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साहित्यकार की नजर में रद्दी का बहुत महत्त्व होता है। रद्दी में उसकी आत्मा बसती है। जब तक घर में रद्दी रखी रहती है साहित्यकार सुबह शाम उसे निहारता रहता है। रात को सपने में भी उसे रद्दी ही दिखाई देती है।

दशहरे से दीपावली तक का समय ‘सफाई’ का माना जाता है। इस समय घर से लेकर जेब तक की सफाई हो जाती है। इस सफाई की मुख्य जिम्मेदारी घर की महिला सदस्यों की होती है, जिसमें वे अधीनस्थों के रूप में घर के पुरुषों का इस्तेमाल करती है। इस दौरान पुरुषों की दशा देखकर कोई नहीं कह सकता कि हमारे यहां पितृसत्ता चलती है।

दिवाली की सफाई के काम में सत्ता महिला की होती है और पुरुष बेचारा सेवक होता है। जेब की सफाई महिला बिना किसी की मदद के बखूबी कर लेती है। इसमें सिर्फ जेब पुरुष की होती है। कोई पुरुष टांड़ पर चढ़कर धूल साफ कर रहा होता है।

कोई सोफे के नीचे घुसकर काक्रोच मार रहा होता है। कोई किचन में जमी चिकट को घिस रहा होता है। कोई खिड़की-दरवाजों के परदे चढ़ा या उतार रहा होता है। कोई बालकनी में रखी जिम की साईकिल की जंग खा चुकी चेन में तेल डाल रहा होता है। घर के साइज के हिसाब से पुरुषों के बीपी और तनाव का ग्राफ भी ऊपर नीचे होता है। बड़े घरों का कचरा भी बड़ा होता है और सफाई भी।

ये दिन पुरुष के संकटकाल के होते हैं। यदि पुरुष साहित्यकार हो तो उसका संकट डबल होता है और काल तो उसके पीछे ही पड़ा होता है। बड़े से बड़े घर में भी बीवी की नजर उसी कोने पर जाती है जहां साहित्यकार का खज़ाना अर्थात रद्दी रखी होती है। जब बीवी कहती है, ‘इस साल तो दे डालो ये रद्दी।

कागज इतने पीले पड़ चुके हैं। अब तो रद्दी वाला भी मना कर देगा’, इतना सुनते ही साहित्यकार पुरुष का रद्दी प्रेम जाग उठता है। दिवाली के किसी भी काम से ज्यादा जरूरी काम उसे अपने खजाने को बचाना होता है। किसी प्रेमी की तरह वह अपनी रद्दी खज़ाने को बचाने की कोशिश में लग जाता है। हर साल कई तरह के बहाने गढ़ कर या लड़- झगड़ कर ही सही अपनी रद्दी को घर से बाहर
जाने से बचा ही लेता है।

कई साहित्यकार अपने साथ दूसरों की भी रद्दी अपने यहां जमा कर लेते हैं। ऐसे में रद्दी की बढ़ी हुई ऊंचाई बीवी की नजरों में ज्यादा खटकती है। यदि बीवी ज्यादा ही पीछे पड़ जाए तो उसे दिखाने के लिए साहित्यकार अपनी रद्दी बचाकर दूसरों की रद्दी बेच देता है। जिन साहित्यकारों के पास अपनी
रद्दी से ज्यादा दूसरों की रद्दी होती है उन्हें अपनी रद्दी बचाने का भरपूर अवसर मिल जाता है।

अनुभवी साहित्यकार दिवाली की सफाई के पहले ही अपनी और दूसरों की रद्दी को अलग छांट कर रख लेते हैं ताकि ऐन मौके पर दिक्कत न हो। साहित्यकार की नजर में रद्दी का बहुत महत्त्व होता है। रद्दी में उसकी आत्मा बसती है। जब तक घर में रद्दी रखी रहती है साहित्यकार सुबह शाम उसे निहारता रहता है। रात को सपने में भी उसे रद्दी ही दिखाई देती है।

उसी रद्दी में से किसी दिन वह करीने से कोई पत्रिका, समाचार पत्र या किताब उठाता है। कुछ समय उसे पढ़ता है। रद्दी के इस ढेर में से उसे कई बार कोई विषय भी मिल जाते हैं, जिस पर कुछ लिखा जा सके। हालांकि रद्दी में से विषय ढूंढना वैसा ही है जैसे भूसे के ढेर में सुई ढूंढना। पर यह कठिन काम भी साहित्यकार पूरी लगन के साथ करता है।

रद्दीवाला कांटा न मारे इसलिए डिजिटल तराजू पर रद्दी तुलवाई जाती है। इतना कर के भी जब
रद्दी सात या आठ किलो ही निकलती है और पूरासौ का नोट भी नहीं मिलता है तब बीवी खूंखार
नज़रों से बची हुई रद्दी को देखती है। पर साहित्यकार हर साल की तरह बीवी की बुरी नजर से बचाने के लिए रद्दी को अपने आगोश में भर लेता है।

जो साहित्यकार दिवाली की सफाई में अपनी रद्दी को बचा पाते हैं वे अपने आपको किसी विजेता से कम नहीं मानते। दिवाली के बाद बची हुई रद्दी को देखकर साहित्यकार खुश होता है और फिर नए जोश के साथ रद्दी एकत्र करने में जुट जाता है। जब तक दिवाली की सफाई होती रहेगी साहित्यकार को अपनी रद्दी की चिंता सताती रहेगी।

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