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hot story in hindi- prem ki pyasi प्यार की खुशबू - राजेन्द्र पाण्डेय

यह ड्राइवर मुझे मुड़-मुड़कर देख रहा है, कहीं यह मुझपर फिदा तो नहीं है? यदि ऐसा हुआ तो मेरा काम और भी आसान हो सकता है। मैं इस बंधन से आजाद हो सकती हूँ। लेकिन मैं भागकर जाऊँगी कहाँ? मुझे कौन बचाना चाहेगा? मैं तो एक खूनी और बदनाम महिला हूँ। नहीं, मैंने तो समाज से गंदगी को हटाया है। यह कैसी दुनिया है? यह कैसा समाज है? गंदगी को हटाना भी यहाँ पाप है। मैं तो निर्दोष हूँ और जब मैं निर्दोष हूँ तो मुझे अपने प्राण की रक्षा अवश्य करनी चाहिए। यदि मैंने ऐसा नहीं किया तो मैं बुजदिल कहलाऊँगी।’

पुलिस जीप तेजी से भागी जा रही थी और मैं भी उसी गति से सोचती जा रही थी। तभी किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखकर पुनः हटा लिया। मैं जरा-सी भी नहीं चौंकी। मैंने कनखियों से देख लिया था। मेरे कंधे पर हाथ रखने वाला कोई और नहीं, बल्कि एक पुलिस इंसपेक्टर था।

मैं थोड़ा मुस्कराई फिर अपने चिर-परिचित मुद्रा में होंठ दांतों से दबाते हुए बोली, ‘इंस्पेक्टर साहब, क्या मैं आपको कातिल लगती हूँ?’ इंस्पेक्टर मुझे एकटक देखे जा रहा था, लेकिन जवाब में कुछ नहीं बोला। मैंने सोचा, ‘बात ऐसे नहीं बनने वाली, ये पुरुष लोभी होते हैं। यह इंस्पेक्टर भी तो एक पुरुष ही है।

मुझे भोगना भी चाहता है और जेल की हवा भी खिलाना चाहता है।’ यही सोचते हुए मैंने अपनी टांगें फैला दी और उसके पैर को धीरे-धीरे अपने पैर से सहलाने लगी। अब मेरे चेहरे पर खूनी, कैदी होने का भय या भविष्य में घटने वाली घटनाओं की दहशत नहीं थी। फिर मैं अपनी शर्ट के ऊपरी तीन बटन खोलकर ऊंघने का नाटक करने लगी। उस जीप में कुल तीन सिपाही थे, जो झपकी ले रहे थे। इंस्पेक्टर आँखें बंदकर मेरे स्पर्श का आनंद ले रहा था।

तभी ड्राइवर ने मुझे चिकोटी काटी। मैंने उसकी आँखों में आँखें डालकर अपनी जीभ को दोनों होठों के ऊपर गोल-गोल घुमाया। ड्राइवर के मुंह में पानी आ गया। मुझे यह भली-भांति मालूम गया था कि मुझ सबसे अधिक ड्राइवर ही है। अंधी अंधा प्यार, यानी जिस भी चाहत में ‘अंधा’ शब्द गया, वह उस व्यक्ति के लिए घातका जाता है। ड्राइवर मुझसे निश्चित रूप ही अंधा प्यार करने लगा था।

मैंने किसी नटखट बच्चे की तरह जीभ निकालकर उसे चिढ़ाया तो व अपना मानसिक संतुलन खो बैठा और जवाब में उसने हाथ का इशारा किया कि यह इलाका काफी निर्जन है। तुम कूदकर भाग सकती हो। मैं जीप की रफ्तार कम कर रहा हूँ। मैं उसके इशारे के भाव के समझते ही मुस्करा पड़ी और अगले ही पल जीप की रफ्तार काफी कम होती चली गई।

डाइवर ने हाथ का इशारा दिया. ‘कद जाओ।’ ‘लेकिन मैं कदकर जाऊँगी कहाँ? कोई भी तो मेरा नहीं है।’ तभी मझे अनायास ही याद आया कि मैंने गृहमंत्री की हत्या की है। अदालत मुझे सजा देने में कंजूसी नहीं करेगी। उम्रकैद या फांसी तो निश्चित ही है। मैं निर्दोष होते हुए भी फांसी पर झूल जाऊंगी, क्या यह अच्छा होगा? मुझे चलती जीप से कूदना ही होगा। फिर मैं धीरे से कूदने के लिए जैसे ही आगे बढी, इंस्पेक्टर की आँख खुल गई। वह कड़ककर बोला, ‘कूदकर भागना चाहती थी? यह पिस्तौल देख रही है न? खोपड़ी उड़ा दूंगा।’

मैं सीट पर पुनः बैठ गई। इंस्पेक्टर ड्राइवर को डांटने लगा, ‘तुमने स्पीड क्यों कम कर रखी है? लगता है इसके तीखे नयनों ने तेरे ऊपर भी जादू कर दिया है। बेवकूफ, तू नहीं जानता यह भाग गई तो हमारा क्या हाल होगा?’

‘इंस्पेक्टर साहब, यदि मैं भागना चाहूँगी तो आप मुझे रोक नहीं सकते।’ मेरे यह कहते ही इंस्पेक्टर मुझ पर भड़क उठा और पिस्तौल के पिछले हिस्से से मुझे पीटने लगा। मेरे हाथों में हथकड़ी थी। मैं गुस्से से बिफरती हुई बोली, है तो हथकड़ी खोलकर देख।’

‘तुमने क्या मुझे गृहमंत्री समझ रखा है?’ यह कहकर उसने मेरी हथकड़ी खोल दी, ‘अब तो हथकड़ी खुल गई न? जरा भाग कर दिखा मुझे।’

मैंने अचानक ही उछलकर इंस्पेक्टर की नाक पर एक घूसा मारा, उसके हाथ से पिस्तौल छीना और चलती जीप से एक चट्टान पर कूद गई। ड्राइवर ने जीप की रफ्तार और तेज कर दी। ड्राइवर का मेरे प्रति यह सच्चा प्यार था, कि इंस्पेक्टर के मना करने के बावजूद वह जीप बहुत दूर तक लेकर चलता चला गया और फिर कहीं काफी दूर जाकर रोका। मेरे भागने के लिए इतना समय काफी था। मैं लगभग एक किलोमीटर तक दौड़ने के बाद एक खाई में जा छुपी। मात्र तीन पुलिस और एक इंस्पेक्टर मुझे भला कैसे ढूंढ पाते।

मैं घंटों खाई में दुबकी बैठी रही। तभी मुझे अचानक जूते की आवाज सुनाई दे गई। मेरे पूरे बदन में एक सिहरन-सी दौड़ गई। तभी किसी के खंखारने की आवाज आई। वह खाई के किनारे पर ही खड़ा था। मैंने उसे देखने के लिए जैसे ही सिर ऊपर की ओर उठाया, उसने मेरे मुँह पर थूक दिया। मैंने समझा कि उसने ऐसा जानबूझकर किया है।

उसके सिर्फ जूते ही मुझे दिख रहे थे। इतने में ही एक हल्की-सी बुदबुदाहट मुझे सुनाई दी, वह चकमा देकर कहाँ भाग गई? मैंने उसकी मदद न की होती तो क्या वह भाग निकलती।’ अब मैं समझ गई, यह ड्राइवर की ही आवाज है। ‘इंस्पेक्टर सिपाहियों के साथ इधर ही कहीं होगा। हे ईश्वर, मेरी रक्षा करना। मेरा तुम्हारे सिवा कोई नहीं है।’

मैंने यह प्रार्थना सच्चे मन से की थी। आज मुझे महसूस हो रहा था कि जब व्यक्ति चारों तरफ से संकट में घिर जाता है तो वह ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार कर लेता है। जीवन में कभी भी मैंने ईश्वर को नहीं याद किया और न कभी मंदिर ही गई हूँ, पर आज संकट की इस घड़ी में वह अनायास ही याद हो आया है।

ऐसा मैं सोच ही रही थी कि इंस्पेक्टर मुझे गालियां देते हुए जोर से चीखा, ‘वह कमीनी, हरामजादी, आखिर भाग ही गई। लेकिन भागकर आखिर जाएगी कहाँ? होगी तो इसी जंगल में ही…।’ यह कहकर इंस्पेक्टर दूसरी तरफ बढ़ गया। मैंने एक लंबी सांस ली और छोड़ी भी।

‘चलो, इंस्पेक्टर का बच्चा तो गया, लेकिन मैं यहाँ से निकलूंगी कैसे?’ मुझे भूख-प्यास दोनों ही लगी थी। तभी मुझे कुछ महिलाओं के चहकने की आवाज सुनाई दी। मैंने सोचा, क्यों न इन्हीं के साथ मैं जंगल से बाहर निकल जाऊँ।’ लेकिन मेरा यह सोचना गलत था, क्योंकि उनके और मेरे पहनावे में काफी अंतर था। मैं दूर से ही पहचान में आ सकती थी। वे महिलाएँ चली गईं।

जंगल के पास के ही गांव की रहने वाली थीं शायद। मैंने थोड़ी हिम्मत की और झाड़ियों में छुपते-छिपाते सामने वाली सड़क के किनारे जाकर बैठ गई। मेरी चुस्त पैंट नीचे से सिलाई छोड़ चुकी थी। शर्ट के बटन तो पहले से ही खुले थे। इसी बीच मुझे दूर से ही एक जिप्स आती दिखाई दी।

वह बड़ी तेज रफ्तार चली आ रही थी। मैंने बैठे-बैठे ही आ की ओर झुककर हाथ हिलाना शुरू किया तो वह जिप्सी मुझसे तकरीबन दो गज की दूरी पर आकर रुकी। मैं जानबूझकर लंगड़ाती हुई जिप्सी के पास पहुँची और अंदर बैठे व्यक्ति से बोली, ‘मेरी गाड़ी का एक्सीडेंट हो गया। प्लीज, मुझे आगे शहर तक छोड़ देंगे?’ वह आदमी शायद पहले से ही खीझा हुआ था।

मुझ पर नजर टिकाते हुए बोला, ‘अरे बाबा, किस शहर तक…? आखिर उस शहर का कोई नाम भी तो होगा…!’ यह कहते-कहते जब उसकी नजर मेरे शर्ट से झांकते गति-गोल स्तनों पर पड़ी तो वह अचानक ही मुस्करा पड़ा, ‘अच्छा! ठीक है, तुम पीछे मेरे साथ वाली सीट पर आ जाओ।’ मैं फौरन उसके बगल में जाकर बैठ गई। ड्राइवर ने गाड़ी स्टार्ट कर दी। मैंने पूछा, ‘वैसे आप कहाँ तक जाएँगे?’

‘मैं… मैं तो जहन्नुम तक जाऊँगा।’ यह कहकर वह चुप हो गया। मैंने मन-ही-मन सोचा, ‘अजीब आदमी है। पूछने पर उल्टा ही जवाब देता है। खैर, कोई बात नहीं, ऐसे लोग ही मुझे सूट करते है।’ यही सब सोचते-सोचते मैं उसको ऊपर से नीचे तक निहारने लगी। वह यही कोई पचास-पचपन वर्ष का एक स्वस्थ व्यक्ति था। रंग उसका काला था, पर देखने में स्मार्ट था।

लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब-सा खालीपन झलक रहा था। तभी मुझे मोबाइल की घंटी की आवाज सुनाई दे गई। वह बातें करने लगा, ‘हाँ, मैं उस मनोचिकित्सक के पास से ही आ रहा हूँ। रीमा ने जबसे मुझे तलाक दिया है, तब से मैं और अधिक बीमार रहने लगा हूँ। मैं दवाइयाँ भी बराबर ले रहा हूँ, पर क्या करूँ? मन की बीमारी साथ ही नहीं छोड़ रही।’ यह कहकर उसने मोबाइल ऑफ कर दिया।

‘मेरा यह दोस्त भी कितना पागल है! हर दस मिनट बाद फोन कर देता है।’ यह कहकर उसने मेरी तरफ देखा, फिर बोला, ‘तुम कितनी खूबसूरत और स्मार्ट हो। लेकिन अपनी ये क्या हालत बना रखी है तुमने? हाँ, तुमने बताया नहीं, तुम्हें कहाँ छोडना है?’

अब मैं उसकी गाड़ी से कहाँ उतरने वाली थी। मैंने अपनी आँखें गोल-गोल नचाते हुए कहा, ‘मैं भी जहन्नुम तक जाऊँगी।’ यह सुनते ही वह हँसने लगा, उसका साथ मैंने भी दिया।

अब गाड़ी में बिल्कुल सन्नाटा छाया था और गाड़ी सड़क पर हवा की गति से तेज भाग रही थी। कोई छह घंटे के लंबे सफर के बाद गाड़ी एक शानदार होटल के सामने आ खड़ी हुई। शाम का धुंधलका बढ़ता ही जा रहा था। उसने कहा, ‘नीचे उतरो। आज रात यहीं गुजारनी होगी।’

मुझे गाड़ी से बाहर आने में काफी झिझक महसूस हो रही थी, क्योंकि मेरे कपड़े एक फाइव स्टार होटल में जाने लायक नहीं थे। शर्ट के बटन टूट गए थे, पैंट की सिलाई कमर से नीचे उधड़ गई थी। इन कपड़ों में चकाचौंध रोशनी के सामने जाना लोगों के मन में कई तरह के सवाल खड़ा कर सकता था। फिर भी मैं ‘गाड़ी से बाहर आ गई। दूसरा कोई चारा भी नहीं था।

गाड़ी से उतरे अभी दो मिनट ही हए थे, कि दो जवान लड़कियाँ उस आदमी के पास आ खड़ी हुई और दोनों उसके कंधों से झूलते हुए बोलीं, ‘कैसे हो निर्मल? तुम्हारा भी कोई जवाब नहीं। मानसिक रोगी होने का ड्रामा करके तुमने रीमा से अपना पीछा छुड़ा ही लिया।’ उसका नाम निर्मल है, उन लड़कियों से ही मुझे मालूम हुआ। निर्मल ‘खीं-खीं’ की भद्दी हँसी हँसते हुए बोला, ‘तुम दोनों के कहने पर ही तो मैंने रीमा को छोड़ने का मन बनाया। जब वह तलाक देने के लिए राजी नहीं हुई तो मुझे पागल होने का ड्रामा करना पड़ा। इस ड्रामे को हकीकत में ढालने के लिए मुझे लाखों रुपयों के अपने सामान तोड़ने-फोड़ने पड़े।’

निर्मल का व्यक्तित्व धीरे-धीरे मेरे सामने खुलता जा रहा था। वह अव्वल दर्जे का अय्याश मुझे लगा। उन दोनों लड़कियों के नाम कली और खिली थे और उनकी उम्र यही कोई इक्कीस-बाईस की थी। मैं सोचने लगी, ‘स्त्री-पुरुष के संबंधों की मुझे अच्छी पहचान है। अधिक उम्र के पुरुष कमसिन लड़कियों को ज्यादा पसंद करते हैं और कम उम्र के पुरुष अधिक उम्र की औरतों को पसंद करते हैं।

यह पसंद-नापसंद का गणित भी बड़ा ही अनोखा है, बड़ा ही पेंचीदा है। निर्मल इन कमसिन लडकियों की खातिर पागल तक बन गया। अपने हजारों-लाखों के सामन यह दिखाने के लिए तोड दिए, कि वह सचमुच ही पागल हो गया है।

और वह रीमा कितनी बेवकफ औरत है, जिसने अपने बीस वर्षीय वैवाहिक जीवन से किनारा इसलिए कर लिया, कि उसका पति मानसिक रोगी है। फिर यह विवाह एक समझौता ही तो हुआ न? प्यार में तो कोई समझौता होता ही नहीं है। कोई शर्त, कोई मांग, कोई बंधन ही नहीं होता और विवाह में उपरोक्त सारी बातें होती हैं।

लेकिन यहाँ तो निर्मल को इन लडकियों से कोई प्यार ही नहीं है और लडकियाँ भी निर्मल से प्यार नहीं करती हैं। यहाँ भी एक समझौता है। ये लड़कियाँ अपनी कमसिन देह निर्मल को देंगी और निर्मल उन्हें धन देगा। फिर यह प्यार न होकर एक सौदा ही हुआ न? प्यार और विवाह दोनों ही सौदेबाजी पर आकर टिक गए हैं। विवाह में भी वासना, जरूरतें, जीवन की सुरक्षा का महत्व है और प्रेम में भी इन बातों की प्रधानता है।

विवाह भी बेमेल होने लगे हैं और प्रेम भी बेमेल होने लगे हैं। एक अमीर परिवार की लड़की की शादी गरीब परिवार में हो जाती है और एक गरीब परिवार के लड़के का प्यार भी एक अमीर लड़की से हो जाता है। फिर विवाह और प्रेम एक जैसे ही हुए न? उफ्! मैं तो पागल हो जाऊँगी। विवाह और प्रेम को परखना, पहचानना और तौलना इतना आसान नहीं है।

दोनों में ही तालमेल है। दोनों ही धन और देह पर टिके हुए हैं।’ मैं अभी न जाने और क्या-क्या सोचती, तभी निर्मल मेरे पास आकर अचानक ही बोल पड़ा, ‘प्लीज, तुम आज मेरे साथ ही होटल के कमरे में ठहर जाओ। मेरा जहन्नुम बस यहीं पर आकर खत्म होता है।’

मैं कसमसाई, फिर आगे बढ़ गई। मेरे मन में अशांति फैली हुई थी। निर्मल मेरे साथ कैसा व्यवहार करेगा? इसको लेकर मैं अशांत नहीं थी। यह तो मुझे पहले से ही मालूम था कि जो मुझे एक बार देख लेता है, वह मुझे एक बार पूरी तरह पाना जरूर चाहता है। कली और खिली दोनों ही लड़कियाँ मेरे सामने फीकी पड़ गई थीं।

यही सोचते हुए मैं होटल के कमरे में आ गई। मेरे अंदर आते ही निर्मल ने दरवाजा बंद कर लिया और मुझे अपनी बाहों में समेटने के लिए हाथ लपकाने लगा। मैं पीछे हटती हुई बोली, ‘इतनी जल्दबाजी अच्छी नहीं, अभी तो पूरी रात पडी है। देखो, मेरे शर्ट-पैंट फटे पड़े हैं। मैं पहले बाजार जाना चाहती हूँ।’

‘मेरे पास शर्ट-पैंट हैं न, वे किस काम आएँगे!’ यह कहकर उसने ब्रीफकेस खोला और मेरे आगे एक खूबसूरत-सा शर्ट-पैंट रख दिया। मैं हँस पड़ी, ‘यह मुझमें होगा?’

‘यह मेरा थोड़े ही है। यह तो मैं कली के लिए ले आया था। अब तुम ही इसे पहन लो।’ निर्मल यह कहते-कहते मेरी ओर बढ़ गया, ‘अब तो मना न करो।’

वह आदत से मजबूर था। मैंने उसे रोकते हुए कहा, ‘अच्छा, ये बताओ, तुम्हारी पत्नी रीमा में क्या खराबी थी, कि तुम्हें उससे अपना पीछा छुड़ाने के लिए पागल होने का ड्रामा करना पड़ा?’

‘वह अब बूढ़ी हो गई है। सहवास में उसकी रुचि भी नहीं रह गई थी। तुमसे क्या छिपाना, मेरी शुरू से ही आदत रही है, नई चीजें खाने की…। चाहे वह औरत हो या चाहे खाने पहनने की कोई वस्तु’ यह कहकर निर्मल हँसने लगा। ‘तुम औरत की तुलना चीज, पहनावे और खाने-पीने के पदार्थों से कर रहे हो? एक जीते-जागते इंसान की अहमियत तुम्हारी नजर में निर्जीव सामान की है।

आश्चर्य! घोर आश्चर्य!! तुम जैसे मर्दो ने ही तो विवाह और प्रेम की परिभाषाएं बदल दी हैं। जीवन के गणित को झुठला दिया है।’ मेरे यह कहते ही वह एक फूहड़ हँसी हँसते हुए चीखा, ‘देखो, उपदेश मत दो। क्या यह झूठ है कि औरत एक चीज नहीं है? पुरुषों के मनोरंजन का साधन नहीं है? जब तक रीमा मनोरंजन का साधन रही. वैवाहिक जीवन को मैं खींचता रहा। और जब वह एक मोटी, भद्दी और प्रौढ़ महिला बन गई तो मैंने उससे अपना पीछा छुड़ा लिया। तुम क्या किसी चीज से कम मूल्यवान हो?’

‘कोई भी चीज मूल्यवान नहीं होती, क्योंकि उसको मूल्यवान या मल्यहीन बनाने का काम इंसान के हाथों में होता है। लेकिन एक औरत तो अमूल्य होती है। उसमें प्राण होता है, जिसको इंसान पैदा नहीं कर सकता। क्या एक प्राणधारी को तुम एक चीज मान सकते हो? तो जाओ, इस पलंग से अपनी रातें हसीन करो, मेरी तरफ बार-बार क्यों लपक रहे हो?’ यह कहकर मैं मुस्कराने लगी।

‘अब बस भी करो….’ यह कहकर निर्मल ने मुझे अपनी बाहों में समेट लिया। मैंने इसका कोई विरोध नहीं किया, क्योंकि मेरे मन में तो कुछ और ही चल रहा था। देखते ही देखते निर्मल निर्वस्त्र हो गया और अब मुझे भी निर्वस्त्र करने लगा। तभी मुझे अचानक गुस्सा आ गया और मैंने उसके गुप्तांग को हाथ से पकड़ कर जोर से मरोड़ दिया। वह फर्श पर गिरकर पहले छटपटाया. फिर बेहोश हो गया।

मैंने फटाफट उसके दिए कपडे पहने और उसकी ओर घणा से देखते हुए बुदबुदाई, ‘चीज तो उसे कहा जाता है, जो मारने पर या कछ कहने पर प्रतिक्रिया स्वरूप कछ कहती या हमला नहीं करती। औरत कोई चीज नहीं है, वह तो प्राणवान है। चोट लगने पर वह भी चोट करती है।’ फिर उस खंखार हसीना ने दरवाजा खोला और लंबे-लंबे डग भरती हई सीढियाँ उतरती चली गई।

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