googlenews
कान का कमाल: Ear Story
Kaan Ka Kmaal

Ear Story: राजेन्द्र एक प्राईवेट कंपनी में चपरासी है। वह अपना काम बड़ी ईमानदारी से करता है। कंपनी के सभी कार्मिक उसे पसंद करते हैं। आज किसी को ईमानदार कहने पर बहुत सोचना पड़ता है। कब वो ईमानदार बेईमानी कर जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। पर राजेन्द्र के बारे में कार्यालय के सभी कर्मचारियों का एक मत है की वह ईमानदार है। एक दिन कार्यालय की कुछ महिला कर्मचारियों ने उसे अपने व्यक्तिगत काम से शहर से कुछ सामान लाने को कहां तो राजेन्द्र ने उनसे कहां, ‘वो मैनेजर साहब की घंटी पर है इसलिए वह अभी कही नहीं जा सकता।Ó इन महिला कर्मचारियों को बहुत बुरा लगा जैसे इनकी सास ने उनके माता-पिता की बुराई कर दी हो। फिर क्या था इन महिला कर्मचारियों ने मैनेजर के कान भरना शुरू कर दिया। मैनेजर कान का कच्चा था बिना सोचे समझे इनकी बातों में आ गया और इनकी बातों पर विश्वास कर लिया। और मैनेजर ने राजेन्द्र को काम से निकाल दिया। तब इन महिलाओं के चेहरे पर जंग जीतने जैसी मुस्कुराहट दिखाई दे रही थी। कान का कच्चा आदमी बहुत खतरनाक होता है। देखा आपने कान का कमाल बेचारे राजेन्द्र को कान के कच्चे मैनेजर ने नौकरी से निकाल दिया।
कहने की जरूरत नहीं की कान हमारे शरीर के कितने महत्वपूर्ण अंग है। और कितने काम के हैं। इनका काम सुनना है। पर हम अपने कानों को क्या-क्या सुनाते रहते हैं, जो नहीं सुनना चाहिए वहां भी हमारे कान खड़े हो जाते है। हमारे कान जब तक चटपटी बातें, रहस्यमय बातें, गुप्त बातें, अश्लील बातें सुन नहीं लेते उनका मन नहीं भरता। ये काम हमने ही उन्हें दिया है।
यदि हमारे कानों ने किसी बात पर विश्वास कर लिया तो हम उसे दूसरे के कान में कहते, दूसरा तीसरे के कान मेे कहता है, देखते ही देखते कानोंकान चारों तरफ वह बात फैल जाती है। अफवाहें कानों से ही फैलती है। और कभी-कभी तो ये इतना विकराल रूप ले लेती है कि दंगा फसाद तक हो जाते हैं। जैसे कचरा गाड़ी नहीं आयी तो एक आदमी दूसरे आदमी के यहां चुपचाप कचरा डालकर चला जाता है। वैसे हमारे कानों का हाल है। कान हमारे बातों का कचराघर बन जाते हैं। आदमी की ये प्रवृति हो गई है कि बिना किसी बात की पुष्टि किये, जो उसने सुना जितना जल्दी हो सके दूसरे को सुना दे। आदमी कानाफूसी पर इतना भरोसा करता है कि वह खुद जाकर या देखकर सुनिश्चित नहीं करता। इसे वह समय की बर्बादी समझता है। कानों ने जो सुन लिया यानी आंखों ने वह देख लिया।
कुछ लोग कानों का उपयोग सही ढ़ंग से नहीं करते कहते हैं कि सुनते-सुनते हमारे कान पक गये हैं। अगर आपको कान दिए हैं तो आपको सुनना ही पड़ेगा, अगर सुनने के बाद आपको कोई बात पसंद नहीं आती है तो आप एक कान से सुनकर दूसरे कान से बाहर निकाल सकते हैं। इसलिए हमको एक नहीं दो-दो कान दिये हैं। कान की उपयोगीता को देखते हुए कान का मैल निकालते रहें और कान में तेल डालते रहें।
कुछ लोग कान से बहरे होते हैं तो कुछ लोग बहरेपन का नाटक करते हैं। कुछ जन्मजात बहरे होते हैं, उन्हें बधिर कहते हैं। कानों से सुनाई देना अति आवश्यक है इस आवश्यकता को देखते हुए कम सुनने वाले मशीन का उपयोग भी करते हैं। तो उन्हें बहुत कुछ सुनाई देने लगता है। वह बहुत सुखी है, जिसकी सास को कम सुनाई देता है, पर ऐसा नहीं है। सास अपना सासपन दिखाना नहीं भूलती, उसे लगता रहता है कि बहू ने उसे कुछ गलत कहा है। इसी बात को लेकर बहू से लड़ती रहती है, जबकि बहरा पति दुनिया का सबसे सुखी पति है। ऐसा हम सोचते हैं पर उसकी पत्नी इशारों-इशारों में पति को परेशान करने का काम कर ही लेती है। और अपने पत्नी रूपी स्वभाव को बरकरार रखने का पूरा प्रयास करती है। माता-पिता जब बच्चों को कोई उपदेश देते हैं तो बच्चे अनसुना कर देते हैं तो उन्हें तुम बहरे हो क्या? कहा जाता है। इस तरह कानों को बेइज्जत भी किया जाता है।
कुछ कान ऐसे होते हैं, जो लोगों का दु:ख-दर्द सुनकर भावुक हो जाते हैं तो कुछ कान जासूस की तरह होते हैं। कहीं खुसुरफुसुर सुनते ही उनके कान खड़े हो जाते हैं। कानों को किसी की बुराई या निंदा सुनने पर बड़ी खुशी होती है। हमारे कानों को लोगों की बकवास, अफवाहें, झूठी बातें, समाचार, झूठी खबरें आदि सब सुनने की क्षमता है। आज के बच्चे को माता-पिता की सलाह, समझदारी वाली बातें या शिक्षित महान व्यक्तियों के विचार, प्रवचन सत्संग आदि सुनना रास नहीं आता नाराज हो जाते हैं। एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देते हैं।
महिलाओं के कान सबसे कमाल के होते हैं। कहते हैं महिलाएं सबसे ज्यादा कान की कच्ची होती हैं। बिना देखे कानों पर पूरा भरोसा करती हैं और हर कानाफूसी पर विश्वास कर लेती है। जिसका परीणाम यह होता है कि घर परिवार बिखरने लगते हैं। परिवार में और आसपड़ोस में मनमुटाव आ जाता है। जो व्यक्ति कान का कच्चा होता है वह बिना सोचे समझे दूसरों की बातों पर आसानी से विश्वास कर लेता है। कानों का यही कमाल है कि उसे जो सुनना है वह तो वो सुन लेता है पर दूसरे व्यक्ति के कान तक क्या पहुंचाना है इसका निर्णय व्यक्ति लेता है और उसका क्या दुष्परिणाम होगा इस पर कभी विचार नहीं करता। और सामने वाला व्यक्ति भी तत्थों की जांच किये बिना ही तीसरे व्यक्ति को अपनी ओर से कुछ और मिलाकर अगले व्यक्ति को सुना देता है। इसलिए सुनी सुनाई बातों पर कभी विश्वास न करें। ठ्ठ

Leave a comment