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उत्कंठा-गृहलक्ष्मी कहानी: Hindi Kahani
Utkantha

Hindi Kahani: विकास महेश की बातों को अनसुनी करते हुए आगे बढ़ गया। किंतु महेश कहां कम था। वह विकास के पास दौड़कर गया और मरहम लगाते हुए कहा, ‘क्या डायरेक्टर सर ने तुमको बहुत डांटा है? पता नहीं कौन तुम्हारे बारे में हमेशा उनसे शिकायत करता है।’ आते के साथ बॉस से डांट मिलना पूरा दिन खराब होने के लिए काफी होता है। विकास के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था।
स्कूल में शिक्षण का कार्य करते हुए विकास को पांच साल हो चुके थे। ईमानदार और मेहनती के रूप में वह पूरे स्कूल में प्रचलित था। वर्तमान समय में किसी भी कार्यस्थल पर दो ही तरह के लोग मिलते हैं, पहला कामचोर जो चापलूसी करके प्रमोशन पा जाते हैं और दूसरा ईमानदारी और अपनी मेहनत के बल पर आगे बढ़ते हैं। महेश को स्कूल ज्वाइन किए हुए अभी दो साल ही हुए थे किंतु विकास महेश को पहले से जानता था।
विकास के जीवन ने कुछ इस कदर करवट बदला था कि समय के साथ उसे समझौता करना पड़ा। पारिवारिक परिस्थितियों ने उसे अपने लक्ष्य को बदलने पर मजबूर कर दिया। बड़े परिवार से ताल्लुक रखने वाला विकास जीवन से हारा नहीं सिर्फ उसने अपने आकाश को छोटा कर लिया। संघर्ष पथ पर चलते हुए परिस्थितियों ने उसे उस ओर धकेला जहां वह कभी जाना नहीं चाहता था। किंतु वक्त की मांग को देखकर उसने उसे सहर्ष स्वीकारते हुए स्कूल ज्वाइन कर लिया।
विकास के जेहन में आज भी वे तस्वीरें घूमती हैं। उसके बड़े से बंगले के सामने वह खपरैल का कच्चा घर, उसमें रहता एक बड़ा-सा परिवार और वो दो छोटी-छोटी सूनी आंखें, जो उस घर की खिड़की से झांका करती थी।
वो दो आंखें अक्सर विकास का पीछा करती थी। विकास उस समय स्कूल में था। अक्सर वह देखा करता था कि मोहल्ले के बच्चे गली में गिल्ली डंडा खेला करते थे। वो दो आंखें भी उनमें शामिल रहती थी। विकास की भी इच्छा होती थी उन लोगों के साथ खेलने की किंतु उसके घर में उन लोगों के साथ खेलने की अनुमति नहीं थी। वह खिड़की से अक्सर उन्हें निहारा करता था। एक तरफ उन दो आंखों का घूरना और दूसरी तरफ विकास का उन दो आंखों से अनुरक्ति। धीरे-धीरे यह बढ़ता गया।
जब भी विकास का बड़ा-सा गेट खुलता और उसमें से उसकी बड़ी गाड़ी निकलती तो मोहल्ले के बच्चे बहुत देर तक गाड़ी के पीछे-पीछे दौड़ते थे। विकास उस दिन स्तब्ध रह गया जब किसी ने उसकी गाड़ी पर पत्थर चलाया। उसने खिड़की से अपना सिर बाहर निकाला यह देखने के लिए कि कौन पत्थर चला रहा है तब तक दूसरा पत्थर उसके सर पर लगा। वही दो आंखें थी, विकास घायल हो चुका था, उसके सिर से खून बह रहा था। तब तक ड्राइवर ने उस बच्चे को पकड़ लिया और मारने को हाथ उठाया ही था कि विकास ने उसे रोक दिया। ड्राइवर बहुत गुस्से में था किंतु विकास के कारण वह रुक गया और विकास को लेकर हॉस्पिटल चला गया।
विकास मन से बहुत शांत बच्चा था, लेकिन कुछ बातें उसे परेशान करने लगी थी। उस बच्चे का पत्थर चलाना, उसकी हंसी उड़ाना या कभी-कभी गाली देना। वह सोचा करता, ‘मैंने उसका क्या बिगाड़ा है।’
जिंदगी कब किस से रूबरू करा दे इस रहस्य को कहां कोई जान पाया। समय पंख लगाकर कुछ आगे उड़ चुका था। उस दिन विकास अपनी बड़ी-सी गाड़ी में बैठा स्कूल जा रहा था। रास्ते में उसने देखा एक लड़का हांफ्ते हुए सड़क पर दौड़ रहा था। विकास ने उसे पहचान लिया, वही दो आंखें।
‘अरे यह तो वही है। उसने ड्राइवर को गाड़ी रोकने को कहा और उस लड़के को आवाज दी और पूछा, ‘क्या बात है?
उस लड़के ने लगभग रोते हुए कहा, ‘मेरी परीक्षा है और मेरी साइकिल खराब हो गई है। मुझे जल्दी पहुंचना है नहीं तो मेरी परीक्षा छूट जाएगी।
विकास की भी उस दिन परीक्षा थी किंतु विकास ने उसे अपनी गाड़ी में बिठा लिया और उसे उसके स्कूल छोड़ने के बाद वह अपने स्कूल गया। विकास और महेश की दोस्ती की यही शुरुआत थी।
वक्त बीता किंतु दोस्ती कायम रही और उस दिन प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण विकास ने जब महेश को बताया कि वह एक छोटा निजी स्कूल ज्वाइन कर रहा है तो उसके दोस्तों में सबसे ज्यादा मजाक महेश ने उड़ाया था, ‘इतने बड़े घर का लड़का एक छोटे से निजी स्कूल मे पढ़ायेगा। यह तुम्हारी गरिमा को शोभा नहीं देता।’ विकास ने कुछ नहीं कहा।
एक महीना बीत चुका था और आज विकास को पहली सैलरी मिली थी। तीन भाइयों में सबसे छोटा विकास अपने पैसे से पिता के इलाज में सहयोग करना चाहता था। बड़ी बीमारियों ने उसके पूरे परिवार को डस लिया था जिसके कारण आर्थिक समस्याएं इतनी बढ़ी कि विकास के कंधों पर सारी जिम्मेदारियां आ पड़ी थी। अचानक पीछे से किसी ने आवाज दिया था। विकास पीछे मुड़ा और चौंक पड़ा। महेश बदहवास होकर दौड़ता चला आ रहा था, ‘विकास मेरी मदद करो।’
रोते हुए महेश ने कहा था, ‘मेरे पिता का एक्सीडेंट हो गया है, हॉस्पिटल में भर्ती कराके आ रहा हूं। बहुत पैसे की जरूरत है।’ स्वभाव से सीधा-सादा, निश्चल और कोमल हृदय रखने वाला विकास द्रवित हो उठा और उसने सोचने में एक मिनट भी देर नहीं लगाई। अपनी पूरी सैलरी महेश के हाथों में सौंप दी।
नौकरी करते हुए विकास को तीन साल हो चुके थे। एक दिन अचानक महेश का फोन आया और उसने कहा, ‘मुझे नौकरी की बहुत जरूरत है। मेरी मदद करो विकास। अगर तुम्हारे स्कूल में कोई वैकेंसी है तो मेरे लिए बात करो। पिता के देहांत के बाद पूरे घर की जिम्मेदारी मेरे कंधों पर आ गई है। मैं बहुत परेशानी में हूं। मां और भाई-बहन को मुझे ही देखना है।’
विकास महेश की बातों पर फिर से द्रवित हो गया। उसने स्कूल मैनेजमेंट से बात करके महेश की नौकरी लगवा दी। सीधे-सादे विकास को क्या मालूम था कि उसने अपने ही पांव पर कुल्हाड़ी मार दी। जहां विकास बहुत कम बोलने वाला, मेहनती और ईमानदार था वहीं महेश वाचाल, कामचोर और चापलूस था। विकास ने कभी भी महेश की पारिवारिक और व्यक्तिगत बातें स्कूल में नहीं बताई और हमेशा उसे सहयोग करता रहा। किंतु महेश, वह तो पता नहीं क्यों विकास को हर समय नीचा दिखाने की कोशिश में लगा रहता।
एक दिन ऐसा भी आया कि मैनेजमेंट की चापलूसी करते-करते और विकास की छवि बिगाड़ते-बिगाड़ते महेश स्कूल का प्रिंसिपल बन बैठा क्योंकि विकास की मेहनत और लगन के कारण पूरे स्कूल में यह चर्चा थी कि अगला प्रिंसिपल विकास ही बनेगा। समय बीत रहा था और महेश का व्यवहार विकास के साथ बुरा होता चला गया। सामने में वह अच्छा बना रहता है और पीठ पीछे उसकी जड़े खोदता रहता और अंत में उसने विकास को स्कूल छोड़ने पर मजबूर कर दिया।
काफी समय बीत चुका था। विकास की दुनिया बदल चुकी थी। वह विवाहित जीवन में प्रवेश कर चुका था साथ ही किसी दूसरे स्कूल में प्रिंसिपल बन चुका था। किंतु महेश को वह भूल नहीं पाया था। उसके मन में आज भी यह सवाल घूमता था कि आखिर महेश का व्यवहार उसके प्रति वैसा क्यों था उसने उसका क्या बिगाड़ा था।
रात के दो बज रहे थे अचानक फोन रिंग हुआ। अर्द्धनिद्रा में विकास ने फोन उठाया, उसके किसी पुराने मित्र का था। उसने फोन पर जो बातें कही यह सुनकर विकास स्तब्ध रह गया। महेश का एक्सीडेंट हो गया था। पैर फ्रैक्चर हो चुके थे, वह उठने की स्थिति में नहीं था, सिर में भी काफी चोट था, काफी खून बह चुका था। महेश ने किसी तरह से फोन करके अपने एक मित्र को बुलाया किंतु आधी रात को कोई सवारी नहीं मिली। उस मित्र के पास गाड़ी भी नहीं थी कि उसे हॉस्पिटल ले जा सके और दूसरी तरफ उस समय ना महेश के पास ना उसके मित्र के पास इतने पैसे थे कि एंबुलेंस बुलाकर वह उसे हॉस्पिटल में एडमिट करा सकता था। महेश बहुत देर तक वैसे ही सड़क पर पड़ा रहा। अचानक उसके मित्र को विकास की याद आई। विकास से उसकी जान-पहचान थी। उसने विकास को फोन किया और स्थिति बताई।
विकास उठा। पत्नी ने सवाल किया किंतु उसने कोई जवाब नहीं दिया और वह सीधे अपने गैरेज में गया और गाड़ी निकाली। किंतु जैसे ही गाड़ी लेकर वह आगे बढ़ा, वही सरकारी काम, सड़क को खोदकर छोड़ दिया गया था। गाड़ी वहां से नहीं जा सकती थी। लाचार होकर विकास लौट गया और उसने अपनी बाइक निकाली। बाइक से वह किनारे-किनारे सड़क को पार करता हुआ मेन सड़क तक पहुंचा। फिर तेज बाइक चलाते हुए पहले हॉस्पिटल गया और वहां से उसने एंबुलेंस लिया और उसे लेकर ही वह घटनास्थल पर पहुंचा। ऐसा उसने इसलिए किया कि फोन करना, घटनास्थल के बारे में बताना और तब पता नहीं कितनी देर में एंबुलेंस पहुंचता। समय बर्बाद ना हो इसी कारण उसने ऐसा किया। महेश को हॉस्पिटल में एडमिट करने के बाद उसने उसके घरवालों को फोन किया। पता चला उसकी पत्नी और बच्चे गांव गए हुए थे। उन्हें आने में एक दिन का समय लगता। महेश को जब तक होश नहीं आया तब तक विकास हॉस्पिटल में रहा। हॉस्पिटल का सारा खर्च उसने वहन किया। उसके घर वाले चौबीस घंटे बाद पहुंचे। महेश जब तक खतरे से बाहर नहीं हुआ तब तक विकास हॉस्पिटल में रहा। जब उसकी हालत सुधरने लगी तब उसे उसके घर वालों को सौंपकर वह घर लौटा।
पन्द्रह दिन बीत चुके थे विकास अभी तुरंत बाहर से ही आया था कि फोन रिंग हुआ। महेश की पत्नी का फोन था। उसने आग्रह करके अपने घर विकास को बुलाया था। इतने दिन तक विकास की पत्नी मौन थी लेकिन जब थका-हारा विकास उसके घर जाने के लिए तैयार हुआ तब उसकी पत्नी बिफर पड़ी, ‘जिस व्यक्ति ने तुम्हें जीवन भर हानि पहुंचाई क्यों तुम हमेशा उसकी मदद करने के लिए तैयार हो जाते हो। कल वह ठीक हो जाएगा और फिर से तुम्हें हानि पहुंचाने की कोशिश करेगा।’ विकास नहीं माना और चला गया।
विकास महेश के बिस्तर से कुछ दूर कुर्सी पर बैठा उसे चुपचाप देख रहा था। महेश के आंसू रुक नहीं रहे थे। उसने हाथ जोड़कर रोते हुए कहा, ‘विकास मैं माफी के लायक भी नहीं हूं फिर भी मुझे माफ कर दो। अपनी गलती का मुझे एहसास हो चुका है। तुम मेरी मदद करते रहे और मैं हमेशा तुम्हे हानि पहुंचाने की कोशिश करता रहा। इसके लिए शायद अंतिम सांस तक भी प्रायश्चित करूं तो कम ही पड़ेगा।’ यह कहकर वह जोर जोर से रोने लगा।
विकास ने अपनी चुप्पी तोड़ी और पूछा, ‘महेश एक बात बताओ मेरे प्रति तुम्हारा व्यवहार वैसा क्यों था?’ और फिर महेश ने जो बताया यह सुनकर विकास हतप्रभ रह गया।
‘बचपन से ही मैं तुम्हारा बंगला, गाड़ी, ड्राइवर, नौकर-चाकर, तुम लोगों का रुतबा देख कर बहुत आकर्षित रहता था। उस समय मैं बच्चा था। मुझे भी तुम्हारी तरह जीने का मन होता था। यह इच्छा बढ़ती गई और जब मुझे यह एहसास हुआ कि यह इच्छा दूर-दूर तक पूरी होने वाली नहीं है तब मुझ में विकृतियां आने लगी। ईर्ष्या, जलन, क्रोध इन सब ने मुझे घेर लिया और धीरे-धीरे यह हीन भावना में तब्दील हो गया। एक तरफ मैं तुम्हारे पास भी आना चाहता था दूसरी तरफ मैं तुमसे नफरत भी करता था। एक तरफ तुमसे मदद भी मांगता था और दूसरी तरफ तुम्हारी मदद मुझे भीख जैसी लगती थी। जब तुम्हारी परिस्थितियां प्रतिकूल होने लगी तो मुझे भीतर से आनंद आने लगा। यही कारण था कि मैंने तुम्हें स्कूल छोड़ने पर मजबूर कर दिया। मैं अपने को तुम से आगे देखना चाहता था। इसी प्रचंड उत्कंठा ने मेरे व्यवहार को विकृत बना दिया था। किंतु आज मैं तुम्हारे सामने नतमस्तक हूं कि किस फरिश्ते से मैं बदला ले रहा था। तुम तो मेरे लिए फरिश्ता हो…, फरिश्ता।’
विकास सर झुकाए सब सुनता रहा उसने कुछ नहीं कहा और चुपचाप जाने लगा किंतु दरवाजे के पास रुक कर वह पीछे मुड़ा और कहा, ‘महेश मैं कोई फरिश्ता नहीं सिर्फ इतना जानता हूं कि व्यक्ति अमीर हो या गरीब उसके किसी भी परिस्थिति में उसके कर्म और संस्कार ही उसके साथ रहते हैं बाकी सब कुछ पीछे छूट जाता है।’
कुछ पल उसने महेश को रोते हुए सूनी आंखों से देखा और फिर बाहर निकल गया।

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