आज मैं आपके समक्ष राजारानी की ( गृहलक्ष्मी कहानियां) की कहानी प्रस्तुत कर रहा हूं। न! न! न! यह किसी रियासत अथवा राज्य के राजा रानी की परम्परागत पुरातन कहानी नहीं है केवल इस कहानी के पात्रों के नाम राजा रानी हैं, कहानी तो वर्तमान संदर्भों की है यह कहानी। लीजिए अब आप ही पढ़ लीजिए राजा रानी के नये कथानक की नई कहानी।
जब वह पैदा हुआ था तीखे नयन नक्श वाला गोरा चिट्टा नाजुक राजकुमारों जैसा सुंदर था। घर में मां- बाप उसे लाड़ से राजा बेटा, राजा भैया, राजा बाबू आदि कहकर पुकारते थे और पुकारें भी क्यों न भला, आखिर वह उनका इकलौता पुत्र तो था, उनकी सम्पत्ति का एकमात्र वारिस। महेन्द्र प्रसाद राज्य के सरकारी जन स्वास्थ्य यांत्रिकीय विभाग में लिपिक थे। विद्यादेवी उनकी धर्म पत्नी एक साधारण गृहिणी थी। घर मौहल्ले व परिचितों में राजा बेटा के नाम से जाना जाने वाला विद्या देवी और महेन्द्र प्रसाद का यह पुत्र जब स्कूल जाने की उम्र का हुआ तो स्कूल में उसका नाम राजा ही लिखवाया गया।
महेन्द्र प्रसाद वैसे तो सरकारी कार्यालय में लिपिक थे किंतु उन्हें सरकारी नियम कानूनों का विस्तृत ज्ञान था। शायद ही कोई ऐसा सरकारी आदेश हो जो उनकी नजरों से न गुजरा हो। सरकारी गजट, सरकारी धाराएं कार्यालयीन नियम के विषय में कार्यालय के समस्त अधिकारी, कर्मचारी व अन्य लिपिक आवश्यकता पड़ने पर उनकी ही सहायता लेते थे। महेन्द्र प्रसाद भी अपने पूरे मनोयोग से सरकारी नियम कानूनों कीनियमों के अंतर्गत ही व्याख्या करते व उन्हें सरकारी नियमों के चलते क्या करना चाहिए व क्या-क्या नहीं करना चाहिए? की सलाह मशविरा देते थे। अपनी कार्यशैली अनुभवों व सरकारी ज्ञान से महेन्द्र प्रसाद तरक्की करते गये और एक दिन वरिष्ठ सहायक के पद पर पहुंच गए। उधर उनके एकमात्र पुत्र राजा ने भी विज्ञान संकाय में स्नातक उपाधि प्राप्त कर ली।
सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था किंतु होनी को भला कौन टाल सकता है, प्रतिदिन की भांति कार्यालय छूटने के बाद जब महेन्द्र प्रसाद अपने कुछ कार्यालयीन सहायकों के साथ घर लौट रहे थे कि एक अनियंत्रित सरकारी बस ने उन्हें चपेट में ले लिया। महेन्द्र प्रसाद वही गिर गए और अचेत हो गए। आस-पास से गुजरते कुछ लोगों के साथ कार्यालय सहयोगियों ने उन्हें तुरंत नजदीकी अस्पताल में भर्ती करवाया और घर पर दुर्घटना की सूचना दी। उधर अनियंत्रित बस सीधी जाकर सामने के बिजली के खंभे से टकराई और ढलान पर पलट गई। पलक झपकते ही यह सब हो गया। इस बस हादसे में बस चालक की मौत हो गई और परिचालक घायल होकर बेहोश हो गया। घायल और बेहोश परिचालक को भी राह चलते हुए राहगीरों ने ही अस्पताल पहुंचाया। यह अच्छा ही हुआ कि बस में केवल चालक- परिचालक ही थे सवारियां नहीं थी। वास्तव में दुर्घटनाग्रस्त बस सरकारी कर्मचारियों को लिवा लाने व गंतव्य तक पहुंचाने के लिए ही डिपों से सरकारी कार्यालयों की ओर जा रही थी, इसीलिए खाली थी।
महेन्द्र प्रसाद को चोट तो बहुत आई, वे अचेत भी थे किंतु तुरन्त चिकित्सा मिल गई थी, इसलिए जीवित बच गए। दुर्घटना में महेन्द्र प्रसाद जीवित तो बच गए लेकिन उनकी दोनों टांगे सदा के लिए बेकार हो गईं और वे स्थाई अपंगता के शिकार हो गये। महेन्द्र प्रसाद की स्थायी अपंगता को देखते हुए राज्य सरकार ने उन्हें शासकीय नौकरी से निवृत्त कर दिया और राजा को अनुकंपा नियुक्ति देकर उन्हीं के कार्यालय में बाबू बना दिया। राजा की इच्छा तो आगे पढ़ने और सरकारी अधिकारी बनने की थी और महेन्द्र प्रसाद भी यही चाहते थे कि वह बड़ा अधिकारी बने, लेकिन नियति को कुछ और ही स्वीकार था।
‘‘राजा” को ‘‘बाबू” की नौकरी का कोई अनुभव नहीं था, अभी-अभी तो उसने कॉलेज छोड़ा था इसलिए उसे आरंभ में कार्यालय में थोड़ी परेशानी हुई। क्योंकि सरकारी कार्यालयों की अपनी सीमाएं होती हैं, वर्जनाएं होती हैं और मर्यादा होती है जबकि कॉलेज के छात्र बेफिक्र व आत्मकेन्द्रित होते हैं। ‘‘राजा” के कार्यालय के अन्य बाबुओं, कर्मचारियों व अधिकारियों को पता था कि छोकरा नया है, नई-नई नौकरी है धीरे-धीरे सब कुछ समझ जाएगा और सचमुच यही हुआ भी। तीन-चार महीने में ही राजा कार्यालयों के सारे तौर तरीके, उठना बैठना व कैसे कार्य करना सब अच्छी तरह समझ गया।
सामाजिक व्यवस्था में जब कोई युवा अपने पैरों पर खड़ा हो जाता है तो उसके विवाह के लिए रिश्ते आने लगते हैं। महेन्द्र प्रसाद व विद्या देवी अभी इतनी जल्दी राजा की शादी नहीं करना चाहते थे लेकिन परिचितों, दूर के रिश्तेदारों व लड़कियों के माता-पिता के दबाव में उन्हें राजा की शादी का निर्णय लेना पड़ा। शुभ मुहूर्त में राजा का विवाह ‘‘वृन्दा रानी” से हो गया। वैसे तो उसका नाम वृन्दा रानी था किंतु वृन्दा जैसा कठिन शब्द कौन बोले? मायके में भी वृन्दा नाम किसी की भी जुबान पर नहीं चढ़ा सिर्फ स्कूल कॉलेज में व प्रमाण पत्रों में ही वृन्दा रानी नाम रहा। घर पर तो सब उसे रानी ही कहते थे। वहीं ‘‘रानी” नाम यहां ससुराल में भी ससुराल वालों ने अपना लिया। इस तरह ‘‘वृन्दा रानी” सिर्फ रानी हो गई अपने राजा की। अभी ‘‘राजा रानी” की शादी की मेंहदी का रंग छूटा भी नहीं था कि महेन्द्र प्रसाद ने अंतिम सांस ली।
दिन बीतते रहे, राजा की दिनचर्या एक नियमित ढर्रे पर चलती रही। दस साढ़े दस बजे तैयार होकर कार्यालय जाना, हाजिरी रजिस्टर में अपनी उपस्थिति दर्ज करा अपनी सीट पर आ बैठना तथा जो फाइलें उसके पास आती उनको वरिष्ठों की सलाह लेकर या कभी स्व-विवेक से निपटाना, अन्य सहयोगी कर्मचारियों से बतियाना तथा शाम को पांच साढ़े पांच बजे घर की ओर रवाना हो जाना। कार्यालय में अन्य कर्मचारियों की भांति राजा के पास भी कोई विशेष काम नहीं था, जो काम था भी, वह अधिक जिम्मेदारी का नहीं था। वैसे भी ‘राजा’ मात्र बाबू था कार्यालयीन जिम्मेदारियां तो अधिकारियों की होती हैं। क्लर्कों, बाबुओं का काम तो केवल फाइलें बनाना और बढ़ाना भर होता है।
शादी के दो वर्षों बाद रानी ने एक पुत्री को जन्म दिया। राजा ने पुत्री का नाम ‘‘तूलिका” रखा जिसे प्यार से सब ‘‘तुली” तुली कहते । तुली के आने से विद्या देवी की नातिन को देखने की साध पूरी हुई। अब विद्या देवी का सारा समय तुली को संभालने व उसके साथ खेलने में कटने लगा। राजा रानी विद्या देवी व तुली का यह छोटा सा परिवार सुखमय जीवन व्यतीत करने लगा।
राजा के इस सरकारी कार्यालय में कोई अधिक काम नहीं था केवल फाइलों की आवाजाही होती थी। कर्मचारियों-अधिकारियों के पास कोई काम नहीं, बैठे ठाले करें भी तो क्या? फिर खाली दिमाग शैतान का घर, लिहाजा कार्यालय के अधिकाशं कर्मचारी-अधिकारी दिन भर इधर-उधर से जुगाड़ लगा शाम को पीने-पिलाने का इंतजाम करते और शाम को कहीं बैठकर पीते और देर रात घर लौटते। कार्यालय के चपरासी, चौकीदारों का तो ये आलम था कि कुछ तो आफिस के टाइम में भी चढ़ा लेते और कुछ कार्यालय छूटने के पश्चात कार्यालय परिसर में ही पीते या फिर कार्यालय के किसी कमरे में जमते, धींगा मस्ती, गाली गलौज करते और उतरने के बाद घर लौटते या वहीं किसी कमरे में सुबह तक पड़े रहते और सुबह ही घर जाते। शाम को सरकारी कार्यालय का अहाता किसी दारू के ठेके से कम नहीं होता। कार्यालय चपरासी, चौकीदार व अन्य यहां वहां लुढ़कते हए, गिरते पड़ते पाउचों बोतलों के बीच बकझक करते दिखाई देते। इन दारूबाजों में कभी-कभी मारापीटी भी हो जाती जिनमें लड़ने वाले भी वहीं और छुड़ाने वाले भी वही होते।
सरकारी कार्यालय में जहां कुछ लोग पीने के आदी थे वहीं कुछ पीने के आदी के साथ-साथ ताश के पत्तों के जुए के व सट्टे के भी शौकीन थे। कुछ तीज-त्यौहारों व केवल छुट्टियों में शौकिया जुआ खेलते तो कुछ केवल वर्ष भर में एक बार केवल दीवाली पर भाग्य आजमाने के लिये जुआ खेलते। कार्यालय के अन्य कर्मचारी अपने-अपने ढंग से राजा को आकृष्ट करने की भी कोशिश करते किंतु ‘‘राजा” को इन सब में कतई रूचि नहीं थी कभी-कभी वह मजबूरी में उनके साथ बैठ लेता किंतु न तो कभी पीता, ना ही ताश के पत्ते वगैरह खेलता। वह जुए, पीने से परहेज जरूर करता किंतु इसका अर्थ यह नहीं कि इनमें एकदम कोरा था। कॉलेज के जमाने में, अकसर कॉलेज के छात्रावास में वह मित्रों के साथ पीता और ताश खेला करता था। राजा को शराब, ताश कबाब शबाब व अन्य व्यसनों की न तो कभी लत रही, ना ही उसने कभी इन्हें अपने पर हावी होने दिया। राजा को जबसे सरकारी नियुक्ति मिली, रानी से शादी हुई और फिर पिता का साया सिर से उठा उसने हर प्रकार की बुराई से तौबा कर ली। हर दुर्व्यसन से किनारा कर लिया। अब ताश खेलना या पीना तो दूर की बात, उसे उन्हें छूना तक गंवारा नहीं था। हालांकि कार्यालय के अन्य सहयोगियों ने भरसक कोशिश की कि राजा को भी इनका स्वाद चखा दें।
उनका कहना था कि रोज रोज न सही कभी कभार ही महीने में एकाधबार पीने में या ताश खेलने में राजा उनका साथ दे दे। उनका तो कहना यहां तक भी था कि कभी कभार न सही महीने में एक बार न सही, राजा वर्ष में एक बार वह भी दीपावली पर केवल लक्ष्मी पूजन के दिन वो भी भाग्य आजमाने के लिए ही हमारे साथ बैठ जाए भले ही पिये नहीं केवल ताश का जुआ खेल ले, कोरा न रहे किंतु राजा उसके लिए भी कभी राजी न हुआ और हर बार आत्मीयता से कोई न कोई बहाना बना उन्हें टाल दिया करता। ताश न खेलने, शराब न पीने व अन्य बुरी आदतों से बचने की कोशिश में रानी ने सदा अपने पति राजा का साथ दिया। इस तरह सदैव उसने अपना एक सुघड़ गृहिणी होने का परिचय दिया।
समय कितनी जल्दी गुजर जाता है विशेषकर वह समय जो सामान्य रूप से बीत रहा हो जिसमें कोई दुर्घटना न हुई हो राजारानी के विवाह को पूरे सात वर्ष हो गए। इन सात वर्षों में राजारानी की जो उपलब्धि रही वो थी रानी को पुत्र रत्न की प्राप्ति व राजा की बाबू के पद से सहायक ग्रेड दो के पद पर पदोन्नति। विद्या देवी सहित राजा रानी ने अपने इस नवागत पुत्र का नाम ‘‘अक्षय” रखा। अक्षय के आने से सर्वाधिक प्रसन्नता विद्या देवी को हुई क्योकि उन्होंने पहले नातिन को देखा और अब वंश को चलाने वाला, आगे बढ़ाने वाला घर का चिराग नाती देखा। विद्या देवी का अब सारा समय नाती ‘‘अक्षय” माता पिता के साथ दादी के संरक्षण में बड़ा होने लगा।
विद्या देवी की नाती नातिन के देखने उनकी परवरिश करने उनके साथ खेलने की साध तो पूरी हुई, उनके जीवन में बस एक आस और थी, तीर्थ यात्रा की, चारों सामों की तीर्थ यात्रा की। जब अक्षय तीन वर्ष का हुआ तो विद्या देवी ने राजा रानी से अपनी तीर्थ यात्रा पर जाने की बात चलाई। राजा रानी को मां के तीर्थ यात्रा पर जाने में कोई आपत्ति नहीं थी, सो राजा ने एक ट्रेवल एजेन्सी से संपर्क किया। उक्त एजेंसीप्रत्येक यात्री से निश्चित राशि लेकर आरामदायक बसों में धार्मिक यात्राओं का आयोजन करती थी और यात्रियों को सारी सुविधाओं जैसे नाश्ता, खाना पीना, रात्रि विश्राम, घुमाना, मंदिरों में दर्शन कराना आदि की व्यवस्था करती थी। राजा ने अपनी मां विद्या देवी के लिए दीपावली से चार दिन पूर्व चारों धामों की यात्रा पर जाने वाली बस में एक सीट आरक्षित करवा ली।
अभी दीपावली को आठ-दिन दिन थे फिर भी विद्या देवी ने यात्रा की तैयारियां आरंम्भ कर दी। इन तैयारियां में राजा रानी तो जुट ही थे। ‘‘अक्षय” और तूलिका भी सहायता कर रहे थे। यात्रा के निश्चित दिन परिचितों, दूर के स्थानीय रिश्तेदारों मौहल्लेवासियों के साथ राजा रानी व अक्षय, तूलिका ने विद्या देवी को विदाई दी।
विद्या देवी के विदा होने के पश्चात राजा तो कार्यालय चला गया और रानी घर के कामकाज में जुट गई। शाम को जब सारा परिवार घर में था रानी के मायके से फोन आया कि मां की तबियत खराब है और उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाया है वैसे चिंता की कोई बात नहीं। मां रानी को याद कर रही हैं इसलिए रानी को कल भेज दें। रानी आराम से आये और घबराए नहीं। दूसरे दिन सुबह रानी ‘‘अक्षय” व तूलिका को लेकर मायके रखाना हो गई। जाते वक्त राजा ने रानी से कहा कि वहां पहुंचते ही मां के हाल चाल देना और यदि कोई गंभीर बात हो तो बताना, वह भी आ जायेगा। शाम को रानी का फोन आया कि मां का स्वास्थ्य ठीक है लेकिन वे अभी दो तीन दिन और अस्पताल में रहेंगी। अभी वह और बच्चे मां के पास ही रहेंगे। आप दीवाली पर दीये जला लक्ष्मी पूजन कर लेना । भूलना नहीं।
हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी राजा के सहयोगियों ने ताश खेलने व ताश के जुए के माध्यम से उसका आगामी वर्ष का भाग्य कैसा रहेगा? उसकी तकदीर क्या कहती है? जानने के लिए आमंत्रित किया। पहले तो ‘‘राजा” ने स्पष्ट मनाकर दिया जिस पर वे कहने लगे यार घर पर अकेले क्या करोगे? न माताजी है, न भाभीजी व बच्चें अरे भाई! पत्ते खेलने न सही गपशप करने, दीपावली की बधाईयां लेने देने तो आ सकते हो? राजा ने कहा-ठीक है, कोशिश करूंगा।
दीपावली के दिन राजा सुबह उठा, स्नान किया अगरबत्ती जलाई पूजापाठ की और फिर पता नहीं किसकी प्रेरणा से सौभाग्य या दुर्भाग्य से घर में ताला लगा वहां पहुंच गया जहां ताश की महफिल जमी थी। शुरू-शुरू में तो राजा ने पत्ते खेलने में ना नुकुर की किंतु फिर पता नहीं क्या हुआ कि वह पत्ते खेलने बैठ गया। ताश के जुए के नशे का जादू राजा पर इस कदर छाया कि पूरे दिन व पूरी रात वह ताश का जुआ खेलता रहा। उसे न लक्ष्मी पूजन की याद रही न ही दीये जलाने की यहां तक कि उसे अपनी तक खबर नहीं थी न कुछ खाया न पिया। यही हाल अन्य कार्यालयीन सहयोगी पियक्कड़ों जुआरियों का था।
दीवाली के दूसरे दिन सुबह जब राजा के ऊपर से जुए का नशा उतरा और वह घर लौटने लगा तो उसकी जेबें नोटों से भरी थी। जो शायद आठ-दस हजार से कम न होंगे। घर लौटकर जैसे ही उसने दरवाजे में लगे ताले को चाबी से खोलने के लिए हाथ लगाया वह अपने आप खुल गया। पहले तो राजा का माथा ठनका फिर उसने सोचा, शायद कल जब वह जा रहा था, तब ताले में चाबी लगाना भूल गया होगा और ताला यूं ही अटका कर चला गया होगा किंतु दरवाजा खोलते ही उसने सिर पीट लिया। पूरे घर में सामान इधर-उधर बिखरा पड़ा था और जो कुछ जमा पूंजी थी, जेवरात थे सब चोरी चले गए थे। राजा की आंखों के आगे अंधेरा छा गया। वह वहीं एक कुर्सी पर सिर पकड़ कर बैठ गया और सोचने लगा कि यह सब क्या हो गया? अब वह रानी को क्या जबाब देगा, मां से क्या कहेगा? अब उसकी जेबों में उसका भाग्य था और घर में बिखरा दुर्भाग्य । लगभग एक घंटे बाद राजा थाने में था और थानेदार को घर में हुई चोरी की वारदात की रपट लिखवा रहा था।
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