इस देश में मध्यम वर्गीय पति के लिए पत्नी हमेशा ही घोषित रूप में चश्मे बद्दूर होती है। इस सफेद झूठ को बोलने के पीछे संभवत: दो कारण होते हैं या तो पति के पास सच बोलने का साहस नहीं होता है या फिर सच बोलने के बाद उसे पत्नी की ओवर हालिंग करवाने के लिए ब्यूटी पार्लर ले जाने का बजट नहीं होता है। दोनों ही परिस्थितियों में पति रुपी निरीह प्राणी के पास संतोष रुपी घुट्टी पीने के अलावा कोई और विकल्प नहीं होता है।

कुछ पति वाणी और साधन संपन्न होने के बाद भी ब्यूटी पार्लर का रुख इसलिए भी नहीं कर पाते हैं कि कहीं उनकी पत्नी कटरीना में कन्वर्ट होकर उनकी राजा मुराद वाली पर्सनाल्टी को ठुकरा कर सलमान की मुराद न जगा ले। खैर संशय के इस सागर में हमारे पड़ोस के शर्मा जी भी गोते लगा रहे थे। उनकी पत्नी ने उन्हें खुले आम चेतावनी दे डाली थी कि इस बार तो उन्हें ब्यूटी पार्लर के लिए अलग से बजट आवंटित करना ही होगा। वरना वह उनके भाई की शादी में बिना अपने ‘मेक ओवर’ के जाने से रही। शर्मा जी जैसे घनघोर प्रकृतिवादी के लिए किसी अप्राकृतिक कार्य के लिए इतनी संजीदा धमकी असहनीय थी।

शर्मा जी हर आपदा और विपदा में मेरे पास ही राहत लेने चले आते थे। इस बार भी वैसा ही हुआ। शर्मा जी ने पहले तो चाय की चुस्कियों के बीच अपना गम गलत किया फिर पत्नी का मामला होने के कारण नियंत्रित रूप से आवेशित होते हुए बोले, ‘यार! एक बात बताओ यह किस पुराण या संविधान में लिखा है कि कोई महिला किसी शादी-विवाह में बिना ब्यूटी पार्लर में पैर फिराए मुंह दिखाने लायक नहीं होती है?’

मैं उनकी बात का निहितार्थ जानते हुए भी मासूम बनने का नाटक करते हुए बोला, ‘क्या हुआ शर्मा जी, ज़रा खुल कर बताइए। आप जैसे विरक्तिभाव वाले प्राणी से ब्यूटी पार्लर का नाम सुनना बिलकुल वैसे ही लग रहा है जैसे कोई मवाली सत्संग की बात कर रहा हो। वैसे शर्मा जी! एक बात जान लीजिये आजकल के युग में ब्यूटी पार्लर और आईसीयू में आक्सीजन दोनों एक समान ही हो लिए हैं। दोनों के बिना जीना लगभग असम्भव सा है।’

मेरे इस जवाब का उनके घावों पर नमक-सा असर हुआ। जिस चाय में उन्हें अभी तक मिठास नज़र आ रही थी वह अब कसैली सी लगने लगी थी। उन्हें मुझसे ऐसे जवाब की उम्मीद बिलकुल नहीं थी। शर्मा जी अपने क्रोध को नियंत्रित करते हुए बोले, ‘मतलब आप भी यही कह रहे हैं कि स्त्री बिना ब्यूटी पार्लर के सुन्दर दिख ही नहीं सकती? प्राचीन काल में कौन-सा ब्यूटी पार्लर हुआ करता था? तब भी स्त्री के सौन्दर्य के ऊपर न जाने कितने ग्रन्थ लिख दिए गए। बताइये अप्सरा और मेनका कौन से ब्यूटी पार्लर जाती थी फिर भी उनकी सुन्दरता का कोई तोड़ नहीं था।’

शर्मा जी का ब्यूटी पार्लर के प्रति पूर्वाग्रह तर्कयुक्त होकर अपने चरम पर चला जा रहा था। मैंने उन्हें यथार्थ का भान कराने के लिये होम्योपैथिक दर्शन का माध्यम चुनते हुए कहा, ‘शर्मा जी, आपको पता नहीं आजकल महिलाओं के बीच में कितना टफ कम्पटीशन है। उन्हें आजकल अपनी वाणी नहीं बल्कि अलग-अलग तरह से बांधे जाने वाली साड़ी से जाना जाता है। पहले लज्जा स्त्रियों का आभूषण होता था, आजकल साज-सज्जा ने उसका स्थान ले लिया है। पहले महिलाओं का आचरण देखा जाता था आजकल उनके शरीर पर कितना फैशनेबल आवरण है इसकी चर्चा होती है।

पहले महिलायें घर में चूल्हा-चौका देखती थी आज उन्हें खुद ऐसा बनना होता है कि वह दूसरो को अपने लुक से चौंका दे। पहले उसे अबला माना जाता था लेकिन अब उसे बला की खूबसूरत कहलाने में यकीन है। तो शर्मा जी! अगर भाभी जी ने ब्यूटी पार्लर वाला प्रस्ताव रखा है तो तुरंत मान लीजिये वरना आजकल कई जीजा जी छत पर टहलते हुए पाए जाते हैं। किसी ने ब्यूटी पार्लर की स्पोंसर्शिप ऑफर कर दी तो आप हाथ मलते रह जाएंगे। फिर आप भी तो चाहेंगे कि आपकी श्रीमती जी भी ब्यूटी पार्लर के करिश्मे से युक्त महिलाओं के बीच में जाकर कहीं से भी हीन भावना का शिकार न बने।

मेरे इस घनघोर महिलावादी वक्तव्य के बाद शर्मा जी तनिक सोच में पड़ गए। फिर अपने दिल के किसी कोने में पड़े धूल खा रहे रूमानी दिल को झाड़ पोंछ कर चेहरे पर शर्म की लाली लाते हुए बोले, ‘यार बात तो तुम सोलह आने सच कह रहे हो। कभी-कभी मुझे भी लगता है कि शर्माइन चालिस की उमर में ही निखालिस बूढ़ी लगने लगी हैं। मैं भी सोचता हूं कि रेखा और हेमा जैसी हीरोइनों ने कौन-सा ऐसा लेप लगाया है, जो अभी भी जवान दिखती हैं। यहां हमारी श्रीमती जी जवानी में भी बूढ़ों-सा एहसास करवाती रहती हैं। हो न हो इसके पीछे ज़रूर ब्यूटी पार्लर वाली बूटी काम कर रही होती है।

चलो ऐसा करता हूं इस बार चुनाव की तरह मैं श्रीमती जी का गठबन्धन ब्यूटी पार्लर से करवा कर देखता हूं कि वह बहुमत से फिर से मेरे दिल में अपनी सरकार बना पाती हैं या नहीं, लेकिन एक बात मुझे ज़रा आशंकित किये जा रही है कि कहीं ब्यूटी पार्लर की सीमा में प्रवेश करते ही मेरे घरेलू बजट की सीमा पर अतिक्रमण न हो जाए। तुम तो यार जानते ही हो कि मेरे जैसे सफेद कमाई करने वाली बन्दे के लिए बजट पर अतिक्रमण और दुश्मन का हमारी सीमा पर अतिक्रमण एक जैसी ही बात है।’

शर्मा जी के आशंकित मन ने ब्यूटी पार्लर के मेरे पहले अनुभव की याद दिला दी जब मैं भी अपनी श्रीमती जी को ब्यूटी पार्लर छोड़ने के बाद उसके बिल को देखने के लिए अपने दिल को मज़बूत कर रहा था। यह तो करम था ऊपर वाले का कि मेरी श्रीमती जी ब्यूटी पार्लर के भवसागर में डुबकी लगाने के बजाये केवल उसका पानी छिड़क कर ही वापस गई थी। वरना मैंने एम्बुलेंस का नम्बर पहले ही ढूढ़ निकाला था। खैर अब मामला शर्मा जी जैसे न्यू कमर का था। उनके जैसे रंगरूट को मैंने दरिया में कूदने के लिए राज़ी तो कर लिया था लेकिन इस बात का भी डर था कहीं वह डूब गये तो पाप भी मुझे ही लगेगा।

मैंने अपनी काउंसलिंग का दूसरा सेशन शर्मा जी की पत्नी जो ब्यूटी पार्लर जैसी मृग तृष्णा को पाने की लालसा रखे थी के साथ रखा। इस बार शाम की चाय मैंने शर्माइन के साथ प्लान की। हुआ भी वैसा ही जैसा मुझे अंदेशा था। शर्माइन ने चाय का कप बाद में मेरी तरफ खिसकाया, पहले शर्मा जी की शिकायत का पुलिंदा खोलते हुए कहा, ‘देखिये भाई साहब! शर्मा जी तो आपके मित्र हैं। कुछ समझाइये इन्हें कि अब तो मोबाइल के ज़माने में लैंड लाइन वाली मानसिकता छोड़ दें। मेरा ज़रा-सा ब्यूटी पार्लर जाना इन्हें नागवार गुज़र रहा है, खुद बताइये कि आप भी तो भाभी जी को हर महीने ब्यूटी पार्लर ले जाते हैं या नहीं?’

शर्माइन की आंखों में आक्रोश और स्त्री सशक्तीकरण का ‘काम्बो पैक’ एक्टिवेट हो गया-सा लगा। मैंने उनके क्रोध की अग्नि पर सांत्वना के छींटे डालते हुए कहा, ‘देखिये भाभी जी, आप बिलकुल चिंता न करें। मैंने शर्मा जी के पुराने सिस्टम में नया सॉफ्टवेयर अपलोड कर दिया है। अब वह बिलकुल लेटेस्ट वज़र्न के मोबाइल की तरह सटासट आपकी उंगलियों पर चलेंगे। मैंने उन्हें ब्यूटी पार्लर के रचनात्मक योगदान का बोध करा दिया है। अब वह आपको ब्यूटी पार्लर की सीमा में प्रवेश करने की अनुमति प्रदान कर देंगे लेकिन…’

मेरे इस सकारात्मक वर्णन को सुनकर शर्माइन जितनी स्पीड में खुश हुई थी उतनी ही स्पीड में उन्हें मेरे ‘लेकिनÓ ने आशंकित कर दिया। इस शर्ते लागू टाइप वाले ‘लेकिन’ को कहते ही शर्माइन ने जो बिस्किट की प्लेट मेरी तरफ बढ़ाई थी वह तुरंत ही वापस ले ली। मैंने स्थिति को तनावपूर्ण देखते हुए उसे नियंत्रित करने की कोशिश करते हुए कहा, ‘नहीं भाभी जी, वैसी कोई बात नहीं है, जैसी आप समझ रही हैं। आप सौ प्रतिशत ब्यूटी पार्लर पर विजय पाप्त करने वाली हैं। बस आपको करना इतना है कि अपना ब्यूटी पार्लर का बजट आपको ‘इएमआईÓ यानी आसान किश्तों पर करवाना है। क्योंकि आप जानती ही हैं कि मध्यम वर्ग में जिस तरह घर की ओवर हालिंग बिना लोन की किश्तें बनवाये नहीं हो पाती उसी तरह यहां की महिलाओं को भी अपनी ओवर हालिंग की किश्तें बनवानी पड़ेंगी।’

मेरे इस निहायती घटिया विचार को सुनकर भाभी जी अपने गुस्से को रिलैक्स्ड मूड में बदलते हुए बोली, ‘आप शर्मा जी से कह दीजिएगा कि वह मेरी ओवर हालिंग के लिए बजट की चिंता बिलकुल न करें। मैंने घर के खर्चों में ही कटौती करके हर महीने के ब्यूटी पार्लर का खर्चा निकाल लिया है। और हां एक बात ज़रा आप खुद समझ लीजिये और शर्मा जी समेत सभी मर्दों को भी बता दीजिये कि वो जो महीने भर मुंह में पान और मसाला खाकर देश की सूरत बिगाड़ा करते हैं, उससे कम खर्चे में ही हम महिलायें ब्यूटी पार्लर में जाकर अपनी सूरत सुधार सकती हैं।’

यह भी पढ़ें –क्रेडिट – बचपन से पचपन तक – गृहलक्ष्मी कहानियां

-आपको यह कहानी कैसी लगी? अपनी प्रतिक्रियाएं जरुर भेजें। प्रतिक्रियाओं के साथ ही आप अपनी कहानियां भी हमें ई-मेल कर सकते हैं-Editor@grehlakshmi.com

-डायमंड पॉकेट बुक्स की अन्य रोचक कहानियों और प्रसिद्ध साहित्यकारों की रचनाओं को खरीदने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें-https://bit.ly/39Vn1ji