Bhagwan Vishnu Katha: प्राचीन समय की बात है-दैत्य वंश में मयासुर नाम का एक बड़ा भयंकर और दुष्ट दैत्य हुआ । उसे दैत्यों का विश्वकर्मा अर्थात् वास्तुकार भी कहा जाता है । अन्य दैत्यों के समान उसके मन में भी तीनों लोकों का अधिपति बनने की इच्छा थी । किंतु देवता अधिक बलशाली थे । उन्हें भगवान् विष्णु की कृपा प्राप्त थी । तब मयासुर ने भी भगवान् विष्णु को प्रसन्न करने का निश्चय किया और वन में जाकर कठोर तप करने लगा ।
उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान् विष्णु साक्षात् प्रकट हुए और उससे इच्छित वर माँगने के लिए कहा । तब वह उनकी स्तुति करते हुए बोला – “ प्रभु! जगत् में आप ही सर्वशक्तिमान हैं । देवता, दैत्य, मनुष्य, गंधर्व, यक्ष-सभी आपके सामने नतमस्तक होते हैं । देवगण ने आपकी आराधना कर अनेक सिद्धियाँ प्राप्त की हैं । आप परम दयालु और भक्त-वत्सल हैं । प्रभु ! यदि आप मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर मुझे इच्छित वस्तु प्रदान करना चाहते हैं तो मुझे अमृत कुण्ड प्रदान कीजिए ।”
भगवान् विष्णु मयासुर की दुष्टता जान चुके थे, किंतु उसने तपस्या के बल से उन्हें प्रसन्न किया था और उनकी दृष्टि में वह दैत्य से पहले एक भक्त था । इसलिए उन्होंने मयासुर को मनोवांछित वर प्रदान कर दिया । अमृत कुण्ड प्राप्त कर मयासुर अत्यंत शक्तिशाली हो गया ।
कुछ समय बाद दैत्यों ने देवताओं पर आक्रमण कर दिया । किंतु भगवान् विष्णु से शक्ति प्राप्त कर देवताओं ने उन्हें पराजित कर दिया । दैत्य मयासुर की शरण में गए और उससे सहायता की प्रार्थना करने लगे । मयासुर ने सोने, चाँदी और लोहे के तीन विशाल पुर (किले) बनाए, जो आकाश में स्थित थे । दैत्य पुरों में छिपकर देवताओं से युद्ध करने लगे । उनके प्रहारों से विचलित होकर इन्द्र आदि देवगण भगवान् शिव की शरण में गए और उन्हें दैत्यों का संहार करने के लिए प्रेरित किया ।
भगवान् शिव नंदी पर बैठकर दैत्यों से युद्ध करने लगे । उनके बाणों से घायल होकर दैत्य भूमि पर गिरने लगे । लेकिन वे जितने दैत्यों को मारते, मायावी मयासुर उन्हें उठाकर अपने पुरों में ले जाता और अमृत पिलाकर पुन: स्वस्थ और शक्तिशाली बना देता । इस प्रकार भगवान् शिव को युद्ध करते हुए अनेक दिन बीत गए ।
जब भगवान् विष्णु ने देखा कि दैत्य किसी प्रकार से भी पराजित नहीं हो रहे हैं, तो वे गाय बनकर और ब्रह्माजी बछड़ा बनकर मयासुर के अमृत कुण्ड का सारा अमृत पी गए । यह सब दैत्यों के सामने ही हुआ, किंतु वे श्रीविष्णु की माया से मोहित हो गए थे । अमृत के समाप्त होने का समाचार सुनकर मयासुर अत्यंत निराश हो गया और उसने अपने सैनिकों के साथ देवगण पर प्रचण्ड आक्रमण कर दिया । उस समय शिवजी ने अपने तीन बाणों से उसकी सेना और उसके त्रिपुरों को जलाकर नष्ट कर दिया । मयासुर बचकर भाग निकला ।
इस प्रकार त्रिपुरों को नष्ट करने के कारण भगवान् शिव ‘त्रिपुरारि’ नाम से प्रसिद्ध हुए ।
ये कथा ‘पुराणों की कथाएं’ किताब से ली गई है, इसकी और कथाएं पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Purano Ki Kathayen(पुराणों की कथाएं)
