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हार कर भी जीत गई आई: Aai Story
Haar Kar Bhi Jeet Gai Aai

Aai Story: आई को जब से मैंने होश संभाला बचपन से ही उन्हें एक मेहनती, महत्वाकांक्षी, लगनशील, साहसी व स्वाभिमानी नारी के रूप में देखा। संयुक्त परिवार में रहते हुए भी आई पूरे परिवार की जिम्मेदारी संभालने के साथ-साथ बाबा की प्रिंटिंग प्रेस भी संभालती थी। तब से लेकर आज तक 75 वर्ष की उम्र में भी उनके काम करने की रफ्तार कम नहीं हुई। वैसे ऊर्जा, लगन, त्याग, सेवा व जिम्मेदारी का बोझ संभालने की फिक्र के साथ रिश्तों को जोड़ने की आदत।
वैसे तो आई का पूरा ही जीवन कठिनाइयों के दौर संघर्ष में बीता। पर उन्होनें कभी हार नहीं मानी। और जब उनके अच्छे दिन आये तब तेज हवा के एक झौंके ने सब कुछ खत्म कर दिया। आई की खुशियों के पल के दौरान हंसती, मुस्कुराती व सघंर्ष से जूझते हुये, दुखद पलों में भी परिस्थितियों से समझौता करने की कोशिश की तस्वीरें, यादें आज भी मेरी आंखों के सामने फिल्मी रील की तरह प्रतिबिम्बित हो उठती है।
आई बताया करती थी कि ढाई साल की उम्र में ही उनकी मां का निधन हो गया था। पूरे घर में वो अपनी मां को ढूंढती फिरती। वो घर में सबसे अपनी मां के बारे जब भी पूछती तब परिवार के सभी लोग उन्हें यह कह कर बहला देते कि बेटा तुम्हारी मां तो अभी भगवान के घर गई हैं। दो-चार दिनों में जल्दी ही वापिस आ जाएंगी। पर नानी कभी वापिस नहीं आई। बड़ी होने पर ही उन्हें पूरी सच्चाई पता चली। नानाजी के रहते हुये बचपन में जिम्मेदारी का बोझ उठाते हुये वे छोटी उम्र में अपनी उम्र से कहीं ज्यादा ही समझदार हो गई। नानाजी भजन गायकी का शौक रखते थे। ऐसे में आई भी उनके साथ रहकर हारमोनियम व संगीत सीख गई।
बचपन में खेलकूद की जगह घर की जिम्मेदारी उठाते हुये वो चाहकर भी स्कूल की पढा़ई पूरी नहीं कर पाई। इसी बीच पंद्रह साल की छोटी उम्र में ही उनकी शादी करके नानाजी ने अपनी जिम्मेदारी से मुक्ति पा ली। पर आई को बचपन से ही सपने देखना व सपनों को सच करने में विश्वास था। ऐसे में शादी के बाद भी संयुक्त परिवार में रहते हुये भी उन्होंने रात-रात भर जाग कर पढ़ाई करके प्राइवेट परीक्षायें पास की। इसीलिये वो हमेशा घर का पूरा काम फटाफट निपटा लेती थी ताकि अपनी पढ़ाई कर सके। कई बार आई को अपनी बचपन की  सहेलियों को खेलते देखकर इच्छा होती थी कि वे भी लुक्का छिपी, आइस-पाइस, सतोलिया खेलें। ऐसे में दादी कभी-कभी उनको खेलने की इजाजत दे देती थी।
परिवार या आस-पड़ोस में कहीं भी शादी-ब्याह या तीज-त्यौहार हो तो आई के बजाये हारमोनियम के साथ गाये बन्ना-बन्नी गीतों के बिना पूरा नहीं होता था। साथ ही पुरानी फिल्मी गीतों का दौर भी चलता। इसमें उनकी पूरी सखी मंडली शामिल रहती। संगीत के साथ-साथ मां को बचपन से ही एक्टिंग करने का भी बेहद शौक रहा है। ऐसे में पचास-साठ के दशक में भी शादी के बाद भी आई नाटकों व रास लीला में भी भाग लेती रही। उसमें बाबा व दादा जी स्टेज की व्यवस्था, साजसज्जा को संभालते। दादाजी भी धु्रपद संगीत के गायक थे। घर में संगीत कला का परिवेश था। ऐसे में अपने वर्चस्व, वजूद व अपनी रूचियों को बरकरार रखते हुये आई पूरे परिवार का दायित्व निभाते हुये हमेशा सक्रिय रही। बाबा की प्रिंटिंग प्रेस घर में ही थी। ऐसे में घर के काम निपटाने के बाद प्रेस की पूरी जिम्मेदारी, मैनेजर का काम आई ही संभालती। उन में गजब की ताकत आत्मविश्वास व काम करने की चाहत थी। उन्हें देखकर हम सबको ताज्जुब होता था।
धीरे-धीरे संयुक्त परिवार एकल परिवार में बदलते गये। सबके अपने-अपने परिवार हो गये। हम भाई बहनों में छोटा भाई अमर पूरे परिवार में सबसेे अलग ही था। उसका दिन ही लतीफों से शुरू होता था। हंसना-हंसाना और सबकी मदद करना उसकी आदत में शामिल था। बचपन से ही अमर पेन्टिंग बनाने में माहिर था। उसके बनाये स्केच व पेन्टिंग की आये दिन प्रदर्शनी लगती। साथ ही उसकी पढ़ाई भी पूरी हो चुकी थी। इसी बीच उसको दिल्ली के अखबार  में बतौर आर्टिस्ट नौकरी मिल गई। छोटी सी उम्र में वो परिवार की जिम्मेदारी उठाना चाहता था। बाबूजी चाहते कि वो घर की प्रेस ही संभाले पर उसके कैरियर को देख कर आई बाबा ने उसे नौकरी ज्वाइन करने भेज ही दिया ।
जाते-जाते अमर ने कहा, ‘देखना मैं बहुत जल्दी आप सबको दिल्ली बुला लूंगा। बाबा अब आपको  बुढ़ापे में काम करने की क्या जरूरत है?’ तब बाबा ने हंसते हुये कहा था अरे! क्या कहा? बुढ्ढा होगा तेरा बाप। इसी तरह हंसी ठहाकों के बीच उसे सबने विदा कर दिया।
उसके जाने से घर-परिवार के साथ पूरा मोहल्ला ही सूना हो गया। ऐसा लगता था जैसे पूरे शहर की  ही रौनक चली गई हो। दिल्ली जैसे शहर में रहकर भी अमर अपने खर्च से कटौती करके हर महीने घर पैसे भेजता। समय तेजी से बीतता चला जा रहा था। हम बहनों की शादी हो गई। बाबा रिटायर हो गये। अमर नहीं चाहता था कि बुढ़ापे में आई बाबा अकेले रहें। ऐसे में उनके रिटायरमेन्ट के बाद उन्हें अपने पास दिल्ली बुला लिया। बाबा को अपनी पिं्रटिंग प्रेस मजबूरन बेचनी पड़ी।
आई बाबा को अपने साथ पाकर अमर बेहद खुश था। दिल्ली में फ्लैट में उनके लिये हर सुख सुविधा वाले कमरे को बड़े प्यार व जतन से तैयार किया। आई को लम्बे अर्से के बाद एक बार फिर से अपने बेटे के साथ रहने का मौका मिल ही गया। अकेले में जो सूनेपन की लकीरें उनके जीवन में खिंच गई थी अमर उन्हें मिटा देना चाहता था।  
अमर उनको हर छोटी से छोटी खुशी देने की कोशिश करता। अपने हंसमुख स्वभाव उच्च आंकाक्षायें, मेहनत, लगन व आत्मविश्वास के चलते वो छोटी ही उम्र में उच्च पद पर जा पहुंचा। प्रमोशन के साथ उसे ढेरो पुरस्कार, सम्मान मिलते गए। एक मां-बाप के लिये इससे बड़ी खुशी क्या हो सकती है। पूरा परिवार बेहद खुश था। घर में केवल बहू की कमी थी। ऐसे में बेटे के लिये चांद सी बहू लाकर मां नेे अपने कर्तव्य इतिश्री कर ली, दिन बीतते गए पर शायद विधाता को पूरे परिवार की खुशियां देखी नहीं गई। न जाने खुशियों को किस की नजर लग गई।
अचानक ही एक दिन पता चला कि अमर को कैंसर है। पूरा परिवार स्तब्ध, बेहद दु:खी हताश था। आई तो एकदम टूट सी गई। उनका लाड़ला इतनी छोटी उम्र में इतनी बड़ी गंभीर बीमारी का शिकार हो जायेगा ये तो किसी ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था। हर समय हंसी-मजाक करने वाले अमर के साथ विधाता इतना क्रूर मजाक करेगा किसी को विश्वास भी नहीं हो रहा था।
अमर के बीमार होने पर उसके खाने-पीने से लेकर दवाइयों तक का ट्रेन्ड नर्स की तरह पूरा ध्यान रखते हुये आई पूरी रात-रात भर जागती रहती। पूरे परिवार के होते हुए भी वो खुद ही अपने हाथों से ही अपने बेटे की सेवा करना चाहती थी। हर समय ईश्वर से अपने बेटे की सलामती की दुआ मांगती। कई पूजा-पाठ भी कराये। जिसने भी जो इलाज बताया वो उपाय किये। पर उसका कैंसर बढ़ता ही गया। इलाज के लिये अस्पताल एडमिट किया गया। वहां भी दर्द को सहते हुए वो डाक्टर्स, नर्स यहां तक कि वार्ड ब्वाय से भी हंसी-मजाक करना नहीं चूकता। लतीफे सुनकर कई बार डॉक्टर, नर्स भी उसे टोक देते कि मिस्टर अमर आप आराम करें तो उसका यही जवाब रहता जिन्दादिली इसी का नाम है, मुर्दा दिल खाक जिया करते हैं।
लम्बे इलाज के बाद जब हॉस्पीटल से छुट्टी मिली तो वहां के नॄसग स्टाफ की आंखों में आंसू थे। हॉस्पीटल से घर आने के बाद अमर ने एक बार फिर वही चिर परिचित मुस्कान के साथ सुबह माॄनगवाक में जाने के साथ ऑफिस का काम घर से ही शुरू कर दिया। समय तेजी से दौड़ रहा था। उसके चेहरे की थकान, आंखों के काले घेरों से दर्द साफ झलक रहा था। पर आई व परिवार वालों को दु:ख न हो ये सोचकर सबको ढांढस बंधाते हुये वो हमेशा यही कहता कि देखना मैं जल्दी ही ठीक हो जाऊंगा। आप चिंता मत करें। आई को भी उसके दर्द का पूरा अहसास था ऐसे में उसे हौसला देते हुये हमेशा कहती देखना मेरा राजा बेटा जल्दी ही ठीक हो जायेगा। वो दोनों अपनी-अपनी पीड़ा को अपने मन में अन्दर छिपाये एक दूजे को हमेशा ढांढस बंधाते।
पूरे परिवार की जिम्मेदारी के साथ बेटे की तीमारदारी में लगी आई को अपने खाने-पीने तक की सुध नहीं थी। उन्हें किसी पर भी विश्वास भी नहीं था। ऐसे में अपने बेटे के हर काम की जिम्मेदारी वो खुद ही लेना चाहती थी। कई बार तो घंटों एक पत्थर के बुत की तरह अमर जब सो जाता तब सामने बैठकर अपनी पथराई आंखों से उसके चेहरे को निहारती रहती।
पर सच तो ये था कि आई अंदर ही टूटती जा रही थी। कभी अकेले में भगवान के सामने तो कभी, छत में कपड़े सुखाते समय तो कभी रात को सोते समय नींद खुलने पर कई बार उनकी सिसकियां सुनाई दे जाती थी। पर पूछने पर हर बार उनका यह जवाब रहता, नहीं मैं भला क्यों रोउंगी? क्योंकि उन्हें पूरा विश्वास था कि उनका बेटा जल्दी ही ठीक हो जायेगा।    
पर शायद विधाता को कुछ और ही मंजूर था। किसी चमत्कार की आस लिए एक मां के सपनों का आखिर अन्त हो गया। कैंसर की आखिर जीत हो गई। आंसुओं का अथाह समुद्र जो लम्बे समय से उन्होंने सीने में अपार दर्द के साथ छिपाए रखा था वह आवेग एक तेज प्रवाह के साथ आज फूट पड़ा। अपने लाडले की तस्वीर के सामने बैठ कर उसके चेहरे को निहारती हुई वो सोचने लगती कि शायद उनका बेटा सामने आकर बोल दे, ‘देखो! आई, मैं आ गया।’ पर खुली आंखों से देखे सपने भी भला कभी सच होते हैं। वो आज भी सबसे कहती हैं कि मैंने अपने बेटे का नाम अमर रखा था वो भला कैसे मर सकता है। उनका बेटा कहीं नहीं गया है, यहीं उनके आस-पास है। घर के हर कोने-कोने में उसकी यादें बची है। उसकी यादों को तो निष्ठुर विधाता भी उनसे छीन नहीं सकता।
एक अपराजिता मां की अंतहीन यात्रा को यहीं विराम मिल गया। सभी को लगा कि अलसुबह से देर रात तक अपने बेटे की तीमारदारी, सेवा में लगी रहने वाली आई अब पूरी तरह खाली हो जायेगी। पर उन्होंने कभी हारना ही नहीं सीखा था। आई कहती कि मैं पराजित नहीं हुई हूं। मुझे अब अपने बेटे के अधूरे सपनों को साकार करना है। पर कुछ ही दिनों में हिमालय सी अडिग, सागर सी गंभीर अपार पीड़ा को अपने अन्तर्मन मन में समेटे आई धीरे-धीरे अंदर से बिलकुल टूट सी गई। नियति के आगे मजबूर होकर आखिर मां हार ही गई। पर इस हार में भी उनकी जीत छिपी हुई थी ममता, सेवा, संघर्ष, साहस, लगन, आस्था, विश्वास, आत्म शक्ति और परिस्थितियों से जूझने वाली एक अपराजिता मां भी भला कभी हार सकती है। ठ्ठ

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