Bhagwan Vishnu Katha: प्रजापति कर्दम ब्रह्माजी के मानस पुत्र थे । ब्रह्माजी ने जब उन्हें प्रजा की उत्पत्ति करने का परामर्श दिया, तब भगवान् विष्णु को प्रसन्न करने के लिए वे सरस्वती नदी के तट पर कठोर तपस्या करने लगे । उनकी तपस्या दस हजार वर्षों तक चली । उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान् नारायण वहाँ प्रकट हुए । उनका मुखमण्डल सूर्य के समान दैदिप्यमान था । गले में कमल पुष्पों की माला और शरीर पर पिताम्बर सुशोभित थे । उन्होंने कर्दम से इच्छित वर माँगने के लिए कहा ।
भगवान् विष्णु का मनोहारी स्वरूप देखकर महर्षि कर्दम आत्मविभोर हो गए और उनकी स्तुति करते हुए बोले – “भगवन्! आप ब्रह्माण्ड के आधार हैं । देवता, ऋषि, मुनि, गंधर्व, मनुष्य-सभी आपके दर्शनों को आतुर रहते हैं । आपके दर्शन पाकर मैं कृतार्थ हो गया । प्रभु ! यदि आप मेरी तपस्या से प्रसन्न हैं तो मुझे भोग और मोक्ष प्रदान करें, जिससे कि सृष्टि रचना करके मैं पितृ ऋण से मुक्त हो सकूँ ।”
कर्दम मुनि की भक्तिपूर्ण स्तुति सुनकर श्रीविष्णु बोले – “वत्स ! जिस कार्य की पूर्ति के लिए तुमने मेरी उपासना की है, तुम्हारे मन के उस भाव को जानकर मैंने पहले ही उसकी व्यवस्था कर दी है । मेरी उपासना कभी निष्फल नहीं होती । ब्रह्माजी के पुत्र स्वयंभू मनु तीन दिन के बाद अपनी पत्नी शतरूपा सहित आपसे मिलने आएँगे । उनकी परम सुंदर, सुशील और साध्वी कन्या देवहूति एक योग्य पति की खोज में है । तुम सर्वथा उसके योग्य हो, इसलिए स्वयंभू मनु अपनी कन्या देवहूति का विवाह तुम्हारे साथ करने के इच्छुक हैं । हजारों वर्षों से तुम्हारा मन जिस सुयोग्य पत्नी के लिए व्याकुल है, वह तुम्हारे अनुरूप होकर तुम्हारी यथेष्ट सेवा करेगी । उससे तुम्हें नौ पुत्रियों प्राप्त होंगी, जिनका विवाह मरीचि आदि श्रेष्ठ ऋषि-मुनियों से होगा । इस प्रकार मैथुनी सृष्टि आरम्भ हो जाएगी । तत्पश्चात् मैं अपने अंशरूप से तुम्हारे घर जन्म लेकर सांख्य शास्त्र की रचना करूँगा । मेरा वह अंशावतार कपिल के नाम से प्रसिद्ध होगा ।” इस प्रकार कर्दम जी को वर देकर भगवान् विष्णु अन्तर्धान हो गए और कर्दम मुनि सरस्वती नदी के तट पर स्वयंभू मनु की प्रतीक्षा करने लगे ।
उधर देवर्षि नारद पृथ्वी पर भ्रमण करते हुए स्वयंभू मनु के महल में पहुँचे । वे भगवान् विष्णु की इच्छा से ही वहाँ गए थे । उन्होंने उन्हें महर्षि कर्दम के विषय में बताया । जब देवहूति ने देवर्षि नारद के मुख से महर्षि कर्दम के विषय में सुना तो वह उनसे विवाह के लिए सहमत हो गई । शीघ्र ही दोनों का विवाह हो गया ।
तत्पश्चात् महर्षि कर्दम ने देवहूति को गृहस्थ धर्म का ज्ञान देकर योग द्वारा एक भव्य भवन की रचना की जो किसी यान की भाति कहीं भी आ-जा सकता था । वह भवन अनेक प्रकार के ऐश्वर्य और भोगों से युक्त था । पूरा भवन सुख-समृद्धि और सुंदर रत्नों से प्रकाशमान हो रहा था । हंस और मयूर उसके गिन को अपने मधुर स्वर से गुंजायमान कर रहे थे । कालांतर में देवहूति ने कला, अनसूया, अरुंधती, गति, हविर्भू, क्रिया, ख्याति, श्रद्धा और शांति नामक नौ कन्याओं को जन्म दिया ।
कुछ समय बाद महर्षि कर्दम के अंश से देवहूति ने एक सुंदर बालक को जन्म दिया । वह बालक श्रीविष्णु का पाँचवां अंशावतार था । उसके जन्म लेते ही आकाश में बादल गर्जन करते हुए जल बरसाने लगे । कोयल, मोर और हंस मधुर स्वर में कलरव करने लगे । देवताओं ने उस बालक पर दिव्य पुष्पों की वर्षा की । चारों ओर आनन्द और सुख का वातावरण उत्पन्न हो गया ।
पुत्रियों के युवा होने पर महर्षि कर्दम ने उनका विवाह कर दिया । उनकी पुत्री कला का विवाह मरीचि मुनि के साथ, अनुसूया का अत्रि मुनि के साथ, श्रद्धा का अंगिरा ऋषि के साथ, हविर्भू का पुलत्त्व मुनि से, गति का पुलह मुनि से, क्रिया का ऋतु मुनि से, ख्याति का भृगु मुनि के साथ, अरुंधती का वसिष्ठ मुनि के साथ और शांति का विवाह अथर्वा ऋषि के साथ सम्पन्न हुआ ।
विष्णु अवतारी भगवान् कपिल के युवा होने पर एक दिन महर्षि कर्दम उनकी स्तुति करते हुए बोले – “प्रभु ! आपने अपने वचन को सत्य करने और सांख्य योग का उपदेश देने के लिए अवतार लिया है । आपकी इस कृपा से मेरा जीवन धन्य हो गया । प्रभु ! आपकी कृपा से मैं तीनों ऋणों से मुक्त हो गया हूँ और मेरे सभी मनोरथ पूर्ण हो चुके हैं । अब मैं संन्यास ग्रहण कर आपका चिंतन करते हुए वन में निवास करूँगा । आप समस्त प्रजा के स्वामी हैं, इसलिए मैं आपकी आज्ञा चाहता हूँ ।”
तब भगवान् कपिल बोले – “मुनिवर ! आत्मज्ञान का सूक्ष्म मार्ग, जो विलुप्त हो गया है, उसे पुन: जागृत करने के लिए ही मैंने अवतार लिया है । मैं आज्ञा देता हूँ कि तुम इच्छानुसार जाओ और मेरी भक्ति करते हुए मृत्यु को जीत कर मेरे परम पद को प्राप्त करो । माता देवहूति को भी मैं सम्पूर्ण कर्मों से विरक्त करने वाला आत्मज्ञान प्रदान करूंगा, जिससे कि वे संसाररूपी दु खों से मुक्त हो जाएँगी ।” भगवान् कपिल की आज्ञा पाकर महर्षि कर्दम प्रसन्नतापूर्वक वन की ओर चले गए । पिता के वन जाने के बाद माता देवहूति का कल्याण करने के उद्देश्य से भगवान् कपिल वहीं रहने लगे ।
एक दिन वे संसार से विरक्त होकर, आसन पर विराजमान थे । तब ब्रह्माजी के वचन को स्मरण करते हुए देवहूति उनसे बोली – “प्रभु! इन्द्रियों की इच्छाओं और इनकी पूर्ति करते हुए मैं घोर अज्ञानरूपी अंधकार में पड़ी हुई थी । तब इस अंधकार को दूर करने के लिए आपने अवतार लिया । आप सम्पूर्ण जीवों के स्वामी आदिपुरुष भगवान् विष्णु हैं । देव ! मेरी मोह माया को दूर कीजिए । आप अपने भक्तों के लिए कल्पवृक्ष हैं और मैं ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा से आपकी शरण में हूँ । आप भागवत धर्म जानने वालों में सबसे श्रेष्ठ हैं, अतः मेरी मनोकामना पूर्ण कीजिए ।”
तब भगवान् कपिल ने माता देवहूति को सांख्य तत्त्व, अष्टांग योग, भक्ति योग, काम्य कर्म और ज्ञान योग का उपदेश दिया और वहाँ से चले गए । देवहूति अपने आश्रम में योग साधना द्वारा भगवान् विष्णु का स्मरण करती हुई समाधि में लीन हो गई । उसने महर्षि कर्दम के तप और योगबल से प्राप्त गृहस्थ सुख पूर्णतः त्याग दिया । समाधि में स्थिर हो जाने पर उसे अपने शरीर की सुध-बुध नहीं रही । इससे उसका तेज और भी बढ़ गया । साध्वी देवहूति ने भगवान् कपिल के बताए मार्ग द्वारा कुछ ही वर्षों में परब्रह्म भगवान् विष्णु को प्राप्त कर लिया । जिस स्थान पर देवहूति को सिद्धि प्राप्त हुई वह पवित्र क्षेत्र तीनों लोकों में ‘सिद्धपद’ नाम से प्रसिद्ध हुआ ।
इधर भगवान् कपिल-देवहूति को आत्मज्ञान का उपदेश देकर उत्तर-पूर्व दिशा की ओर चले गए । वे तीनों लोकों को शांति प्रदान करने के लिए योग-मार्ग का अनुसरण कर समाधि में स्थित हो गए ।
ये कथा ‘पुराणों की कथाएं’ किताब से ली गई है, इसकी और कथाएं पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Purano Ki Kathayen(पुराणों की कथाएं)
