घर में पानी भरपूर आता था। हमेशा पानी से हौज भरा रहता था। घर में रहने वाले चार लोग, उसमें भी दो बच्चे और सास बहू। सुबह-सुबह मां जी की आंख खुली तो नित्य कर्म से निवृत्त हो सोचा नहा लूं, तब तक पानी भी आ जाएगा और जितना पानी नहाने में खर्च होगा, फिर से भर जाएगा।
जैसे ही मां जी ने हौज का ढक्कन हटाया और बाल्टी को लेकर हौज की तरफ झुकी ही थी कि तीखी आवाज आई, ‘मां जी…’
‘हां बहू।’
‘अगर आपको कपड़े-लत्ते धोने हैं तो हैंडपंप से पानी क्यों नहीं लेती आती?’
‘बहू मुझे नहाना है।’
‘नहाओ चाहे धोओ, हैंडपम्प तो घर के बाहर ही है। कौन सा कोस भर जाना है?’
‘बहू हौज में पानी भरा है और मुझे सिर्फ नहाना है। एक बाल्टी ही पानी चाहिए।’
‘मां जी आप कुछ समझती नहीं हैं। पानी का क्या भरोसा? आए या न आए, कौन-जाने।’
‘लेकिन बहू मुझे केवल एक बाल्टी ही चाहिए।’
मां जी, मैं तो आपसे बहस करके जीत भी नहीं सकती। आपसे सुबह-सुबह माथा खपाने से तो अच्छा है दीवार पर सिर मार लूं। बहू बड़बड़ाते हुए चली गई।
मां जी कुछ न बोल सकीं। असहाय सी बाल्टी को उठाया धीरे-धीरे दरवाजे की तरफ कदम बढ़ाने लगी।
मां जी ने अनुभव किया कि इस दुनिया में कमजोर और असहाय लोगों को कदम-कदम पर अपमान सहना पड़ता है। काश! आज मेरा बेटा जिंदा होता तो यह दिन न देखना पड़ता।
यह भी पढ़ें –मूल्याकंन – गृहलक्ष्मी कहानियां
-आपको यह कहानी कैसी लगी? अपनी प्रतिक्रियाएं जरुर भेजें। प्रतिक्रियाओं के साथ ही आप अपनी कहानियां भी हमें ई-मेल कर सकते हैं-Editor@grehlakshmi.com
-डायमंड पॉकेट बुक्स की अन्य रोचक कहानियों और प्रसिद्ध साहित्यकारों की रचनाओं को खरीदने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें-https://bit.ly/39Vn1ji
