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भीमादेव-21 श्रेष्ठ लोक कथाएं मध्यप्रदेश
Bheemadev

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

भीमादेव-बहुत समय पहले की बात है। प्रलय के बाद धरती पानी में डूबी हुई थी। जैसे तूम्बा (सूखी हुई गोलाकार लौकी) पानी में तैरता रहता है, वैसे ही धरती भी पाने में तैर-उतरा रही थी।

भगवान ने भीमादेव को भेजा कि धरती पर खेती करते हुए जीव-जंतुओं का विकास करे। भीमदेव ने पृथ्वी को पानी से तर-ब-तर देखा तो फूक मारकर कुछ भूमि को सुखाया और पैरों से कूटकर कड़ा बनाया। वह जमीन खेती के काबिल हो गई तो भीमादेव ने उस पर बीज छिड़के। बीजों से पेड़-पौधे होने पर भीमादेव ने डड्डे बुरका नाम का आदमी बनाया। डड्डे बुरका को अकेला देखकर भीमादेव ने एक स्त्री को बनाया।

डड्डे बुरका और वह स्त्री मिलकर पेड़ों से फल तोड़कर खाते और इधर-उधर घूमते रहते। बरसात में पानी गिरने पर उन्हें परेशान देखकर भीमादेव ने मिट्टी के ढेर बनाये जो बड़े होकर पहाड़ बन गए। डड्डा बुरका और उस स्त्री ने पहाड़ों पर चढ़कर पानी से जान बचाई। दोनों पहाड़ों की गुफा में रहने लगे। उनमें पहले लगाव और फिर प्रेम हो गया। उन्होंने दस पुत्रों और दस पुत्रियों को पैदा किया।

इनके बड़ा होने पर डड्डे बुरका ने बकरा, बंदर, सर्प आदि को मारना-खाना मनाकर, बीज देकर बोना और फसल उगना सिखाया. फिर उन्हें दस जोड़े बनाकर उन्हें अलग-अलग कर दिया। इन दस जोड़ों से कछिम, मुचकी, मड़ावी, मरकामी, लेकामी, केवासी, मिडिचामी, पुन्नेम, कंजामी, कड़वी गोत्रों का आरंभ हुआ। डड्डे बुरका ने इनको अपने बच्चों की शादी आपस में न कर, अलग-अलग गोत्र में करने का आदेश दिया। जोड़ों को जिन पशुओं-पक्षियों को मारने-खाने से रोका गया, वे उनके कुलदेव के रूप में पूजे जाने लगे।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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