Bhagwan Vishnu Katha: प्राचीन समय की बात है, विपुलस्वान नामक मुनि के घर सुकृष और तुम्बरु नामक दो पुत्र हुए, जो अपनी तपस्या के बल से प्रसिद्ध ऋषि हुए । इनमें सुकृष मुनि ने अपनी कठोर तपस्या से ब्रह्माजी को भी प्रसन्न कर लिया था । उनके आशीर्वाद से सुस्म मुनि के घर चार पुत्र उत्पन्न हुए ।
युवा होने पर चारों पुत्र सुकृष मुनि की सेवा करने लगे । सुकृष मुनि महात्मा, धर्मात्मा इन्द्रिय विजयी थे । उनकी कीर्ति तीनों लोकों में फैली थी । पृथ्वी पर ऋषि, मुनि, गंधर्व, मनुष्य-सभी उन्हें देवराज इन्द्र के समान सम्मान देते थे ।
जब देवराज इन्द्र को यह बात सात हुई तो उन्होंने सुकृष मुनि की परीक्षा लेने का निश्चय किया । उन्होंने उसी क्षण एक वृद्ध गिद्ध का वेश बनाया और सुकृष मुनि के समक्ष आ बैठे । वृद्धावस्था के कारण उस गिद्ध का शरीर दुर्बल, क्षीण एवं शिथिल था । नेत्र लाल थे और पंख टूट गए थे । सुकृष मुनि ने उससे वहाँ आने का कारण पूछा ।
गिद्धरूपधारी इन्द्र ने हाथ जोड़कर कहा – “मुनिवर ! विंध्य पर्वत के शिखर पर मेरा वास है । वहाँ तेज हवा चलने के कारण मैं पृथ्वी पर आ गिरा और मूर्च्छित हो गया । एक सप्ताह तक मूर्च्छित रहने के बाद आज मुझे होश आया है । इस समय मुझे बहुत भूख लग रही है । मैं भोजन की इच्छा से आपके पास आया हूँ । मैंने तीनों लोकों में आपकी ख्याति सुनी है । आप शरणागत की सदैव रक्षा करते हैं । कृपया आज मेरी भी रक्षा कीजिए । मैं आपकी शरण में हूँ । मुनिवर! मैं भूख से व्याकुल हो रहा हूँ । मुझे भोजन दीजिए, जिससे कि मैं अपना जीवन बचा सकूँ ।”
गिद्ध की बात सुनकर महर्षि सुकृष बोले – “गिद्धराज ऋषि-मुनियों के आश्रम का यह नियम होता है कि चाहे मित्र हो अथवा शत्रु, कोई वहाँ से निराश नहीं लौटता । मैं अभी तुम्हारे लिए भोजन की व्यवस्था करता हूँ । बताओ तुम्हें कैसे आहार की आवश्यकता है?“
गिद्ध बने इन्द्र बोले-“मुनिवर! गिद्ध की तृप्ति केवल मांस से होती है । यदि आप मुझे भोजन करवाना चाहते हैं तो मेरे लिए मांस की व्यवस्था कर दीजिए । मैं प्रसन्न होकर उसे स्वीकार कर लूँगा । किंतु मुनिवर! यदि आप ऐसा करने में असमर्थ हों तो मुझे निस्संकोच बता दें । फिर मैं यहाँ से निराहार ही लौट जाऊँगा ।”
महर्षि सुकृष सोच में पड़ गए । नियम का पालन करने के लिए वे किसी जीव की हत्या नहीं कर सकते थे । किंतु अतिथि को निराहार भी नहीं लौटाया जा सकता था । अंत में सोच-विचार के बाद उन्होंने अपने चारों पुत्रों को बुलाया और उनसे बोले – “पुत्रो ! यदि तुम मन से मेरी पूजा-आराधना करते हो और यह बात स्वीकार करते हो कि पिता परम पूजनीय होते हैं, उनकी आज्ञा देव-आज्ञा के समान होती है तो मेरे वचन का पालन करो ।”
चारों पुत्रों ने सुकृष मुनि का कार्य पूरा करने का वचन दिया । तब सुकृष ऋषि प्रेमपूर्वक बोले – “पुत्रो ! यह पक्षी भूख से पीड़ित होकर हमारी शरण में आया है । अतिथि की सेवा करना हमारा परम धर्म है । इसे केवल मांस प्रिय है । अतः इसकी भूख शांत करने के लिए तुम अपना मांस और रक्त इसे अर्पित कर मेरे वचन और आश्रम के नियम को पूरा करो ।”
यह सुनते ही चारों मुनिकुमार भय से काँपने लगे । वे एक-साथ बोल उठे – “पिताश्री! ये क्या कह रहे हैं आप? एक तुच्छ पक्षी की भूख शांत करने के लिए आप अपने प्रिय पुत्रों को मृत्यु के हाथों में सौंप रहे हैं! हम इतने मूर्ख नहीं कि इस प्रकार अपने शरीर का नाश कर लें? क्षमा करें पिताश्री, हम आपका यह कार्य कदापि पूरा नहीं कर सकते ।”
पुत्रों की बात सुन सुकृष क्रोधित हो गए । उनकी आँखों से अंगारे बरसने लगे । उन्होंने कमण्डलु से जल लिया और बोले – “दुष्टो ! वचन देकर भी तुम उसे पूरा नहीं करना चाहते । अपने इस कार्य से तुमने मेरा नाम कलंकित किया है । इसलिए मैं तुम्हें शाप देता हूँ कि तुम पक्षी योनि में जन्म लो ।” यह कहकर सुकृष मुनि ने हाथ में लिया जल अपने चारों पुत्रों पर छिड़क दिया ।
फिर वे गिद्ध बने इन्द्र से बोले – “हे पक्षीराज ! सत्य का पालन करना ही ब्राह्मण का ब्राह्मणत्व होता है । ब्राह्मण यज्ञों अथवा अन्य कर्मों के अनुष्ठान से वह महान् पुण्य प्राप्त नहीं कर सकते, जो उन्हें सत्य की रक्षा करने से प्राप्त होता है । मैं अपना शरीर तुम्हें आहार के रूप में समर्पित करता हूँ । तुम निश्चित होकर अपनी भूख शांत करो ।”
महर्षि के इस बलिदान से इन्द्र को बड़ा आश्चर्य हुआ । उन्होंने तत्काल गिद्ध का वेश त्याग दिया और अपने वास्तविक रूप में प्रकट होकर बोले – “मुनिवर ! मैंने आपकी परीक्षा लेने के लिए यह वेश धारण किया था । मुझे क्षमा करें । आपकी सत्यनिष्ठा से मेरे मन में आपके प्रति श्रद्धा उत्पन्न हो गई है । मैं आपको दिव्य ज्ञान प्रदान करता हूँ । अब आपकी तपस्या और धर्म में कोई विघ्न उपस्थित नहीं होगा ।” इस प्रकार महर्षि सुकृष को वरदान देकर इन्द्र वहाँ से चले गए । उनके जाने के बाद चारों मुनिकुमार पिता के चरणों में गिर पड़े और क्षमा माँगने लगे ।
उनकी करुण प्रार्थना से शांत होकर महर्षि सुकृष बोले – “पुत्रो ! यह सब देवलीला थी । इसी ने आज मुझसे यह कर्म करवा दिया । मेरे मुख से निकले वचन कभी मिथ्या नहीं हुए हैं । मैंने तुम्हें जो शाप दिया वह अवश्य सिद्ध होगा । किंतु तुम्हारी प्रार्थना से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ । अतः पक्षी योनि में जन्म लेने के बाद भी तुम्हें दिव्य ज्ञान प्राप्त होगा । ज्ञान से तुम्हें सन्मार्ग का दर्शन होगा । तुम्हारे समस्त पाप धुल जाएँगे और तुम्हें परम सिद्धि प्राप्त होगी ।”
इस प्रकार सुकृष मुनि के शाप के कारण चारों मुनिकुमार पक्षी योनि में कंधर की पुत्री ताक्षीं के गर्भ से उत्पन्न होकर परम ज्ञानवान हुए ।
ये कथा ‘पुराणों की कथाएं’ किताब से ली गई है, इसकी और कथाएं पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Purano Ki Kathayen(पुराणों की कथाएं)
