आज बहुत दिनों के बाद सुमी को फुर्सत मिली थी। साल के अंतिम सप्ताह में उसने क्रिसमस वगैरह के साथ बची हुई तीन सी.एल. जोड़ कर सप्ताह भर की छुट्टी का कार्यक्रम बना लिया था। पति और बच्चे दोनों अपने-अपने काम पर गए थे। केवल वह थी, छुट्टी थी, कॉफी का मग था…और कंप्यूटर भी तो था। ‘ओह, कितने दिन हो गए आराम से बैठ कर नेट सर्फिंग किए। यूं तो ऑफिस में उसी पर बैठती है मगर वहां तो बैठना पड़ता है, काम के लिए। आज मनपसंद सर्फिंग करूंगी। उसने सोचा। उसने कॉफी का मग लिया, पैरों पर कंबल डाला और रजाई में इत्मिनान से बैठ कर नेट-पत्रिकाएं देखने लगी। एक प्रसिद्ध कहानीकार की कहानी पढ़ने बैठी। आधुनिक नारी की सशक्तता की कहानी थी।

घर-परिवार के सीमित दायरे को छोड़ कर नायिका राजनीति के बेहद कठिन क्षेत्र में प्रवेश करती है। अच्छी बात यह थी कि पुरानी कहानियों की तरह न उसका पति उसे रोकता है न बच्चे। चकाचौंध भरी सफलता के बाद अचानक जीवन में जैसे यू टर्न आता है और सफलता हाथ आते-आते फिसल जाती है। आम चुनाव में वह स्वयं तो जीतती है पर उसके नेतृत्व में पार्टी नहीं जीत पाती। अवसादपूर्ण एकांत में नायिका वर्षों के बाद अपने अतीत की याद में डूब जाती है। सुमी को लगा, यहीं कहानीकार एक साधारण पुरुष में बदल गया है… आधुनिक और सशक्त नायिका मध्यकालीन नारी की भांति कमजोर तथा भावुक हो जाती है। पार्टी की हार के बाद ठंड की धुंधलाई शाम में अपने बड़े से लॉन के एकांत कोने में बैठी पिछली जिंदगी पर निगाह डालती है, जहां उसका पति था, बेटा था, छोटा सा फ्लैट था… और अचानक वर्तमान की सारी उपलब्धियां बेमानी हो जाती हैं। कहानी के अंत तक आते-आते सुमी का मन लेखक के प्रति आक्रोश से भर गया। ‘यह आदमजात कभी नहीं बदलेगी उसने गुस्से से सोचा। ‘क्यों औरत को महत्वाकांक्षी नहीं होना चाहिए? क्यों बाहर निकलते ही दुनिया की निगाहें टेढ़ी हो जाती हैं? क्यों सफलता के शिखर पर पहुंचने से पहले समाज उसे असफल माता और बेवफा पत्नी का तमगा पहना देता है? यदि पत्नी पति की सफलता में सहयोग दे कर गर्वित हो सकती है तो सफल पत्नी के पति को कुंठाएं क्यों घेर लेती हैं? क्यों दुनिया उसके प्रति सहानुभूति तभी रखती है, जब वह अपने चमकते भविष्य को लात मार पति के पैरों पर लोटने लगती है अथवा बच्चे को सीने से लगा कर आंसू बहाते हुए बाहर निकलने के निर्णय पर पछताने लगती है… ऐसे तमाम प्रश्नों ने उसे इतना परेशान कर दिया कि उसने गुस्से में कंप्यूटर बंद कर दिया। कॉफी बनाते-बनाते अचानक तश्शू का चेहरा उसकी आंख के आगे घूम गया। कॉफी के कड़वे घूंट ने सारी कड़वाहट नीचे बिठा दी जैसे।

तश्शू को याद कर होंठ मुस्करा दिए। बेहद खिलंदड़, मस्त तश्शू उसकी बेस्ट फ्रैंड थी। बारहवीं तक आते-आते जब लड़कियां अपने भविष्य और कैरियर को लेकर सीरियस हो गई थीं तब तश्शू का कैरियर था घर और बच्चे।

हाय… वह आह भरती, मेरा बस चले तो ट्वैल्थ करते ही शादी कर लूं और खूब सारे गोलू-मोलू बच्चों से घर भर डालू… इंटरवल में टेबल के ऊपर बैठ डेस्क पर पैर रख तश्शू क्लास में जोर-जोर से एनाउंसमेंट करती। ‘क्यों तू अपने पैरों पर नहीं खड़ी होना चाहती है? कोई पूछता।

चुप बे, मैं तो हस्बेंड के पैरों पर खड़ी होना चाहती हूं… तश्शू के जवाबों पर क्लास हंस-हंस कर लोटपोट हो जाती थी।

क्लास की जोकर थी तश्शू। सुमी को एक घटना याद कर हंसी आने लगी। उस दिन तश्शू शोले की सी.डी. देख कर आई थी और क्लास में हर बात पर शोले का कोई न कोई संवाद मार रही थी। मैम को क्लास में आने में देर हो रही थी,तश्शू ने मोर्चा संभाला हुआ था और बसंती बनी हुई थी, अचानक प्रिंसिपल उधर से राउंड लगाती हुई निकलीं। संयोग से उनके बात करने की आवाज सुनाई पड़ गई और तश्शू सजा से बच गई मगर शोर उन तक पहुंच चुका था अत: वे सारी क्लास को खड़े रहने की सजा दे कर बाहर चली गई। अभी वे दरवाजे से बाहर भी नहीं निकली थीं कि अचानक तश्शू गब्बर सिंह की तरह बोली, ‘जो डर गया… वो समझो मर गया… पलक झपकते ही प्रिंसिपल तश्शू के सामने थीं, एक जोरदार थप्पड़ से एक बार तो तश्शू हड़बड़ा गई। प्रिंसिपल वार्निंग दे कर चली गईं। उनके जाने के बाद कुछ क्षणों तक साइलेंस छाया रहा, अचानक उसकी आवाज गूंजी, कितने आदमी थे…फिर आवाज बदल कर बोली, ‘आदमी नहीं, एक सिर्फ एक औरत थी सरदार… ओ…हो… मुंह दबा कर हंसते-हंसते सारी क्लास का पेट दुखने लगे। याद कर वह हंस पड़ी।

बी.ए. करते-करते सचमुच तश्शू ने शादी कर ली। एक दिन उसका फोन आया, ‘हे सुमी, एक लड़का पसंद आ रहा है यार। ‘अच्छा… कैसा है? कौन है जैसे उसके सवालों के तश्शू टाइप उत्तर, पिछवाड़े वाले मकान में नई फैमिली आई है। यों तो सारे कल्लू-मल्लू हैं मगर मेरा यार चमकता है उनमें। घर आएगी तो दिखाऊंगी, कभी तो सीरियस हुआ कर… ‘सीरियस हूं यार, मोटा आसामी लगता है चार-पांच गोलू-मोलुओं का बोझा तो उठा ही लेगा। ‘तू नहीं सुधरेगी…

शादी के बाद तश्शू के फोन आने कम हो गए और धीरे-धीरे बंद हो गए। वह भी पढ़ाई, शादी, घर, बच्चे और नौकरी के झंझटों में इस तरह फंसी कि दाएं-बाएं देखने की फुर्सत बंद हो गई।

…और एक दिन तश्शू का चेहरा शहर की दीवारों पर चिपका देख कर वह चौंक गई। रुक कर पोस्टर पढ़ा। तश्शू विधायक का चुनाव लड़ रही थी। सुमी की कॉलोनी भी उसी चुनाव क्षेत्र में आती थी। पोस्टर में सिर पर पल्ला डाले, बड़ी सी बिंदी लगाए, हाथ जोड़े तश्शू का फोटो देख उसे हंसी आने लगी, ‘ये… भी, नौटंकी करना नहीं छोड़ेगी। उसने मुश्किल से अपनी हंसी छिपाई। ।

ऑफिस में पूरे दिन तश्शू दिमाग में घूमती रही। अगले दिन छुट्टी थी। वह मौका तलाश रही थी, जब वह घर में अकेली हो ताकि खुल कर बात हो सके। शाम को पति बाहर गए और बच्चे पार्क में, तब उसने तश्शू को फोन मिलाया। फोन शायद उसकी नौकरानी ने उठाया, ‘मैडम जी आपका फोन…तश्शू की आवाज आई, ‘हलो, कौन?

सुमी नाम सुनते ही वह पहले की ही तरह चिल्लाई, ‘हा…ई…तू… सुम्मी, कहां मर गई थी, इतने दिन न खोज न खबर। जब थोड़ी देर में सारे गिले शिकवे दूर हो गए तो उसने तश्शू से पूछा, ‘ये तेरा नया नाटक है क्या… शहर में तेरे पोस्टर लगे हैं।

‘नहीं रे, सोचा बहुत हो गई घर की नौकरी अब कुछ दीन-दुनिया को भी देखा जाए। ‘अच्छा, तो तेरे गोलू-मोलू सारे बड़े हो गए क्या…

‘हं…हं… तश्शू की आवाज उदास हो शीघ्र ही संभल गई, ‘भगवान ने कहा कि क्या करेगी गोलुओं का, दुनिया में इतने हैं, उन्हें ही देख न…

एक क्षण के लिए मन सन्नाटा खा गया। हे भगवान, तश्शू का सपना सबसे बड़ी इच्छा…

अब तू मेरे साथ लग जा, चुनाव जीतना ही जीतना है, तश्शू कह रही थी। हां… क्यों नहीं…

रात को जब उसने पति को बताया तो वे चिढ़ गए, ये राजनीति के पचड़े में पडऩे की ज़रूरत नहीं है। घर-बार देखो, नौकरी करो, इतना ही बहुत है। ये राजनीति तश्शू जैसी औरतों का ही काम है। वह भड़क गई, तश्शू जैसी से क्या मतलब है तुम्हारा, क्या बुराई है उसमें…

मैंने कब कहा कि उसमें बुराई है। जिसका नाम लेने से लड़ाई हो जाए, मैं ऐसी औरत के बारे में बात नहीं करना चाहता। हरि ने कहा और मुंह घुमा कर सो गए। मन विद्रोह कर उठा। इच्छा थी कि झकझोर कर उठा दे और कहे कि मैं तो उसके साथ रहूंगी, तुम रोक सको तो रोक लो। फिर सोचा, रहना तो यहीं है, तमाशे का क्या लाभ। इसके बाद तश्शू एक के बाद एक सफलता की सीढिय़ां चढ़ती गई। तश्शू अपनी तरह व्यस्त थी, वह अपनी तरह। एक-दूसरे के लिए कभी ही समय निकलता। तश्शू के बारे में उसे रेडियो, टेलीविजन से पता लगता रहता। बोल्डनेस उसमें पहले से ही थी अत: मीडिया की प्रिय थी वह। बहुत दिनों से सब कुछ ठीक चल रहा था कि एक दिन तश्शू का फोन आया, सुम्मी तू कल घर आजा। लंच साथ करेंगे। हां सुन, अकेले आना। मियां के साथ फिर कभी बुलाऊंगी। आ जाएगी न उनके बिना। गाड़ी-वाड़ी की जरूरत तो नहीं है… वह बिना रुके बोलती जा रही थी।हां बाबा, आ जाऊंगी। गाड़ी नहीं चाहिए… उसने हंसते हुए कहा, कोई खास बात?… खास ही है, तभी खास सहेली को बुला रही हूं। आम बात होती तो संवाददाता सम्मेलन बुलाती? ठीक है, कल बारह बजे मिलते हैं । वह देर तक तश्शू के बारे में सोचती रही। इस तरह कोई और बुलाता तो वह बुरा मान जाती, मगर तश्शू तो तश्शू ही है। पता नहीं क्या खास खबर होगी।

अगले दिन एक बजे वह तश्शू के बंगले पर थी। चौकीदार ने नाम सुनते ही गेट खोल दिया और वह अपनी गाड़ी सहित अंदर घुस गई। पार्किंग से मुड़ी ही थी कि तश्शू ने उसे कस कर भींच लिया, हा…ई… सुम्मी कैसी है… और खुद को संयत भी नहीं कर पाई थी कि वह उसे अंदर ले चली। चल, आराम से बिस्तर पर गप मारेंगे।

बेडरूम में पलंग पर बैठते हुए सुमी ने कहा, ‘उफ तश्शू, कौन कहेगा कि तू इतनी बड़ी पॉलीटीशियन है? तेरा बचपना नहीं गया अभी तक।

‘यार एक तू ही तो है जिसके सामने मैं मैडम तसमीना सहाय न हो कर सिर्फ तश्शू हूं। तेरे साथ जी…जी..आई… में पढऩे वाली तश्शू सिन्हा। ‘तश्शू की आवाज की उदासी ने उसे गमगीन कर दिया। बात संभालते हुए बोली, ‘मैंने तो ऐसे ही कह दिया था। वरना मुझे कौन जानता है? मैंने सोचा कोई देख लेगा तो क्या सोचेगा।

तश्शू नाराज हो गई, यार, ये कोई ही तो हमें अपने ढ़ंग से जीने नहीं देता, सारी जिंदगी इस कोई के डर से खुद को मारते रहते हैं और ये जनाब कोई हैं जो कभी खुश ही नहीं होते। अच्छा तू ही बता, सारी जिंदगी कोई के हिसाब से काम करती रही, तुझे क्या मिल गया… अच्छा बाबा माफ कर, छोड़ ये बहस, ये बता मेरे नाम वारंट क्यों जारी किया गया। तभी नौकरानी जूस लेकर आ गई, चल ठंडा-ठंडा जूस पी, उसने गिलास पकड़ाते हुए कहा। खाना खाते हुए उसने महसूस किया कि तश्शू कुछ परेशान है, जैसे खुद को तैयार कर रही हो। हालांकि वह लगातार बातें, हंसी-मजाक करते हुए सामान्य दिखने की कोशिश कर रही थी। अंतत: उसने पूछ ही लिया, क्या बात है तश्शू तू कुछ उलझी सी लग रही है…

ओ…ह…., सच सुमी, कितनी मुद्दत के बाद किसी ने मुझे इस नाम से बुलाया है। हे सुम्मी, अकेले में तश्शू ही बोल न…, लग रहा है साड़ी-

वाड़ी फेंक फिर से स्कूल यूनीफार्म पहन आऊं।

अच्छा अब ये पागलपन छोड़ और मेन बात पर आ, जिसके लिए तूने मुझे बुलाया है। सुमी को खुद भी लग रहा था कि तश्शू के साथ वह भी वापस स्कूल टाइम में चली गई है। तश्शू एक क्षण के लिए संजीदा हो गई। फिर बोली, पहले बिस्तर में पैर फैला कर पसर जाएं।

दोनो हल्के चादर पैरों पर डाल कर बिस्तर पर बैठ गई। ‘हां, अब बोल।

देख सुम्मी, मैंने सोचा तुझे मीडिया से पता चले उससे पहले मैं तुझे बता दूं कि मैं… अभिमन्यु सहाय को छोड़ रही हूं।… तश्शू इतना बोलने में ही हांफ गई। क्या? उसे लगा तश्शू मजाक कर रही है… ‘क्या कहा तूने… हां, तूने ठीक सुना है, मैं अभिमन्यु को छोड़ रही हूं… अब तक वह स्थिर हो चुकी थी। बात क्या हुई? अभिमन्यु तेरी अपनी पसंद है। सभी समझते हैं कि तू घर-बाहर सुखी-संतुष्ट है। दूर के ढोल हमेशा सुहावने होते हैं। तश्शू फीकी हंसी हंस कर बोली। मगर इससे तेरी पार्टी… पॉलिटिक्स में तेरा फ्यूचर… लोग…

देख सुमी, तू बचपन से मुझे जानती है… मैंने लोगों की कभी परवाह नहीं की। चारदीवारी में जब मेरा दम घुटने लगा और व्यर्थता का एहसास बढऩे लगा तो मैंने अनाथ बच्चों के लिए कुछ करने की सोची। एन.जी.ओ. में काम करते-करते राजनीति में आ गई। भाग्य साथ देता रहा और मैं वहां पहुंच गई जहां के लिए मैंने कभी सोचा नहीं था। मैं कभी भी ज्यादा महत्वकांक्षी नहीं थी। तू तो अच्छी तरह जानती है… ‘मैं तो अपने गोलुओं-मोलुओं के साथ ही खुश रहती मगर… ईश्वर की मर्जी… उसने बोलना जारी रखा।

लाख रोने गिड़गिड़ाने के बाद भी अभि ने बच्चा गोद लेने से इंकार कर दिया। खुद बिजनेस के सिलसिले में दिनों घर से गायब।

इतना तो तू जानती है कि बड़ी गंदी चीज है राजनीति। इसमें कोई किसी का नहीं होता। जो आज तुम्हारे तलवे चाट रहे हैं कल तुम्हें पहचानने से भी इंकार कर देंगे। दूसरी ओर जो कल तक तुम्हारे खिलाफ खड़े थे, अचानक कदमों पर गिर जाएंगे। ऐसे में तुम्हें कोई चाहिए, जिसके कंधे पर सिर रख कर सोया और रोया जा सकता हो। मुझे जब भी जरूरत हुई, अभि ने बेदर्दी से मुझे झटक दिया।

उनकी मर्जी के खिलाफ राजनीति में आई थी क्या? सुमी ने उसे टोका। नहीं रे, … वह धीरे से मुस्कराई… मेरे राजनीति में आने के बाद अभि का व्यापार दिन दूना रात चौगुना बढ़ रहा था, वे भला मुझे मना करके अपने पैरों पर कुल्हाड़ी क्यों मारते? सच तो यह है कि मैं अभि के लिए तरक्की की सीढ़ी के सिवा कुछ नहीं थी। मगर…

तू बोल मत सिर्फ सुन। आज बहुत दिनों के बाद तश्शू सिन्हा को बोलने का मौका मिला है, तश्शू ने अपनी बात जारी रखी, तू समझ सकती है अपने देश में मां-बाप से झगड़ कर शादी करने का क्या मतलब होता है? और रही अभि के मां-बाप की बात, तो उनकी क्या शिकायत करूं। जब हमने सरकारी बंगले में शिफ्ट किया तो वे लोग नहीं आए। बहू के मकान में आने में उन्हे बेइज्जती लगी होगी। सुमी को लग रहा था कि इतने सालों से जानने के बाद भी वह तश्शू को कितना कम जान पाई है।

न जाने अभि के कौन-कौन से रिश्तेदार पैदा हो गए। घर जैसे होटल हो गया। लोगों के लिए मैं पावरफुल तो थी, पर थी तो बांझ औरत ही। लोग अभि से सहानुभूति दिखाते जैसे मेरे होते हुए भी वह विडोअर हो। विशेष रूप से चाची, मौसी नुमा औरतें अभि को देखते ही ‘च्च-च्च की आवाज निकालते हुए कहतीं, ‘स्वामी जी कह गए हैं बिन घरनी घर भूत का डेरा… अब नेताजी को तो फुर्सत है नहीं घर दुआर देखने की। अरे नौकरों के सहारे घर चलता है? छुट्टी सांड बनी हैं न बाल न बच्चा.. और अगर किसी का काम न हो पाया हो तब तो, ‘एक लड़के की नौकरी लगा नहीं पाईं, बड़ी मिनिस्टर हैं। अरे बाल-बच्चे हैं नहीं जो किसी का दुख समझती। 

‘तूने उन्हें निकाल बाहर क्यों नहीं किया, सुमी को महसूस हुआ जैसे तश्शू की पीड़ा उसकी पीड़ा से मिल गई हो। अभिमन्यु सहाय और उसके पति हरि का चेहरा घुलने-मिलने लगा। ‘वह भी तो नौकरी करती है, मगर कितने निर्णय अपने मन से ले सकती है? हरि ने भी तो तश्शू के साथ प्रचार में जाने का विरोध किया था। उन्ही ने भतीजे की नौकरी के लिए के लिए शर्मिंदगी नहीं महसूस की। शुक्र है कि उसने ही तश्शू से नहीं कहा था।

‘हम इक्कीसवीं शताब्दी में जी जरूर रहे हैं सुमी, मगर अभी भी औरत के लिए कुछ खास नहीं बदला है। अगर अभि मेरी जगह होते तो लोग मुझसे उम्मीद करते कि मैं हर दुख, परेशानी में खुद को भूल कर अभि का साथ दूं। मगर यदि मुझे जरूरत है तो अभि की ऐसी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती है। बल्कि लोग कहते कि नहीं होता तो छोड़ क्यों नहीं देती? राजनीति करनी क्या जरूरी है? सुमी को लग रहा था जैसे तश्शू उसी की कहानी कह रही है, ‘हाँ तश्शू, पुरुष केवल वहीं तक बदलता है जहां तक उसका स्वार्थ और सुविधा जुड़ी होती है, जहां उसे असुविधा हुई, वह तुरंत परंपरागत पुरुष में बदल जाता है।

‘सुमी, मैं जब तक अभि में बदलाव को समझती, बहुत देर हो चुकी थी। मम्मी कहा करती थीं कि ‘आदमी की जूती भी घर के दरवाजे पर रखी हो तो औरत सुरक्षित रहती है। मैं शायद इस सुरक्षा में इतनी निश्चिंत थी कि धोखा खा गई। ‘तश्शू ने अपनी आवाज को संयत करने के लिए दांतों से होठों को दबा लिया। कुछ क्षणों के बाद तश्शू ने बोलना शुरू किया। ‘बाहर तो राजनीति में ऐसे ही रहना था मगर घर ने मुझे तोड़ दिया। मेरे पास कोई कंधा नहीं था। मैं अकेली थी टूटी, बिखरी। अचानक अनजाने ही पता नहीं कब मैंने महसूस किया कि मेरे पास भी एक कंधा है, जिस पर मैं आंसू बहा सकती हूं। सच सुमी, कोई और विश्वास करे न करे तू तो मुझे समझ सकती है न, मैंने ऐसा जानबूझ कर नहीं किया। मुझे उसकी बहुत जरूरत थी। पहली बार तश्शू की आंखों में आंसू देखे थे उसने। ‘जो डर गया वो मर गया वाली तश्शू के अंदर इस समय सोलहवीं शताब्दी और इक्कीसवीं शताब्दी का द्वंद चल रहा था।

सुमी उसे देखती रही, रो लेने से तश्शू का दिल हल्का हो गया। थोड़ी देर बाद अपने आंसू पोंछ कर बोली, ‘मैंने बहुत आंसू बहा लिया सुमी अब और नहीं। सहारे के लिए भटकता मेरा मन कंधा देख सिर रखने को कमजोर जरूर हुआ था, मगर यह कुछ ही देर के लिए था। अब मैं इतनी सशक्त हो चुकी हूं कि अपने मजबूत कंधों पर दूसरों को सहारा दे सकती हूं। मुझे अभि की जूतियां दरवाजे पर रख कर जीने की जरूरत नहीं है। सुमी ने कस कर तश्शू के हाथ थाम लिए, ‘हां तश्शू, बिल्कुल ठीक निर्णय लिया तूने। अब इक्कीसवीं सदी में ही जिएगी औरत। 

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