………..‘बेटी‒’ ठाकुर धीरेंद्र सिंह अपने किए पर बहुत अधिक लज्जित थे, अपना मुंह फेरकर भर्राई आवाज़ में बोले‒ ‘तुझे ढूंढ निकालने के लिए यदि हमें आकाश- धरती भी एक करना पड़ता तो कभी नहीं सकुचाते। सभी मां-बाप को अपनी संतानों से प्रेम होता है, फिर तू तो हमारी एकमात्र संतान है। तुझे नहीं मालूम तेरे अचानक ही चले जाने के बाद मारे शर्म के हम तो डूब मरना चाहते थे। वह तो कृपाल सिंह ने सबसे कह दिया कि तेरी तबीयत अचानक ख़राब हो गई है इसीलिए बात बन गई। फिर उसने जो भी राय हमें दी, हम उससे कृतज्ञ होकर सहमत होते चले गए। हमें क्या मालूम था कि यह सब वह अपने स्वार्थ के लिए कर रहा है।’
सरोज की आंख छलक आईं परंतु वह कुछ बोली नहीं। वह यह भी नहीं समझ सकी कि जो कुछ उसने किया था वह उचित था या नहीं, परंतु इस समय जो परिणाम उसे मिल रहा था वह अवश्य उसके लिए लाभदायक था। उसका जीवन तो नष्ट होने से बच गया।
‘मैंने रूपमती का ट्रंककॉल पाते ही यहां के डी.एम. को फोन किया।’ कुछ देर बाद ठाकुर साहब ने फिर कहा‒ ‘उन्होंने वहां तहकीकात की, पता चला कि पुलिस हैडक्वार्टर्स में लखनऊ पुलिस द्वारा इसकी सूचना आ चुकी है। कृपाल सिंह के यहां उन्होंने अचानक ही सुबह पांच बजे धावा किया तो बरामदे में राधा देवी ही नहीं मिलीं बल्कि शहर के छंटे हुए बदमाशों की खोह भी प्राप्त हो गई। स्मगलिंग की वस्तुएं तो इतनी मिली हैं कि बस देखते ही बनता था। कभी कोई सोच भी नहीं सकता था कि कृपाल सिंह इतने बड़े बदमाशों का सरदार है।’ ठाकुर साहब एक पल को फिर रुके और बोले‒ ‘मैंने पुलिस हैडक्वार्टर्स फोन कर दिया है। बयान लेकर राधा देवी को छोड़ दिया जाएगा। मैं सोच रहा था कि किस प्रकार उन्हें लेने जाऊं, किस मुंह से उनके सामने खड़ा हो सकूंगा कि तुम आ गईं। अब बेटी! तुम ही पुलिस हैटक्वार्टर्स चली जाओ और उन्हें किसी प्रकार मनाकर यहां ले आओ तो मैं स्वयं उनसे क्षमा मांग लूंगा। तुम्हारे साथ आने में उन्हें अधिक आपत्ति भी नहीं होगी।’
ठाकुर धीरेंद्र सिंह चुप हो गए। सरोज एक पल सोचती रही। कमरे में सन्नाटा छाया रहा। फिर कुछ देर बाद जब वह चलने को तैयारी हुई तो अचानक ही फोन की घंटी बजी। ठाकुर साहब ने लपककर रिसीवर उठा लिया। लखनऊ से ट्रंककॉल था।
‘हैलो!’ उन्होंने तेज आवाज़ में कहा।
‘….’ जाने क्या उधर से आवाज़ आई जिसे सरोज समझ न सकी।
फिर ठाकुर साहब ने कुछ ज़वाब दिया‒कुछ सुना‒और भी कुछ सुना। चेहरे पर परेशानी के भाव बढ़ते ही जा रहे थे। फिर कुछ निराश से होकर उन्होंने कहा‒ ‘अच्छा-अच्छा हम लोग शाम तक पहुंच जाएंगे।’
‘….’
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‘कार से ही आएंगे। ट्रेन का कोई ठिकाना नहीं कितनी लेट हो जाए।’ ठाकुर साहब कह रहे थे।
‘….’
‘हां-हां राधा देवी को भी लेते आएंगे।’
‘….’
‘नहीं मालूम होगा भई, नहीं मालूम होगा।’
सरोज कुछ पूछते-पूछते रह गई क्योंकि ठाकुर साहब बातें सुनने में मगन थे। उन्होंने अपनी बेटी को हाथ द्वारा बीच में कुछ कहने के लिए मना कर दिया।
‘…..’ जाने क्या बात उधर से सुनाई पड़ रही थी।
‘शुक्र है कि महाराज तो ठीक हैं।’ उन्होंने कहा, ‘यहां सरोज भी घर वापस आ गई है।’
‘….’
‘हां। मैं उसी को राधा देवी को भी लेने भेज रहा हूं।’
‘….’
‘ठीक है, हम शाम तक अवश्य पहुंचने का प्रयत्न करेंगे।’
‘….’
‘क्या? वार्ड नंबर बी-16?’
‘….’
‘अच्छा-अच्छा।’
‘….’
‘बाई-बाई!’ और ठाकुर साहब ने रिसीवर रखते हुए एक गहरी सांस ली तो सरोज ने चिंतित होकर उन्हें देखा।
‘क्या बात हुई डैडी‒’ नहीं रहा गया तो उसने झट पूछ ही लिया।
‘चोट महाराज को भी आई थी परंतु अब वह स्वस्थ हैं। चिंता की कोई बात नहीं है।’ ठाकुर साहब ने कहा‒ ‘परंतु कमल की अवस्था अभी भी ख़तरे से बाहर नहीं है।’
सरोज की चिंता बढ़ी। उसने पूछा‒ ‘और यह आप क्या कह रहे थे कि नहीं मालूम होगा।’
‘ओह।’ उन्हें याद आया। वह बोले‒ ‘तुम्हारी मां ने चेतावनी दी है कि राधा देवी को यह कदापि नहीं मालूम होना चाहिए कि कमल की अवस्था ऐसी ख़राब है। उन्हें यह भी नहीं मालूम होना चाहिए कि महाराज विजयभान सिंह जीवित हैं। राधा देवी सदा उनसे घृणा करती आई हैं। ऐसा न हो कि उनका नाम सुनते ही वह आग-बबूला हो जाएं या कोई दिमागी झटका महसूस करें, प्रभाव किसी भी प्रकार का पड़ सकता है इसलिए हर बात को बहुत सावधानी के साथ करना पड़ेगा। कमल के होश में आते ही सब कुछ अपने आप ठीक हो जाएगा, इसलिए तुम किसी बात की चिंता मत करना।’
सरोज को किसी बात का पूरा-पूरा कारण समझ में नहीं आया, फिर भी उसने अपने पिता के कहे अनुसार राधा को अपनी कोठी लाना उचित समझा। अपनी कार लिए जिस समय वह थाने पहुंची तो सुबह के आठ बज रहे थे। राधा अपना बयान दे चुकी थी। सरोज को देखते ही उसने अपनी आंखें फेर लीं। सरोज के दिल में टीस उठी। झुककर उसने उसके चरण थाम लिए तो राधा पीछे न हट सकी।
‘मां!’ वह आंटी के बज़ाय मां बोली, ममता मां के अतिरिक्त किसी शब्द में नहीं।
और राधा के तपते दिल पर मानो किसी ने पानी के चंद छींटे मार दिए। सरोज को उसने गौर से देखा‒प्यार से भी।
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इसमें सरोज का क्या दोष? राधा सोचने लगी‒उसके बेटे कमल को तो यह दिल की गहराई से चाहती है। नहीं चाहती होती तो ऐन शादी के शुभ अवसर पर अपना घर छोड़कर खानदान की इतनी बड़ी बदनामी का ख़तरा क्यों मोल लेती? उसे अपहरण करने वाले लोग तो कृपाल सिंह के आदमी थे, जिनमें इसके माता-पिता भी सम्मिलित थे, परंतु इस बेचारी से इसका क्या संबंध? उसकी आंखों में सरोज बहुत प्यार से झांक रही थी‒बहुत आशा के साथ। आंखों में उसके आंसू छलक आए थे। राधा ने उसे झट गले लगा लिया। सरोज सिसक पड़ी तो राधा से भी सब्र नहीं हो सका।
‘मेरे साथ चलो मां‒मेरे घर।’ ‒सरोज ने कुछ पल बाद कहा।
राधा ने उसे आश्चर्य से देखा।
‘हां मां!’ सरोज बोली, ‘मेरे घर चलो। डैडी अपने किए पर बहुत लज्जित हैं, इसीलिए आपको लेने नहीं आए। वह आपसे स्वयं क्षमा मांगना चाहते हैं। मां भी बहुत लज्जित हैं। मुझे इसीलिए भेजा है कि आप आने से इनकार नहीं करेंगी।’
राधा के गंभीर मुखड़े पर एक मुस्कान उभरी। एक सपना-सा उसने देखा…कमल दूल्हा है और सरोज दुल्हन। बहू ने उसके घर की चौखट पर पग रखा है, झुककर उसके चरण छुए हैं तो उसने उसे गले लगा लिया है… और सचमुच सरोज को अपनी छाती से लगा लिया।
‘चलो मां! मेरे घर चलो ना…’ सरोज ने फिर कहा।
और राधा चुपचाप उसके साथ होकर थाने के बाहर निकल आई। सरोज की कार प्रतीक्षा कर रही थी।
कार अपनी पूरी गति के साथ लखनऊ के रास्ते भागी जा रही थी। हवाई जहाज का तुरंत ही मिलना असंभव था और रेलगाड़ी का यदि समय भी होता तो इस पर निर्भर नहीं किया जा सकता था क्योंकि हमारे देश में रेलगाड़ियों का लेट चलना आजकल एक साधारण-सी बात है, इसलिए जल्द-से-जल्द लखनऊ पहुंचने के लिए ठाकुर धीरेंद्र सिंह को अपनी गाड़ी पर ही पूरा विश्वास करना पड़ा था। ड्राइवर निपुण तथा अनुभवी था इसलिए उसके हाथ में स्टीयरिंग देकर वह निश्चिंत हो गए थे। वह आगे बैठे हुए थे और पीछे थी सरोज और राधा। राधा ने उन्हें क्षमा कर दिया था, फिर भी वह अब तक लज्जित थे। राधा से आंखें मिलाना भी उनके लिए दूभर था। राधा और सरोज कुछ देर तक तो आपस में बातें करती रहीं परंतु फिर यात्रा की लंबाई ने उन्हें ख़ामोश कर दिया। अर्ध लेटकर राधा ने अपनी आंखें बंद कर ली थीं क्योंकि पिछली रात कृपाल सिंह की काल-कोठरी में बंद रहकर वह अपने साथ बेटे की चिंता लिए एक पल भी नहीं सो सकी थीं। सरोज ने भी उसे आराम करने से नहीं रोका और किनारे सरककर जगह दे दी थी। प्यार से उसका सिर अपनी गोद में रख लिया था और बाहर के चलते-फिरते संसार में खो गई थी।
राधा को उन्होंने विश्वास दिलाया था कि वे सब रामगढ़ ही जा रहे हैं। चूंकि रामगढ़ लखनऊ से आगे ही पड़ता था इसलिए राधा को किसी बात का संदेह नहीं हो सका। दिन भी ढल गया और फिर शाम हो चली।
फिर गाड़ी शहर में दाखिल हुई। लखनऊ की चौड़ी सड़कें आसपास से गुज़रती बसों के हॉर्न, तांगों की आवाजें, शहर का शोरगुल। राधा बहुत आराम से सो रही थी कि उसकी आंख खुल गई। वह उठ बैठी। आंखें मलते हुए उसने देखा, लखनऊ की जगमगाती सड़कों पर रंगीनियां थिरक रही हैं। उसने कुछ पूछना चाहा ही था कि उनकी कार ठीक मेडिकल कॉलेज़ के अस्पताल के सामने आकर रुक गई। आश्चर्य से उसने सरोज को देखा, फिर ठाकुर धीरेंद्र सिंह को। गाड़ी रुकते ही ठाकुर धीरेंद्र सिंह गेट खोलकर बाहर निकल आए थे। घड़ी देखी तो तीन का समय था। ड्राइवर जेट समान उनकी गाड़ी लेकर आया था।
‘आओ बहन!’ उन्होंने बहुत गंभीर होकर राधा से कहा मानो किसी भेद पर पर्दा डाल रहे हों।
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