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दीपावली पर मात्र दीपक नहीं दीपमालाएं प्रज्वलित की जाती हैं। इस दिन घर का प्रत्येक कोना प्रकाशवान होना चाहिए। अमावस्या के अधंकार का समूल नाश दीपक द्वारा किया जाता है तथा इसके साथ ही दीपक से जुड़ी अन्य भी कई मान्यताएं हैं।

दीपकों के आकार-प्रकार व प्रज्वलित करने की विधियां, उनके प्रयोजन उद्देश्यों की भिन्नताओं के आधार पर निर्धारित की गई हैं। अत: सर्वप्रथम दीपक प्रज्वलित करने के भिन्न उद्देश्यों की चर्चा अवश्यंभावी प्रतीत होती है। इसलिए पहले उन प्रयोजनों, उद्देश्यों व मान्यताओं को जानें जिनके आधार पर दीपक प्रज्वलित किए जाते हैं तत्पश्चात् दीपक के आकारों-प्रकारों व बनावट इत्यादि का विस्तारपूर्वक अध्ययन करेंगे।

मान्यताओं के पीछे क्या वैज्ञानिकता छिपी है, यह खोज का विषय है परन्तु हम सभी जानते हैं कि मान्यताओं को तोड़ पाना संभव नहीं है, क्योंकि विश्वास को आधारभूमि की आवश्यकता नहीं होती यह तो स्वयं के भीतर से स्वत: ही जागृत होता है।

मान्यताओं के समक्ष विज्ञान भी नतमस्तक है। यह सर्वथा कपोल-कल्पित है ऐसा भी नहीं है। अत: जो बात समझ से परे हो उसे समय के सहारे छोड़ देना ही हितकर है। आइए अपनी विषयवस्तु पर लौट चलें और जानने का प्रयास करें उन मान्यताओं के संदर्भ में जो दीपक प्रज्वलित करने से जुड़ी हैं और उनके पीछे क्या वैज्ञानिकता छिपी है?

द्य मान्यता है कि तुलसी के पौधे पर संध्या को दीपक प्रज्वलित करने से उस स्थान विशेष पर बुरी शक्तियों का दुष्प्रभाव नहीं पड़ता और प्रज्वलित करने वालों के पापों का नाश होता है। इसे मिट्टी के दीपक में शुद्ध घी द्वारा प्रज्वलित किया जाता है।

इस मान्यता के पीछे यह आस्था छिपी है कि तुलसी में सभी तीर्थों, देवताओं व वेदों का वास होता है। यह मान्यता धर्म से जुड़ी है। आइए इसके पीछे छिपी वैज्ञानिकता को जानने का प्रयास करें जो इस प्रकार है-

1. प्रत्येक अमावस्या को रात्रि में पीपल के नीचे शुद्ध घी का दीपक जलाने से पित्तर प्रसन्न होते हैं।

2. पीपल के नीचे सरसो के तेल का दीपक लगातार 41 दिन तक प्रज्वलित करने से मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है।

3. तिल के तेल का दीपक 41 दिन लगातार पीपल के नीचे प्रज्वलित करने से असाध्य रोगों में अभूतपूर्व लाभ मिलता है और रोगी स्वस्थ हो जाता है।

4. भिन्न-भिन्न साधनाओं व सिद्धियों को प्राप्त करने के लिए भी पीपल के नीचे दीपक प्रज्वलित किए जाने का विधान है।

5. किसी रोगी को शनिवार पीपल के वृक्ष के नीचे लिटाने से उसका रोग धीरे-धीरे दूर होता जाता है। इसी प्रकार देश काल अनुसार भिन्न-भिन्न मान्यताएं पीपल से जुड़ी हैं जिनका वर्णन करने के लिए पूरा ग्रन्थ लिखा जा सकता है।

इस मान्यता के पीछे क्या वैज्ञानिकता जुड़ी हुई है यह जानने के लिए सर्वप्रथम हम इस सत्य को ही प्राथमिकता देंगे कि पीपल सभी वृक्षों की अपेक्षा सर्वाधिक ऑक्सीजन उत्पन्न करने वाला वृक्ष है और ऑक्सीजन मानव जीवन का मुख्य आधार है। इसलिए हमारे मनीषियों ने प्रारंभ से ही इस की रक्षा और वृद्धि के लिए अलग-अलग विधान निधारित कर दिए थे। परन्तु ये विधान निरर्थक नहीं थे बल्कि हर प्रकार से मानव के लिए कल्याणकारी थे।

6. केले के पेड़ के नीचे बृहस्पतिवार को घी का दीपक प्रज्वलित करने से कन्या का विवाह शीघ्र हो जाता है ऐसी भी मान्यता है।

7. इसी प्रकार बड़, गूलर, इमली, कीकर आवंला और अनेकानेक पौधों व वृक्षों के नीचे भिन्न-भिन्न प्रयोजनों से भिन्न-भिन्न प्रकार से दीपक प्रज्वलित किए जाने का विधान है।

8. मान्यता है कि अपराध व दीर्घ बीमारियों से पीढ़ित व्यक्ति के पहने हुए कपड़ों में से कुछ धागे निकालकर उसकी जोत शुद्ध घी में अपने इष्ट के समक्ष प्रज्वलित की जाए तो रोग दूर हो जाता है।

9. ऐसी भी मान्यता है कि चौराहे पर आटे का चौमुखी घी का दीपक प्रज्वलित करने से चहुंमुखी लाभों की प्राप्ति होती है।

10. नजर व टोटकों इत्यादि के निवारण हेतु भी तिराहे, चौराहे, सुनसान अथवा स्थान विशेष पर दीपक प्रज्वलित किए जाते हैं।

11. पूर्व और पश्चिम मुखी भवनों में मुख्य द्वार पर संध्या के समय सरसों के तेल के दीपक प्रज्वलित किए जाने का विधान अत्यंत प्राचीन है। इसके पीछे मान्यता यह है कि किसी भी प्रकार की दुरात्मा अथवा बुरी शक्तियां घर में प्रवेश नहीं कर सकतीं।

जबकि वास्तविकता यह है कि इसके पीछे भी वैज्ञानिकता छिपी है कि सरसों के तेल का दीपक प्रज्वलित करने से जो गैस व उष्मा वातावरण में उत्पन्न होती है वह उस वातावरण के दूषित और विषैले कीटाणुओं और विषाणुओं को समाप्त कर देती है जिससे उस स्थान का वातावरण शुद्ध हो जाता है।

12. एक मान्यता यह भी है कि सरसों के तेल का दीपक प्रज्वलित कर उसकी कालिमा को किसी पात्र में इक_ा कर लिया जाता है और उसे बच्चों की आंखों में काजल के रूप में प्रयोग किया जाता है, साथ ही यह भी माना जाता है कि इसका टीका बच्चे को लगाने से उसे नजर नहीं लगती। गांव-देहात में इसका काफी प्रचलन है।

दीपक की बात हो और दीपावली का उल्लेख न हो ऐसा हो ही नहीं सकता। दीपावली पर मात्र दीपक नहीं दीपमालाएं प्रज्वलित की जाती हैं। इस दिन घर का प्रत्येक कोना प्रकाशवान होना चाहिए। अमावस्या के अधंकार का समूल नाश दीपक द्वारा किया जाता है तथा लक्ष्मीजी के समक्ष देसी घी के दीपक प्रज्वलित किए जाते हैं। दीपावली की मान्यता से सभी परिचित है अत: आगे बढ़ते हैं और कुछ अन्य मान्यताओं के बारे में जानते हैं।

दीपावली के ठीक 11 दिन पश्चात् एकादशी आती है जिसे देव उठनी एकादशी कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन अपने देवों को उठाया जाता है अर्थात् आवाहन-पूजन किया जाता है, ताकि जीवन के सभी शुभकार्य जैसे-विवाह इत्यादि निर्विघ्न पूर्ण हो जाएं।

इस दिन प्रत्येक घर में पूर्व की दीवार पर गेरु से एक पुतला स्वरूप आकार बनाया जाता है जिसे देव स्वरूप माना जाता है जो कि परिवार, कुनबा अथवा ग्राम स्थान विशेष आदि का कुल देवता होता है जिसे जागृत अथवा आवाहित करने के लिए गन्ना, गाजर, नए मौसम की सब्जियां, मिष्ठान के रूप में गुड़ अथवा चीने के जवे (सेवइयां) इत्यादि उनके समक्ष रखकर घर व आस-पड़ोस की स्त्रियां एकत्रित होकर मंगल गान गाती हैं जिसका भावार्थ यही होता है कि ‘हे हमारे कुल देवता हमने आपके समक्ष घी का दीपक प्रज्वलित किया है साथ ही भोग हेतु उपलब्ध सभी खाधान्न भेंट किए हैं, आप इनका भोग लगाओं और हमें अपना आशीर्वाद दो कि हमारे परिवार में शुभ कार्यों का शुभारम्भ होÓ। इस प्रार्थना के साथ छलनी से दीपक समेत सभी भोग योग्य पदार्थ ढक दिए जाते हैं ताकि देव आएं और निर्विघ्न भोग लगाएं व आर्शीवाद दें।

बिहार, उत्तरप्रदेश व अन्य पूर्वांचल राज्यों में छठ पूजन अत्यंत धूमधाम से मनाया जाता है। दीपावली के छठे दिन सूर्य षष्ठी मानी जाती है जिसके तीसरे दिन अर्थात् नवमी को जिसे अक्षय नवमी के नाम से जाना जाता है। आंवले के वृक्ष के नीचे शुद्ध देसी घी के 108 दीपक प्रज्वलित करने की मान्यता है।

इस मान्यता के अनुसार यदि कार्तिक मास की अक्षय नवमी को आंवले के वृक्ष के नीचे मिट्टी के 108 दीपक शुद्ध देसी घी में प्रज्वलित करके ब्राह्मïण को उसी वृक्ष के नीचे बैठाकर भोजन कराया जाए तो ऐसा करने वाले को हर प्रकार की ऋद्धि-सिद्धि की प्राप्ति होती है।

इसी प्रकार इन राज्यों में कार्तिक मास को अत्यंत पूजनीय व महत्त्वपूर्ण का माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि पूरे कार्तिक मास प्रात:काल 4 से 6 बजे के बीच घी के दीये जलाने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

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