डिस्कस’ करनी शुरू कर दी। बतलाते-बतलाते वे आपस में पूछ बैठी कि शाम को क्या बनेगा? चाँद निकलने पर क्या पहनेगी इत्यादि-इत्यादि मसलों को हल करते-करते एक घण्टा कब व्यतीत हो गया, उन्हें कुछ पता ही नहीं चला। बस, फिर उनके चलने की तैयारी हुई तो थोड़ी देर बाद राधा घर पर अकेली थी। तन्हाई में वह अपने आप से बतियाने लगी, “पिछली करवा चौथ पर श्याम बाबू दूसरे कमरे में बच्चों के साथ ही सो गए थे और मैं अकेली बिस्तर पर देर रात तक जागती रही थी, मुझे अपने लुक्स पर ध्यान देना चाहिए।”

उसने फिर से अतीत के पृष्ठों को अपने मस्तिष्क में पलटा तो उसे याद आया वो वाकया जब श्याम बाबू टी.वी. देखते वक्त उछल पड़े थे, “हाय बिपासा! तू बड़ी सैक्सी और स्टाइलिश है, तेरे आगे से हटने को मन ही नहीं करता।”

इस तरह से श्याम बाबू ने फिल्म देखते-देखते बिपासा बसु की तारीफ़ की थी, तो राधा के दिल पर छुरा-सा चल गया था, मगर राधा ने तब कुछ भी नहीं कहा था। राधा को यह भी याद आने लगा था कि एक दिन जब उसने चटख लाल रंग की लिप्सटिक लगाई थी तो श्याम बाबू ने उसे टोकते हुए अप्रत्यक्ष रूप से बेइज्जत ही कर दिया था।

“ये क्या राधा? होंठ लीप लिए हैं, इसमें तुम ज़रा भी अच्छी नहीं लग रही हो।”

तब राधा ने शर्मिन्दा-सी होकर कहा था, “बिपासा बसु भी तो लाल रंग की लिस्टिक लगाती है।”

“वो तो सांवली सलौनी है, उस पे सब जचता है, राधा, तुम तो सादगी में ही अच्छी लगती हो।”

राधा वर्तमान में लौटते हुए बड़बड़ाने लगी थी, “मेरी सादगी से खर्चा जो बचता है। कोई बीबी को अंगूठी दे रहा है तो कोई शॉपिंग के लिए पैसे यहाँ तो बिन्दी तक लेने के लिए भी पैसे हाथ पसारे बगैर नहीं मिलते। कितनी सफाई से मुझे बेवकूफ बनाते हैं, जैसे मैं नासमझ हूँ।”

राधा के मन में अब कोहरा-सा छाने लगा था, जिसमें श्याम बाबू धीरे-धीरे राधा को धंधले नजर आने लगे उनकी छवि अब राधा की नजरों में धूमिल होने लगी थी। राधा ने पूरे इरादे से उठकर अपना पर्स देखा तो उसमें सिर्फ 50 रुपये का नोट ही पड़ा था। राधा नोट को देखकर एकदम ठण्डी पड़ गई और ये नोट भी तो वो नोट था जो सुबह जाते वक्त श्याम बाबू ने सब्जी खरीदने के उसे लिए दिया था। वह मायूस हो वहीं ओंधे मुँह फिर से बिस्तर पर पसर गई। फिर अपनी किस्मत को कोसती हुई पिता को दोष दे बैठी।

“काश! पिता जी दसवीं के बाद पड़ोस के गांव पढ़ने भेज देते तो आज कहीं नौकरी करके अपने शौक तो पूरे कर लेती या फिर पिता जी ऐसे दामाद को ढूंढ़ते जो अपनी बीवी के शौक पूरा करने का माद्दा रखता हो। यहाँ तो आई-ब्रो या कभी ब्लीचिंग करवाने के लिए भी कहूँ तो साहब कहते हैं। – क्या राधा! तू किन चौंचलों में पड़ गई? ऐसे ही ज्यादा अच्छी लगती हो। हूँ, चौंचले कहते हैं और बाहर जब कोई खूबसूरत लड़की इनकी बगल से भी गुजरे तो साहब की नज़रें ठोकर खाकर ही उससे हटती हैं।”

राधा को जब अपनी बेचैनी बढ़ने का एहसास हुआ तो मन को संतुलित करने के लिए वह टी.वी. ऑन करके बैठ गई। स्क्रीन पर शहनाज हुसैन ब्यूटी टिप्स देती हुई नज़र आई। वो कह रही थीं, “वैकशिंग और मसाज कराने के लिए एक्सपर्ट के पास ही जाएं, स्वयं पर घर में न आजमाएं। नहीं तो त्वचा पर ‘रिकलज’ पड़ सकते हैं।”

राधा बुदबुदाई, लीजिए टी.वी. पर भी पार्लर खुल गया, जिसे मैं सिर्फ देख ही सकती हूँ और फिर उसने रिमोट का बटन दबा कर चैनल बदला तो दूसरे चैनल पर ब्यूटीशियन फेशियल कराने पर पुरज़ोर नसीहत दे रही थी। राधा ने चिढ़ते हुए टी.वी. ही बन्द कर दिया था। फिर पार्लर जाने का पक्का इरादा कर, लम्बी सांस छोड़ती हुए व कुर्सी पर से एकदम उठी और गोदरेज की ‘एलमीराह’ खोलकर उसमें से दो सोने की टूटी हुई लौंग निकाली। उन्हें अपने पर्स में डाला और स्लीपर पहन कर, अपना दुपट्टा गले में डालती-डालती घर को ताला लगाकर जल्दी-जल्दी सीढ़ियाँ उतरती हुई पहुँच गई, भोला ज्वैलर्स के पास। भोला ज्वैलर ने अपनी ग्राहक का अभिनन्दन करते हुए कहा, “आइए, बैठिए, बताइए क्या सेवा करें आपकी।”

राधा ने पर्स से लौंग निकाली और बगैर तोल-मोल किए सीधे पैसे की बात करने लगी-

“इनके कितने पैसे दोगे?”

“सात सौ रुपये बनेंगे।”

“सात सौ, चलो सात सौ ही दे दो।”

राधा को पैसे देने के बाद भी ज्वैलर उसे तब तक देखता रहा, जब तक कि वो उसकी आंखों से ओझल नहीं हुई। अब राधा के पैरों में इतनी गति आ गई थी कि वह पेराडाईज ब्यूटी पार्लर की सीढ़ियाँ नापती हुई उसके अन्दर पहुँच गई। वहाँ भीड़ को देखकर राधा के माथे पर परेशानी की सिलवटें पड़ने लगीं। वह सोचने लगी कि ‘अब पैसे हैं तो नम्बर नहीं आएगा।’ उसकी नज़रें एक बार तो ज़मीन में गड़ गई थीं। लेकिन सुन्दर बनने की प्रबल भावना के आगे उसे धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य लगने लगा। जब कि वह मन ही मन में स्वीकार कर रही थी कि यह खुलापन उसे पसन्द नहीं। कहीं पर अर्धनग्न अवस्था में बॉडी मसाज चल रही थी तो कहीं केवल कहने भर को पर्दा। जिस्म-नुमाइश का मेला-सा लगा हुआ था। महिला तो थी ही लेकिन सत्रह-अठारह साल की स्कूल गोइंग लड़कियाँ भी कम उमंगित नहीं थीं। उनका उत्साह तो विवाहिता महिलाओं से भी ज़्यादा बना हुआ था। वो भी बाँहों, टाँगों की मसाज व वैक्सिग के अभियान में ‘आह, ऊफ्फ’ की आवाजें निकाल रही थी। कहीं कटिंग-कलरिंग तो कहीं पैडीक्योर, मैनीक्योर यानि हाथ-पैर साफ करने का अभियान जोरों पर था, तो कहीं फेशियल-ब्लीच के लिए चेहरे पर जबरदस्त रगड़ाई चल रही थी। सबको सुन्दर दिखने की होड़-सी लगी हुई थी। राधा ने कुछ देर बाद पार्लर की मालकिन से गुहार लगाई कि उसके बच्चे स्कूल से आएंगे, यदि उसको पहले ‘अटैण्ड’ कर ले तो! पार्लर की मालकिन ने उसे निराश करते हुए कहा था कि “मैडम, पार्लर में जितनी भी कस्टमर हैं, उनका आज कहीं न कहीं इन्तज़ार ही हो रहा है। आज किसी को भी फुर्सत नहीं है।”

निराश मन से राधा ने भाँप लिया था कि दो-तीन घण्टे से पहले दाल नहीं गलेगी, उसके मन में फिर विचार आया कि चल, दूसरे पार्लर में चल, कोई एक ही पार्लर थोड़े ही न है शहर में”

वह आठ-दस दुकानें छोड़कर दूसरे पार्लर पहुँची तो देखा कि वहाँ पर भी ‘हाऊस फुल’। राधा बगैर वाद-संवाद किए अपना मन मसोसकर सीधा बाहर आ गई और लटके हए चेहरे से छोटे-छोटे कदम धरती. कहीं ठोकर खाती तो कहीं रोड़ पर चलती रिक्शा से टकराते-टकराते बचती, अपने फ्लैट तक पहुँच ही गई। फिर ताला खोलकर ज़ोर से दरवाज़ा बन्द करते हुए सोचने लगी कि उसके खूबसूरत बनने के भी सारे दरवाजे बन्द हो चुके हैं। राधा हारे हुए योद्धा की भाँति बिस्तर पर पसरते ही सोच में डूब गई और फिर न जाने क्या सोचते सोचते उसकी आँख लग गई। दो बजे घर की डोरबेल बजी तो उसने हड़बड़ाहट में उठकर दरवाज़ा खोला। उसकी नौ साल की बेटी पारूल ने तब गुस्से में पैर पटक कर उसे डाँटते हुए कहा, “क्या मम्मा! कितनी बार बैल बजाई दरवाज़ा जल्दी क्यों नहीं खोला? सो रहे थे क्या?”

राधा ने अपनी बिटिया के प्यार व गुस्से के मिले-जुले रूप को बड़ी सहजता से स्वीकारते हुए जवाब दिया, “आई एम सॉरी बेटा, मैं सचमुच में सो गई थी।” सात साल का बबलू झट से कहता है, “मैने तो दरवाजे पर अपनी वॉटर-बॉटल मारी थी, बेल नहीं बजाई।”

राधा ने उसे भी “सॉरी” कहकर पीछा छुड़ाते हुए उन दोनों का बैग व बॉटल संभाली। फिर उसने रोज़मर्रा की तरह उनका मुंह धुलाकर, उन्हें खाना खिलाया और फिर एक घण्टे के लिए सुला दिया। फिर स्वयं भी आराम मुद्रा में आ गई थी। चार बजे उठकर वह फिर करवा चौथ व्रत की कथा की तैयारी में जुट गई। खुद को सजा कर उसने अपनी थाली सजाई। करवा पानी का भर, ज्योत जलाकर, फल-फूल नैवेद्य से कथा करने ही लगी थी कि डोर बेल बज उठी। उसने “मैजिक आई” से देखा कि पड़ोसन निशा है तो भी अनजान बनते हुए दरवाज़ा नहीं खोला और कथा करने बैठ गई। बच्चे बैड पर लेटे-लेटे सब विधिवत व्रत-पूजन देख रहे थे।

शाम हुई तो श्याम बाबू आए। राधा सजने-सँवरने पर भी उदास-सी लग रही थी। श्याम बाबू ने चकित-सा होते हुए पूछ लिया, “राधा! तबियत तो ठीक है तुम्हारी?” राधा के मुँह से निकल गया, “हाँ, तबियत को क्या होना है भला और तबियत ठीक भी न हो तो तुम्हारी गृहस्थी के कौन से काम रुक जाएंगें।”

“लगता है ज्यादा ही काम कर लिया आज। चलो तुम बैठो, मैं चाय बनाता हूँ।” राधा ने मुँह बनाते हुए जवाब दिया, “बस, बस, रहने दो, चाय बनाकर मुझ पर एहसान मत करो। मैं चाय बनाकर मर थोड़ी ही न जाऊंगी।”

श्याम बाबू ने राधा के गिरगिट से रंग बदलते स्वभाव को देखते हुए सोचा कि “क्या ये वो ही राधा है जो सुबह थी।” उन्होंने बात को आगे न बढ़ाते हुए कह दिया, “चलो जी, आपकी जो इच्छा और वे बालकनी में बैठे चाय का इन्तज़ार करने लगे। राधा एक प्याली चाय हाथ में लिए हाज़िर हुई तो श्याम बाबू अचानक पूछ बैठे,

“औ…और तुम्हारी चाय।”

“जैसे तुम्हें मालूम ही नहीं कि आज करवा चौथ है।”

“अरे भई! मैं तो भूल ही गया था। फिर आज चाय का मज़ा इतना नहीं आएगा, ” जवाब में राधा ने त्यौरी चढ़ाते हुए कहा, “क्यूँ, आज मैंने चाय में मीठा नहीं डाला क्या?”

“बस ज़रा मुस्कुरा दीजिए, मीठा नहीं भी डाला होगा तो भी चाय में मिठास आ जाएगी।”

मगर राधा को श्याम बाबू के हँसी-मखौल से कोई लेना-देना नहीं था। तभी घर के सामने वाली सड़क पर साइकिल चलाती पारूल को एक मोटर साइकिल सवार टक्कर मार गया। पारूल साइकिल के नीचे और साइकिल उसके ऊपर। श्याम बाबू ने ये दृश्य अपनी आँखों से देखा तो झट से दरवाज़ा खोला और हड़बड़ा कर सीढ़ियाँ फलांगते-फलांगते पारुल को साइकिल के नीचे से निकालने में लग गये। रोड पर पड़ी बजरी सिर में चुभने से पारूल की बाई कनपटी से लहू बह रहा था। गहरा जख्म देखकर श्याम बाबू ने हेलमेट व पर्स माँगने के लिए बैल बजाई। राधा ने बालकनी से नीचे झाँका तो वह जड़-सी हो गई। पल भर को तो वह समझ ही नहीं पाई कि ये क्या हो गया? राधा ने फिर घबराते हुए श्याम बाबू से पूछा, “क्या लाऊं?”

श्याम बाबू ने दोहराया, “हेलमेट और स्कूटर की चाबी लाओ और हाँ पर्स भी, जल्दी करो।”

राधा ने पर्स उठाकर टटोला तो देखा कि उसमें तो डॉक्टर के लायक पैसे हैं ही नहीं। कम पैसे होने पर उसने अपने पर्स में रखे सात सौ रुपये श्याम बाबू के पर्स में डाले और फटाफट नीचे उतर आई। बबलू को अपनी पड़ोसन निशा के पास छोड़कर दोनों फटाफट स्कूटर पर बैठ पारूल को पास ही के प्राईवेट डॉक्टर के पास ले गये।

डॉक्टर ने जाते ही बच्ची को ‘अटैण्ड’ किया टीका लगाया। चार टाँके आए और पट्टी कर दवा दे दी। काउन्टर पर ‘रिशेप्शनिस्ट’ ने आठ सौ रुपये का बिल श्याम बाबू को थमा दिया तो श्याम बाबू ने चोर मन से बटुए को निहारा। देखा कि उसमें सौ-सौ के 9-10 नोट हैं जबकि उनको पूरी तरह से याद था कि उसमें तो सिर्फ दो सौ या तीन सौ रुपये ही पड़े थे। विचार तन्त्र का एहसास हुए बगैर उन्होंने झट से 800 रुपये की पेमेंट की और घर के लिए चल दिये।

घर आकर श्याम बाबू ने कहा, “राधा ज़्यादा परेशान होने की ज़रूरत नहीं, तुम बच्ची को सम्भालो, मैं अभी आता हूँ।” कहकर श्याम बाबू फिर से स्कूटर पर कहीं चले गये। राधा तो हैरान होकर सोचती रह गई थी कि आखिर कहाँ गए? राधा बच्ची की बगल में लेट कर उसे लाड़-प्यार करते हुए मन ही मन सोचने लगी कि आज के शुभ दिन ये कैसा अमंगल था? थोड़ी ही देर बाद श्याम बाबू ने दो-तीन पैकेट लिए घर में प्रवेश किया और राधा को कहने लगे, “ए.टी.एम से पैसे निकालने गया था तो आते वक्त बाज़ार से सब्जी-पूरी और मिठाई भी ले आया हूँ। एक तो तुम्हारा व्रत, उस पर यह परेशानी! तुम नाहक ही रसोई में परेशान होती।”

राधा ने श्याम बाबू के प्यार को अन्तर्मन से महसूस किया तो उसकी आंखें छलक उठीं। पारुल ने खिड़की से चाँद को निकलते देखा तो उसने आवाज़ लगाई, “मम्मा देखो! चाँद निकल आया है। जाओ छत पर, पापा और चाँद की पूजा करने जाओ।” राधा अपनी फूल-सी बिटिया का माथा चूमते हुए कह उठी थी, “हाँ जी बिटिया और फिर राधा अपना शादी का जोड़ा पहनकर सजने-संवरने लगी तो श्याम बाबू ने उसे निहारते हुए कहा, “तुम आज भी मुझे वैसी ही लग रही हो जैसी कि उस दिन थी, जब तुमने पहली बार अपने मेंहदी भरे पाँव इस घर में रखकर मेरे मन के सूने आँगन में खुशबू बिखेरी थी।” राधा बीच में ही बोल पड़ी, “आज भी वैसी क्या….?”

श्याम बाबू झट से कहा, “जो पागल कर दे”

राधा के चेहरे पर सुबह की सी लालिमा पल भर को दमकी दोनों छत पर गये, चन्द्रमा को अर्घ्य देकर राधा ने श्याम बाबू की पूजा की, टीका लगाया, आरती उतारी और फिर पैर छूते हुए मन ही मन में खुद से कहा था, “ढाई आखर प्रेम के पढ़ने के बाद कुछ भी पढ़ने को नहीं रहता। मैं कितनी धन्य हूँ कि मेरे पिता जी ने श्याम-सा दूल्हा ढूंढ़ा।

श्याम बाबू ने झुक कर राधा को उठाते हुए छेड़ा, “बस, बस सारी सेवा आज ही करनी है क्या? कुछ कल के लिए भी बचा लें।”

फिर दोनों मुस्कुराते हुए नीचे उतर आए थे, श्याम बाबू ने द्वार बन्द किये तो राधा ने पूरे परिवार के लिए बैड पर ही भोजन परोसा। श्याम बाबू ने अपने हाथों से राधा को जल ग्रहण करा एक निवाला उसके मुंह में डालकर व्रत खुलवाया। फिर राधा ने भी एक निवाला श्याम बाबू के मुँह में डाला तो हँसी का संगीत कमरे में गूंजने लगा। थोड़ी देर के बाद श्याम वाबू ने चिन्तनशील मुद्रा में छत को निहारा तो राधा पूछ बैठी, “क्या सोच रहे हैं आप?”

इस पर श्याम बाबू ने सात सौ रुपये का मसला राधा के सामने रख दिया। राधा गम्भीर-सी हो उठी थी। उसने फिर दिन भर उस पर गुज़री आप बीती श्याम बाबू को बता दी थी। इसी के साथ खुद को भी हल्का महसूस करने लगी थी। मगर इधर, श्याम बाबू के दिल पर बोझ-सा आ बैठा था। वे बेहद गम्भीर हो सोचने लगे, “बाज़ारवाद के चलते गिरते मानव-मूल्य और फिल्मीकरण से बदली हमारी मानसिकता न जाने और कौन-सा रूप लेगी? क्या हम आने वाली पीढ़ी के लिए कुछ संस्कार या मूल्य बचा भी पाएंगे या नहीं?”

तभी डोरबेल बजी। श्याम बाबू का विचार तन्त्र टूटा। उन्होंने उठकर दरवाजा खोला तो, “सर ये आपकी वॉशिंग मशीन की डिलीवरी” राधा हैरान-सी बात को समझने का प्रयत्न में लगी ही थी कि श्याम बाबू ने कह दिया, “डिलीवरी कल चाहिए, आज नहीं, शोरूम पर वॉशिंग मशीन वापिस ले जाओ।” रिक्शावाला हैरान नज़रों से श्याम बाबू को देखते हुए बोला, लेकिन सर आप तो आज ही के लिए….”

बीच में ही श्याम बाबू ने उसकी बात काटते हुए जवाब दिया था, “हाँ, हाँ, वो तो ठीक है, कह देना साहब आउट ऑफ स्टेशन गए हैं, मैं तुम्हें दोनों दिन का किराया दूँगा।”

फिर रिक्शा वाला अचम्भित-सा मगर बगैर बहस किए चला गया था। मगर उसके चेहरे पर हैरानी थी। वह बुदबुदाते हुए जा रहा था, “घर होकर भी कहते हैं, आउट ऑफ स्टेशन हैं। कमाल है! खैर, मुझे इससे क्या लेना, वह कभी-कभी पीछे मुड़कर भी देख लेता था। इधर राधा से नहीं रहा गया। वह पूछ बैटी तो श्याम बाबू ने उसे समझाते हुए कहा,

“देख राधा, यदि मैं तुम्हें आज करवा चौथ व्रत के एवज में उपहार स्वरूप वाशिंग मशीन दे देता तो तुम भी कल को बालकनी में खड़ी होकर किसी तीसरी पड़ोसन को इसके फायदे समझाती हुई मिलती और कदाचित वो बेचारी भी तुम्हारी तरह न जाने सारा दिन क्या-क्या सोचती…? किस-किस को दोष देती, किस्मत को, पति को या फिर हालात को?” फिर तनिक मुस्कुराते हुए उन्होंने कहा, “और ये भी हो सकता है कि अपना कोई ज़ेवर ही बेच दे।” ऐसा सुन, राधा ने नजरें नीचे झुका ली थीं। श्याम बाबू अपनी बात जारी रखते हुए कह रहे थे, “यदि में करवा चौथ के इस पावन पर्व पर तुम्हें कोई मँहगा उपहार देता हूँ तो तुम अगले व्रत पर भी कुछ ऐसी ही उम्मीदें पाल लोगी, जिसे शायद मैं पूरा करने में खरा न उतर पाऊं, तो फिर ….”

तभी राधा ने अपनी नरम हथेली श्याम बाबू के मुँह पर रखकर उन्हें चुप्प कराया और फिर बाजू वाले कमरे की ओर निकल गई। श्याम बाबू ने सारे घर की बत्तियाँ गुल कर ‘जीरो वॉट’ का बल्च ‘ऑन’ कर दिया। गुलाबी रंग की मंद-मंद रोशनी बैडरूम में छिटकने लगी थी। बैड के बगल में रखे टेपरिकॉर्डर में गुलाम अली साहिब द्वारा गाई ग़ज़ल के बोल “ये कौन आ गई दिलरूबा महकी-महकी, हवा महकी-महकी, फ़िज़ा महकी-महकी..” शयनकक्ष में रोमांचित माहौल को हवा देने लगे थे। श्याम बाबू ने राधा को पुकारा, “अरे भई, मेरी मोटो कहाँ रह गई?”

“जी, बस आई।”

राधा कपड़े बदलकर दूसरे कमरे से जैसे ही वापस आई तो विशाल तरुवर-सी बाँहें फैलाकर श्याम बाबू ने उसे अपने अंक में ले लिया। राधा भी धीरे-धीरे अपने मन की पंख समेटकर श्याम बाबू की शाख-सी बाजू पर सिर टेक मस्त चिरैया-सी सो गई थी।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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