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Bhagwan Vishnu Katha: प्राचीन समय की बात है, अंगिरा ऋषि के भूति नाम के एक शिष्य थे । वे बड़े क्रोधी स्वभाव के थे और छोटी-सी गलती पर भी कठोर शाप दे देते थे । उनकी वाणी बड़ी कठोर थी । उनके क्रोध से ऋषि, मुनियों, मनुष्यों, गंधर्वों, यक्षों के साथ-साथ देवता भी भयभीत रहते थे ।

उनके भय से पवनदेव कभी भी हवा को उनके आश्रम पर तेज नहीं चलने देते थे । सूर्यदेव अपनी प्रचण्ड किरणों को आश्रम के निकट ही रोक लेते थे, जिससे कि अधिक गर्मी न हो । वरुण अपने मेघों को उनके आश्रम पर अधिक जल नहीं बरसाने देते थे । मुनिवर का कमण्डलु सदा जल से भरा रहता था । उनके भय से सभी ऋतुएँ सदाबहार ढंग से वनाश्रम में वास करती थीं और भूति मुनि की सेवा में फल-फूल प्रस्तुत करती थीं ।

भूति मुनि के एक भाई थे, जो सुवर्चा नाम से प्रसिद्ध थे । एक बार वे उनके पास आए और विनती करते हुए बोले – “मुनिवर ! आपकी कृपा से मैं एक विशाल यज्ञ का आयोजन कर रहा हूँ । इस यज्ञ में गौतम, कश्यप, अगस्त्य, वसिष्ठ, मेधा, सहित अनेक ऋषि-मुनियों तथा इन्द्र वरुण सूर्य बृहस्पति आदि देवगण को आमंत्रित किया गया है । मेरी प्रार्थना है कि आप इस यज्ञ के प्रधान पुरोहित बनें । आप मेरे भ्राता हैं । वेदों और शास्त्रों का ज्ञानी सारे संसार में आपसे बढ़कर कोई नहीं है । अतः आप यज्ञ-पुरोहित बनकर मुझे कृतार्थ करें ।”

भूति मुनि बोले – “सुवर्चा ! तुम्हारे आने से कुछ समय पूर्व ही मैंने यज्ञाग्नि प्रज्वलित की है । यज्ञ वेदी में अग्नि जलाने के बाद बिना यज्ञ किए उसे बुझाने पर यज्ञ करने वाला घोर पाप का भागी बनता है । इसलिए मैं बिना यज्ञ किए इस अग्नि को नहीं बुझा सकता । तुम किसी और श्रेष्ठ मुनि को पुरोहित बनाकर अपना यज्ञ सम्पन्न करवा लो ।”

सुवर्चा हाथ जोड़कर बोला – “भ्राताश्री ! आपके बिना यज्ञ सम्पन्न करवाना बिना स्तुति किए भगवान् को प्रसन्न करने के समान है । मैंने सभी ओर यह संदेश भेज दिया है कि इस यज्ञ के पुरोहित आप होंगे । आपके दर्शनों के लिए अनेक ऋषि, मुनि, मनुष्य और देवता यज्ञशाला में विराजमान हैं । यदि आप अभी मेरे साथ नहीं चल सकते तो मैं यहीं बैठकर आपकी प्रतीक्षा करूँगा । मैं कोई भी भयंकर पाप भोगने को तैयार हूँ, किंतु आपकी अनुपस्थिति में यज्ञ के बारे में मैं कदापि नहीं सोच सकता ।”

तब भूति मुनि ने उसी क्षण शांति नामक अपने शिष्य को बुलवाया । वह परम बुद्धिमान, शांत, विनीत, जितेन्द्रिय, गुरु के कार्य में सदा संलग्न रहने वाला, सदाचारी और धर्मात्मा जीव था । वह गुरुवर को प्रणाम कर आज्ञा की प्रतीक्षा करने लगा । मुनि बोले – “वत्स! मैं सुवर्चा के यज्ञ में जा रहा हूँ । मैंने यज्ञ-वेदी में अग्नि प्रज्वलित की है । मेरी अनुपस्थिति में तुम इसका ध्यान रखना । मेरे आने से पहले यह अग्नि कदापि बुझने न पाए ।” शांति ने गुरु की आज्ञा शिरोधार्य कर ली । इस प्रकार भूति मुनि निश्चित होकर सुवर्चा के साथ यज्ञ में चले गए ।

इधर प्रतिदिन के नियम के अनुसार गुरु की सेवा के लिए फल, फूल और जल आदि एकत्रित करने के लिए शांति वन में चला गया । किंतु वहाँ उसे देर हो गई और तब तक भूति मुनि द्वारा जलाई गई यज्ञ-वेदी की अग्नि बुझ गई । अग्नि को शांत देख शांति को अत्यंत दुःख हुआ । वह सोचने लगा – ‘गुरुवर ने मुझे योग्य समझकर यह कार्य सौंपा था, किंतु उनके द्वारा सौंपे गए कार्य में असफल होकर मैंने अपनी अयोग्यता सिद्ध कर दी । गुरुवर त्रिकालदर्शी हैं । यदि इसके स्थान पर मैं दूसरी अग्नि स्थापित करूँगा तो वे पलभर में सब जानकर मुझे शाप देकर भस्म कर देंगे । मुझसे घोर पाप हो गया । इस पाप से बचने के लिए मुझे अग्निदेव का स्मरण करना चाहिए । वे अवश्य मेरी सहायता करेंगे ।’ शांति ने भगवान् अग्निदेव की स्तुति आरम्भ कर दी । उसकी स्तुति से प्रसन्न होकर अग्निदेव वहाँ प्रकट हुए और वर माँगने के लिए कहा ।

तब शांति बोला – “भगवन् ! आपके दर्शनों से मैं धन्य हो गया । प्रभु ! मेरी इच्छा है कि जब मेरे गुरुदेव यज्ञ से वापस आएँ, तब वे आपको यज्ञ-वेदी में यथास्थान देखें । साथ ही आप उन्हें एक सुयोग्य पुत्र प्रदान करने की कृपा करें । वे अपने पुत्र से जितना प्रेम करें, उतना ही प्रेम वे अपने शिष्यों और अन्य जीवों से भी करें । उनका मन कोमल और दयालु हो जाए । आप मेरी ये इच्छाएँ पूरी करने की कृपा करें ।”

अग्निदेव बोले – “वत्स ! तुमने गुरु के लिए सबकुछ माँग लिया और अपने लिए कुछ भी नहीं । तुम्हारी इस भक्ति से मैं अति प्रसन्न हूँ । मैं तुम्हें अभीष्ट वर प्रदान करता हूँ । भूति मुनि का पुत्र अपने बल और पराक्रम से सम्पूर्ण पृथ्वी को जीतकर चौदहवें मन्वंतर का स्वामी बनेगा और भौत्य मनु के नाम से प्रसिद्ध होगा ।” शांति को वर देकर अग्निदेव पुन: यज्ञ वेदी में प्रज्वलित हो गए ।

जब भूति मुनि आश्रम पहुँचे, तब अग्नि को प्रज्वलित देख उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई । उन्होंने शांति को अपने निकट बुलाया और बोले – “वत्स ! तुम पर और अन्य जीवों पर मेरा स्नेह बहुत बढ़ गया है । मैं नहीं जानता ऐसा किस कारणवश है? यदि तुम्हें कुछ पता हो तो बताओ ।”

शांति ने उन्हें सबकुछ सच-सच बता दिया । सच सुनकर उनकी आँखों में आँसू आ गए । उन्होंने शांति को प्रेम से गले लगा लिया और उसी समय उसे अपना सम्पूर्ण दिव्य ज्ञान प्रदान किया ।

तत्पश्चात् भूति मुनि को भौत्य नामक एक पुत्र की प्राप्ति हुई । वह एक वीर और पराक्रमी बालक था । युवा होने पर वह चौदहवें मन्वंतर का स्वामी बना ।

इस मन्वंतर में शुचि नामक इन्द्र हुए । अग्नीध्र, अग्निबाहु, शुचि, माधव, शक्र, मुक्त और अजित – ये सातों सप्तर्षि हुए । इस मन्वंतर में भगवान् विष्णु ने सत्रायण की पत्नी विताना के गर्भ से बृहभ्यानु के रूप में अवतार लिया । इस अवतार में उन्होंने संसार में कर्म काण्ड का विस्तार किया ।

ये कथा ‘पुराणों की कथाएं’ किताब से ली गई है, इसकी और कथाएं पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं Purano Ki Kathayen(पुराणों की कथाएं)