निर्मला को अभी तक यकीन नहीं हो रहा था, एक बाई की बेटी और बारहवीं बोर्ड में फर्स्ट डिवीजन! कैसे हो सकता है ये! जिसके पास अच्छा स्कूल नहीं, कोचिंग की कोई सुविधा नहीं, यहां तक कि किताबें खरीदने तक के पैसे नहीं, वह फर्स्ट आना तो दूर, पास भी कैसे हो सकती है! वह भी सीबीएससी बोर्ड के एग्ज़ाम में! बात कुछ हजम नहीं हो रही थी। कहीं लता बाई झूठ तो नहीं बोल रही थी अपनी अकड़ को बनाए रखने के लिए।

बहरहाल अभी वह ये बात मांजी को नहीं बताएगी, बेकार को उनकी बड़बड़ाहट चालू हो जाएगी। सोचते हुए वह किचन में घुस गई, रात के खाने की तैयारी करने।

आज शाम की सैर पर निकली निर्मला का सामना उसकी पुरानी कामवाली बाई लता से हो गया। लता ने उसे अपनी बेटी रीना के फर्स्ट डिवीजन में पास होने की खुशखबरी सुनाई। निर्मला के मन में हैरानी के बादल अभी भी उमड़-घुमड़ रहे थे।

उसके दिमाग में चलचित्र की तरह दो साल पहले का वह दृश्य तैरने लगा.. ‘दीदी मैं चार दिन की छुट्टी पर जा रही हूं, आप थोड़ा देख लेना।’ लता ने बड़ी ही विनम्रता से कहा था।

‘तुझे भी अभी ही छुट्टी चाहिए, देखती नहीं, घर में मेहमान हैं। मुझे कितनी परेशानी होगी।’ निर्मला ने उसे धीमे स्वर में डांटते हुए कहा।

निर्मला के घर उसके सास-ससुर और दूसरे कई रिश्तेदार आए हुए थे।

‘आपको तो मालूम है, मैं कभी छुट्टी नहीं करती कि अगर जरूरी न होता। मेरा इकलौता भाई था वह, नहीं जाऊंगी तो मेरा मन मुझे धिक्कारेगा।’ लता ने बेबसी से कहा। उसके मायके में उसके भाई की बरसी थी, जिसमें उसका जाना जरूरी था।

‘अरे चिंता की क्या बात है। तू तो अकेली जा रही है न, अपनी बेटी को यहां भेज देना काम करने, वह जो कुछ दिनों पहले तेेरे साथ आई थी।’ निर्मला की सास ने पीछे से आते हुए किचन में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई।

‘वह तो अभी बच्ची है मांजी, झाड़ू-पोंछा, बर्तन कैसे कर पाएगी?’ दबे स्वर में निर्मला ने विरोध करना चाहा।

‘अरे चौदह-पंद्रह साल कोई छोटी उम्र होती है? हमने तो इस उम्र में पूरी घर-गृहस्थी संभाल ली थी। वैसे भी बाई की बेटी है, अभी से करेगी तो आगे चलकर उसी के काम आएगा।’ उन्होंने अपने अनुभव का ज्ञान सलीके से परोसा।

‘नहीं माता जी, मैं अपनी बेटी से बाई का काम हरगिज नहीं कराऊंगी। मेरी एक ही बेटी है। पढ़ने-लिखने में बड़ी होशियार। उसे मैं खूब पढ़ाना चाहती हूं, ताकि वह अपने पैरों पर खड़ी हो सके। मैं तो उससे अपने घर का काम भी नहीं कराती।’ लता ने धीमी, किंतु दृढ़ आवाज में कहा।

‘कैसी बातें करती है लता। पांव की जूती कभी सर पर पहनी जाती है! सदियों से जो काम तुम्हारे हिस्से आया है, वही करो। कौवा अगर हंस की चाल चलने की कोशिश करे तो अपनी चाल भी भूल जाएगा। अभी भी वक्त है संभल जाओ, नहीं तो न घर की रहोगी न घाट की।’ निर्मला की सास ने कड़े शब्दों में लता को चेतावनी दे डाली।

उस वक्त तो लता बिना कुछ कहे वहां से चली गई, पर उसकी आंखों से सा$फ जाहिर था कि मांजी की बात उसे अच्छी नहीं लगी। इस घटना के साल भर बाद ही निर्मला के सास-ससुर हमेशा के लिए उनके पास रहने आ गए।

अब तो उस घर में लता का काम करना भी दूभर हो गया। निर्मला की सास जब-तब उसके काम में बेवजह कमियां निकाल उसे खरी-खोटी सुनाया करतीं। उन्हें इस बात से बड़ी चिढ़ थी कि एक गरीब, छोटी जात की गंवार औरत ने उन्हें जवाब देने की हिम्मत की थी।

निर्मला उन्हें समझाने की बहुत कोशिश करती कि मांजी अब ज़माना बदल रहा है। हमें भी समयानुसार अपनी सोच में बदलाव लाना चाहिए, पर दकियानूसी मानसिकता की गुलाम उसकी सास उसे ही इस सबका जि़म्मेदार ठहराने लगतीं। उनका मानना था कि ये सब निर्मला द्वारा छोटे लोगों को अत्यधिक छूट दिए जाने का नतीजा है।

इसी बीच एक दिन लता के काम करने के दौरान उसकी बेटी किसी जरूरी काम से उसे बुलाने आ गई। लता को आधा काम बीच में ही छोड़कर जाना पड़ा। इस पर निर्मला की सास ने उसकी बेटी को काम पूरा करने के लिए कह दिया। ‘ठीक है आई, तू घर जा, मैं ये निपटा के आती हूं।’ कहकर रीना काम करने लगी।

काम करके घर वापस आई रीना का रुआंसा चेहरा देख लता ने कारण पूछा। रीना ने रोते हुए बताया कि काम वाले घर पर दादी ने उसे बहुत डांटा। कहने लगीं कि तेरे कारण तेरी मां को कितनी परेशानी उठानी पड़ती है। एक तो तेरा बाप उसे छोड़कर चला गया और ऊपर से तेरी पढ़ाई-लिखाई, महंगी-महंगी किताबें-कॉपी। क्या तेरा फर्ज नहीं कि अपनी मां को सहारा दे। कैसी बेटी है तू! अपने फायदे के लिए अपनी मां का बोझ बढ़ा रही है।

बेटी के मुंह से इतना सुनते ही लता का खून खौलने लगा। उसी वक्त बेटी का हाथ पकड़ कर वह निर्मला के घर आई। निर्मला की सास पान की पीक थूकने के लिए बाहर आई ही थी कि मेन गेट पर लता और उसकी बेटी दिखाई दी। निर्मला की सास ने एक प्रश्नवाचक निगाह दोनों पर डाली।

लता ने अपने दोनों हाथ उनके सामने जोड़ते हुए कहा, ‘आपका बहुत-बहुत धन्यवाद माता जी कि आपको मेरी इतनी चिंता है, लेकिन आपके हाथ जोड़ती हूं, आप मेरी चिंता भगवान पर छोड़ दें। मेरी बेटी की पढ़ाई-लिखाई मेरी जिम्मेदारी है, जिसे मैं बखूबी निभाऊंगी, भले ही उसके लिए मुझे रात-दिन एक करना पड़े। आपको मेरी बेटी की डोली नहीं उठानी है। अत: आप हम मां बेटी की चिंता न करें।’

तब तक आवाज सुनकर निर्मला भी बाहर बरामदे में आ खड़ी हुई। उसे कुछ मालूम नहीं था। 

लता ने उसे सारी सच्चाई बताते हुए कहा, ‘माफ करना दीदी, मैं आपकी बहुत इज्जत करती हूं, लेकिन आज के बाद इस घर में मैं काम न कर सकूंगी। आप कोई दूसरी बाई ढूंढ़ लेना।’ दो टूक कहकर लता अपनी बेटी को लेकर चली गई।

निर्मला अवाक खड़ी उसे जाते देखती रही। निर्मला की सास ने पान की पीक थूकते हुए बुरा सा मुंह बनाया और बोली, ‘भलाई का तो जमाना ही नहीं रहा।’

तब से आज तक करीब दस महीने हो चुके। लता ने भूले से भी कभी इधर का रुख नहीं किया और आज मिली भी तो इतनी खुशी और गर्व के साथ। रात में बिस्तर पर लेटी निर्मला उन्हीं मां-बेटी के बारे में सोचती जा रही थी… सच में दाद देनी पड़ेगी लता की हिम्मत की। उसने जो कहा करके भी दिखाया। उसकी बच्ची की मेहनत भी काबिलेतारीफ है, जिसने इतने कम साधनों में लगन और मेहनत के बल पर पढ़ाई का किला फतह कर लिया।

एक तरफ उसके खुद के बच्चे हैं, इतनी सहूलियतें देने के बाद भी बीई में बेटी का एडमिशन मैनेजमेंट कोटे में डोनेशन देकर करवाना पड़ा और बेटे का तो अभी से पढ़ाई में मन नहीं लगता। दो-दो कोचिंग करके भी जैसे-तैसे दसवीं में सिर्फ पास होने लायक नंबर लाया है।

सुबह बार-बार पति के आवाज देने पर निर्मला चिढ़ गई, ‘आ रही हूं बाबा, चाय के लिए ज़रा सा इंतजार नहीं होता आपसे। एक तो मांजी का मूड भी पता नहीं क्यों आज सुबह से खराब है।’ कहते हुए उसने चाय का कप पति को पकड़ाया।

‘अरे भई कमाल हो गया! तुम्हारी कामवाली बाई की बेटी बारहवीं की परीक्षा में पूरे जिले में तीसरे नंबर पर आई है। उसका नाम और फोटो आज के अखबार में है, देखो।’ पति ने उसे अ$खबार दिखाते हुए कहा। पहले पन्ने पर बड़े-बड़े शब्दों में रीना का नाम और फोटो देख कर वह भी दंग रह गई। वाकई कमाल है! कहां वह उसके पास होने पर भी हैरान थी और कहां उस बच्ची ने इतनी बड़ी सफलता हासिल की थी।

अब अचानक उसे सुबह-सुबह सास के चिढ़ने का कारण भी समझ में आ गया। जरूर उन्होंने ये न्यूज पढ़ी होगी और तिलमिला गई होंगी। खैर, मांजी के अभिमान की हार हुई थी और लता के स्वाभिमान की जीत, क्योंकि इंसान चाहे अमीरी-गरीबी, जात-पात और धर्म के नाम पर कितनी ही बंदरबांट क्यों न कर ले, लेकिन प्रतिभा किसी की मोहताज नहीं होती। अनंत आसमान अपनी बाहें फैलाए सबके लिए खड़ा है, जो पंख पसार कर उड़ने की हिम्मत करेगा, आसमान पर लिखी जीत उसी की होगी। हां, कल ही वह लता के घर जाकर दोनों मां-बेटी को बधाई देकर उनका मुंह मीठा कराएगी। सोचते ही उसके होंठों पर मुस्कान तैर गई।

यह भी पढ़ें –उफ! ये मुस्कुराहटें – गृहलक्ष्मी कहानियां

-आपको यह कहानी कैसी लगी? अपनी प्रतिक्रियाएं जरुर भेजें। प्रतिक्रियाओं के साथ ही आप अपनी कहानियां भी हमें ई-मेल कर सकते हैं-Editor@grehlakshmi.com

-डायमंड पॉकेट बुक्स की अन्य रोचक कहानियों और प्रसिद्ध साहित्यकारों की रचनाओं को खरीदने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें-https://bit.ly/39Vn1ji