Social Story: बाहर से चीखने चिल्लाने की आवाज आ नहीं है रही है दिल कर रहा है कहीं पाताल में जा चुप जाऊं पर जो निर्णय आज उसने लिया है पूर्वाभासित तो था ही ना उसका यह परिणाम ,आखिर निर्णय था भी तो बहुत विचित्र और इसी विचित्रता को पापा जी पागलपन ने संज्ञा दे दी ।नहीं वो दोषी नहीं है कि वह ऐसा सोचते हैं आखिर उनके भी कुछ अरमान है। पर अब बस मैं अपनी आत्मा और शरीर को और छलनी होता नहीं देख सकती इसलिए पूरे होशो हवास में कभी मां ना बनने का निर्णय ले ही लिया है मैंने ।
सताइसवां साल लगते ही पापा ने अल्टीमेटम दे दिया की बहुत हुआ अब पी एच डी करके प्रवक्ता लगे भी दो साल हो गए हैं अब शादी में और विलंब करने का कोई औचित्य नहीं है। शादी से कोई परहेज नहीं था बस एक लय में जिंदगी बहे जा रही थी और उसमें कोई अड़चन नहीं चाहती थी मैं। पर सृष्टि और समाज के विरुद्ध जाने का कोई इरादा नहीं था इसलिए तीन महीने के भीतर ही जतिन के साथ सप्तपदी के सातों वचन आत्मसात कर लिए, जतिन घर के इकलौते पुत्र और तीनों बहनों के लाडले भाई थे फिर भी पापा जी के कठोर अनुशासन ने कभी कदमों को लांघ उच्छ्रंखल नहीं होने दिया सास उर्मिला स्वभाव से धर्मभीरु और सिर्फ अपने पुत्र की खुशियों का ध्यान करने वाली महिला थी ।सब कुछ अच्छा ही था कि धीरे-धीरे शादी की पहली सालगिरह पर रिश्ते की भाभी जी ने उलाहना दिया” बस भाई अगली बधाई तुम्हारे बच्चे की होनी चाहिए ।बहुत साल हुए आंगन में कुल वंशज खेले हुए”।
जतिन की ओर देखा तो उन्हें भी मुस्कुराते पाया तो इसका मतलब यह हुआ सब यही बात सोच रहे
है एक सिर्फ मैं ही नहीं समझ पा रही हूं उस रात कमरे में जतिन के सीने पर सर रखकर पूछा” जतिन, तुम्हें भी लगता है अब हमें फैमिली शुरू कर देनी चाहिए। जवाब न देकर जतिन ने कसकर मुझे अपनी बाहों में भींच लिया और मुस्कुराते हुए कहा “अपने प्रेम को मूर्त रूप देने का शायद समय आ गया है”।
खुशखबरी का इंतजार करते-करते लगभग एक साल हो गया और इस एक साल में प्यार भरे उलहाने व्यंग्यबाणों में बदलने लगे। मेडिकल साइंस ने इतनी तरक्की कर ली है कि अब तो कुछ भी नामुमकिन नहीं यही सोच हर परीक्षण उपचार से गुजरी पर परिणाम शून्य ही निकला। धरती गाय और नारी ,यदि उपजाऊ नहीं हो तो उसका समाज में कोई मोल नहीं है, इस बात पर सदैव वाद विवाद करने वाली मैं बिना वादी प्रतिवादी बने हार गई थी। दबे ढके शब्दों में कभी जादू टोने झाड़ फूंक का भी जिक्र होता तो पता नहीं क्यों मैं मना नहीं कर पाती थी। उपचार का विचार ही सांत्वना देने के लिए काफी होता है कि सब ठीक होगा पर अनगिनत सुइयां शरीर की चीरफाड़ मुझे इतना कष्ट नहीं देती थी जितना उन समस्त प्रयासों का निष्फल हो जाना। पर शायद अम्मा जी के बताएं पूर्णमासी के व्रतों का परिणाम था या भाभी जी के गोवर्धन महाराज की परिक्रमा का प्रताप,या डॉक्टर निधि की कोशिश कि बंजर जमीन पर एक अंकुर फूटा, साइंस के अनेकों चमत्कारों में से एक है आई वी एफ, निसंतान दंपतियों के लिए एक वरदान …हां वरदान ही तो बन गया थ मेरे लिए भी,अचानक से उपेक्षित,तिरस्कृत मै पूरे कुल की दूरी हो गई थी। सूर्य को जल,गोपाल मंत्र का जाप,एकादशी को बुजुर्गों को भोजन कराना, ताबीज भभूत जिसने जैसा कहा सब किया पर कुल की तारणहार न बन पाई। इतनी उम्मीदों मुरादों से मांगा गया वह नन्हा अंकुर कोपल ना हो पाया, लगा सब खत्म हो गया अस्पताल में ही सबके चेहरे चुगली कर रहे थे की मां बनने का गौरव तुझे नहीं मिल पाएगा ।
जो आया नहीं था सबके मन में उसके लिए हमदर्दी थी पर मेरा शरीर आत्मा दोनों चिर चुकी है यह किसी को नहीं दिखा ।
तूफान में मछुआरे जब डगमगाती नाव ले भयानक लहरों से जूझते हैं तो एक छोटी सी रोशनी की किरण देखकर ही हौसला पाए जाते हैं और यहां तो गर्भ पूरे छह महीने का था तो आशा बांधना स्वाभाविक था। फिर वही सब दोहराया गया, नहीं पर इस बार उतना दर्द नहीं था या शायद महसूस ही नहीं हुआ पानी की तरह पैसा ,परीक्षणों में खून बहा और हर दिन नई उम्मीदों का आंसू बनकर एक बार फिर कुदरत हम पर मेहरबान हुई फिर वही प्यार हिदायतें ताकीदें के पहले जैसा कुछ ना हो बस एक बार बच्चा आ जाए। डर इंसान को डरपोक बना देता है पर नवजीवन के स्पंदन ने हृदय हृदय से दरर को निकाल देने का प्रयास किया पर पूर्व की आशाओं के टूटे टुकड़े चुभते ही रहते थे। छठा महीना पार होते ही सब ने राहत की सांस ली और सोचा शायद कठिन समय पर हो गया पर सोचा कहां सत्य होता है सत्य तो वह होता है जो घटित हो जाता है ।दर्द की पुनरावृति हो चुकी थी मैं मां बन गई थी पर मेरे प्रेम के मूर्त रूप में जीवन नहीं था। चीत्कार उठा मन, हे प्रभु क्यों इतनी परीक्षा ले रहे हो जब गोद में नहीं देना था तो गर्भ में भी क्यों दिया ।
कुल में सबके चेहरे देखकर मन खुद को ही दोषी मानने लगा। अस्फुट से स्वर सुनाई दिए आरोग्य सेंटर उदयपुर ” ।नहीं, अब और नहीं, अब बस बहुत हुआ नहीं बना मुझे गौरवशाली मां ।मां बनने के लिए कितनी परीक्षा दूं शरीर को प्रयोगशाला में बदल डाला, कुल दीपक की उम्मीद में पूरे परिवार ने जीना छोड़ दिया ,पैसा पानी की तरह बहाया । किसी अनाथ बच्चे को गोद लेकर जीवन को संपूर्णता नहीं दी जा सकती। मुझे अपना गंतव्य दिख गया है जीवन को मकसद देने के लिए जरूरी तो नहीं वह जीवन आपके गर्भ से ही प्रस्फुटित हुआ हो, अंकुर को सींच कर आकार देना पालन करना भी तो मातृत्व ही है।
गंतव्य-गृहलक्ष्मी की कहानियां
