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इश्तियाक साहब यकीन ही नहीं कर पा रहे थे कि जिस बेटी को उन्होंने इतने नाजों से पाला और जान से भी ज्यादा ह्रश्वयार किया, आज वही बेटी उन पर एतबार न कर सकी और बेटी के हाथों ही
उन्हें इतना बड़ा धोखा मिला। और धोखा भी ऐसा कि बेटी ने भरीअदालत में उन्हें झूठा साबित कर दिया।

‘ज़ारा की अम्मी! ज़रा फौरन यहां आना।’ बैठकखाने से इश्तियाक साहब की आवाज सुनकर सलमा ने मन ही मन सोचा अभी-अभी तो उनके पास से ही उठ कर यहां आई हूं, अब अचानक से इन्हें क्या हो गया, जो इतने बेसब्र हो रहे हैं। वहां पहुंचते ही इश्तियाक साहब ने उनके हाथ में एक कागज़ पकड़ा दिया। ‘यह तो कोई सरकारी चिी लगती है।’ लेकिन चिी पढ़ते ही उनके पांव के नीचे से जमीन खिसक गई, ‘यह तो ज़ारा की शादी के बाबत अदालत से आया हुआ समन है।

लेकिन यह हमारे यहां क्यों आया? लगता है, पोस्टमैन से कोई भूल हो गई है।’ अपना शक दूर करने के लिए खत के साथ आए मेज पर रखे लिफाफे पर लिखे पते को उन्होंने ध्यान से पढ़ना शुरू किया। मन के किसी कोने में उन्हें अब भी विश्वास था कि डाकिये ने दूसरे पते की चि_ी गलती से उनके यहां डाल दिया है लेकिन पता अपनी जगह हर्फ-दर-हर्फ सही लिखा था। वे माथा पकड़ कर धम्म से वहीं बैठ गईं।

‘इस तरह परेशान मत होइए। पहले ज़ारा से पूछ तो लीजिए कि आखिर माज़रा क्या है? वैसे क्या उसने आपसे इस बारे में कभी कोई चर्चा किया था।’

सलमा फौरन सिर हिलाते हुए वह बोली, ‘कोई बात हुई होती तो आपको बताती नहीं क्या?’ ‘तो हो सकता है कि आप ही सही हो और अदालत को ही कोई गलतफहमी हो गई हो। फिर भी एक बार आप उससे पूछ लीजिए।’ सलमा अदालत का समन लेकर ज़ारा के पास पहुंची, ‘बेटा, यह देखो! यह क्या लिखा है, इस चि_ी में?’ ‘क्या है?’ ज़ारा ने कोई खास उत्सुकता नहीं दिखाया। ‘अदालत का समन है तुम्हारी शादी के बाबत।’ ‘मेरी शादी के बाबत और मुझे ही नहीं पता। वाह! अजीब बात है।’

ज़ारा ने एक झटके में कोर्ट से आये उस परवाने को $खारिज कर दिया। ‘तुम सच बोल रही हो न बेटा।’ ‘हां, अम्मी यह किसी ने हम लोगों के साथ कोई बेहूदा मजाक किया है। आप यकीन रखिए, मेरा इससे रत्ती भर भी वास्ता नहीं है।’ अभी ज़ारा का वाक्य पूरा भी न होने पाया था कि मारे खुशी के सलमा लगभग दौड़ते हुए बैठकखाने में अपने शौहर के पास जा पहुंची।

कमरे के अंदर कान लगाए वे भी उनका राह ही तक रहे थे। ‘मैं कहती थी न कि अपनी ज़ारा ऐसी नहीं है।’ ‘क्यों क्या हुआ?’ इश्तियाक साहब की उत्सुकता सलमा के शब्दों में घुली खुशी का अहसास कर और बढ़ गई। ‘ज़ारा ने अदालत के परवाने को देखते ही बता दिया कि उसका इससे रत्ती भर भी वास्ता नहीं है।’ इत्मीनान की एक गहरी सांस इश्तियाक साहब के अंदर उतरती चली गई। लेकिन अदालत से आए इस परवाने को ऐसे कूड़े में फेंका भी तो नहीं जा सकता था।

इसीलिए दोनों मियां-बीबी ने यह तय किया अदालत में जाकर ज़ारा अपना हलफनामा दे देगी
कि इस मसले से उसका कोई वास्ता नहीं है। मुकर्रर तारीख पर दोनों बाप-बेटी अदालत में समय से पहले ही जा पहुंचे। अदालत में हमेशा की तरह वकीलों और मुवक्किलों का हुजूम लगा हुआ था।

इश्तियाक साहब अदालत के बाहर एक बेंच पर ज़ारा के साथ बैठ गए। पेशी की हर पुकार पर उनका ध्यान बराबर से लगा हुआ था कि कहीं उनका नाम छूट न जाए। जैसे ही अदालत के चपरासी ने ज़ारा सिद्दीकी वल्द इश्तियाक सिद्दीकी पुकारा, वे फौरन उठ खड़े हुए और ज़ारा से बोले, ‘चलो बेटा।

अपनी पुकार हो गई है। फटाफट अपना बयान देकर घर वापस चलते हैं।’ फिर अदालत पर भुनभुनाते हुए गुस्सा निकालने लगे, ‘पता नहीं अदालत वाले बिना जांचे-परखे कैसे समन भेज देते हैं? उन्हें किसी की परेशानी से क्या वास्ता?’ पेशकार ने उनके आते ही जज साहब के सामने फाइल पेश कर दिया। क्या आप ही ज़ारा सिद्दीकी हैं?’ जज साहब
की गंभीर आवाज अदालत में गूंजी। ‘जी’, ज़ारा ने संक्षिप्त-सा जवाब दिया। ‘क्या आप रिचर्ड से शादी करना चाहती हैं?’ जज साहब का दूसरा सवाल आया।

‘जज साहब! यह किसी रिचर्ड को नहीं जानती है। यह समन हमारे पास गलती से आ गया है।’ ज़ारा की ओर से इश्तियाक साहब ने ही उसकी तरफ से जवाब दे दिया। ‘इसका जवाब ज़ारा सिद्दीकी को ही देना पड़ेगा।’ अदालत ने अपना आदेश दिया। ‘जी, जी। मा$फी चाहता हूं, हुज़ूर।’ फिर सहज भाव से ज़ारा की ओर देख कर बोले, ‘चलो बेटा! बता दो कि तुम किसी रिचर्ड को नहीं जानती और इस मसले से तुम्हारा कोई वास्ता नहीं है।’

इश्तियाक साहब की बात अभी ठीक से खत्म भी न होने पाई थी कि उधर ज़ारा जज साहब से मुखातिब हो चुकी थी, ‘सर! मैं रिचर्ड से शादी करना चाहती हूं और मैं बालिग हूं। यह रहे मेरे उम्र संबंधी प्रमाण पत्र।’ बेटी के इस चौंकानेवाले बयान से इश्तियाक साहब बिल्कुल सन्नाटे में आ गए, ‘तुम यह क्या बोल रही हो, बेटा? तुमने तो घर पर खुद बताया था कि तुम्हारा इस मसले से कोई वास्ता नहीं है। फिर यह सब!’ तब तक डायस के सामने रिचर्ड और उसकी ओर से कई वकील सामने आ गए और इश्तियाक साहब से जोर-जोर से बहस करने लगे, ‘आप लड़की को धमका नहीं सकते।

वह बालिग है और अपना भला-बुरा खुद सोच सकती है।’ उनकी चिल्लाना पल दर पल बढ़ती ही जा रही थी। इन सब हरकतों से इश्तियाक साहब बिल्कुल सकते में आ गए। उन्हें समझ में ही नहीं आ रहा था कि यह सब क्या हो रहा है? उधर वकील साहबान का शोर बढ़ता ही जा रहा था। उनके समर्थन में और कई वकील भी वहां आ गए, जिनके बीच वे बिल्कुल अकेले पड़ गए। उन्हें इस वक्त सलमा की बहुत याद आ रही थी, जिसने चलते समय उनसे कितना जि़द किया था कि वह भी उनके साथ अदालत चलना चाहती है।

लेकिन उन्होनें यह सोचकर कि अदालत में जाकर बस थोड़ी-सी खानापूरी ही तो करनी है, तो सलमा को क्यों ले चलें? वैसे भी उसके घुटनों में आजकल दर्द बना रहता है। सलमा के बारे में सोचकर वे और ज्यादा परेशान हो उठे कि घर जाकर उसको क्या बताऊंगा? क्या वो यह
हादसा झेल पाएगी?

सरेआम जि़ल्लत उठाने के बाबजूद ज़ारा की अम्मी की खातिर उस जबरदस्त शोर-शराबे के बीच एक बार हिम्मत कर उम्मीद भरी नजर से उन्होंने उससे दरख्वास्त किया, ‘बेटा! जज साहब को साफ-साफ बता दो न कि तुम्हारा इस मसले से कोई वास्ता नहीं और वापस चलो। अम्मी तुम्हारा घर पर इंतजार कर रही होंगी।’ लेकिन ज़ारा ने यह सुनकर अपना चेहरा फौरन दूसरी ओर घुमा लिया।

बुरे से बुरे ख्वाब में भी उन्होनें ऐसे खौफनाक पल की कल्पना नहीं की थी। इधर इश्तियाक साहब की बात सुनकर रिचर्ड की ओर के एक वकील साहब तो बिल्कुल अपना आपा ही खो बैठे और अदालत के सामने मेज पर बार-बार हाथ मारते हुए दबाव बनाने लगे कि किसी बालिग व्यक्ति को अपनी मर्जी के अनुसार जीवन जीने न देना गैरकानूनी है। इसलिए लड़की को धमकाने और बरगलाने के, जुर्म में लड़की के बाप के खिलाफ मुकदमा लिखकर उन्हें जेल भेजा जाए। शोर शराबा चरम पर पहुंच चुका था।

मौके की नज़ाकत को देखते हुए अदालत का पेशकार इश्तियाक साहब के कान में फुसफुसा कर बोला, ‘यह यहां रोज का वाकया है। आप यहां से धीरे से निकल जाइए। नहीं तो नाहक बेइज्जती उठानी पड़ेगी।’ उन्होंने अपने चारों ओर देखा। इस भरी अदालत में आज उनका कोई भी सगा नहीं था।

जिस बेटी का भरोसा कर वो अदालत में आए थे, वही आज अपने स्वार्थ के कारण उनसे मुंह मोड़ बेगानी हो चुकी थी। अब उनके पास चारा ही क्या बचा था? अपनी ही बेटी के हाथों ठगे हुये इश्तियाक साहब के बोझिल कदम से वहां से निकलने के लिए चल पड़े।

इतना सब होने के बावज़ूद उनके मन में ज़ारा के लिए बद्दुआ का ज़रा-सा भी ख्याल नहीं आया। लेकिन उन्हें बस इस बात का अफसोस हो रहा था जिस बेटी को उन्होंने अपनी जान से ज़्यादा ह्रश्वयार किया, उसने उन पर जरा-सा भी एतबार करना गवारा नहीं किया। काश!

एक बार तो उसने उनसे कहा होता कि पापा मुझे रिचर्ड पसंद है और मैं उससे शादी करना चाहती हूं और यदि मुझसे कोई झिझक थी तो अपनी अम्मी से ही अपने मन की बात कह देती। हो सकता है कि हम थोड़ा-बहुत झल्लाते पर क्या उसकी खुशियों को रौंद डालने की हम कभी सपने में भी सोच सकते थे? कभी नहीं। पर इस तरह धोखा देना! उन्हें अभी भी इस हादसे पर यकीन नहीं हो रहा था।

उनके पैर आगे की ओर बढ़ते, फिर रुक जाते। अदालत का दरवाज़ा अब बिल्कुल करीब आ चुका था। उन्होंने सारे गिले-शिकवों को परे रख वहां से निकलने के पहले अंतिम बार पीछे मुड़कर अपनी इकलौती बेटी की ओर देखा, जिसे उन्होंने बहुत नाजों से पाला था।

लेकिन बाप की सरेआम हो चुकी इतनी बेइज्जती से बेपरवाह वह इस वक्त भी अपने प्रेमी रिचर्ड के साथ बातचीत में बेखुदी की हद तक डूबी हुई थी। उसे इतना भी होश नहीं था कि उसके कारण उन्हें आज इस $कदर रुसवा होना पड़ रहा है। अपनी बेटी के हाथों धोखा खाने के बावजूद उन्होंने दोनों हाथों से सजदा करते हुए उसके भावी जीवन के लिए अल्लाहपाक से दुआ किया और बार-बार पोंछने के बाद भी बरबस नम हुई जा रही अपनी आंखों को आस्तीन से पोंछते हुए वहां से निकल गए।

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