World Rabies Day: एनिमल-बाइट या उसके स्लाइवा से होने वाली जानलेवा रेबीज़ डिजीज ज्यादातर एन्डोमिक एरिया मे जैसे अफ्रीकी और एशियाई देशों में पाई जाती है। एशियाई देशो में तो 66 प्रतिशत है। डब्ल्यूएचओ के आंकड़ों के हिसाब से रेबीज़ डिजीज से प्रतिवर्ष दुनिया भर में प्रतिवर्ष 55 हजार मौते होती हैं जिनमें 40 प्रतिशत बच्चे होते हैं। रेबीज कुत्ते, बिल्ली, बंदर, चमगादड, गाय-भैंस, चूहों, स्कंक, लोमड़ी, भेडिया जैसे वार्म ब्लडेड स्तनधारी एनिमल्स से होती है। भारत में ज्यादातर कुत्ते या बिल्ली के काटने से रेबीज डिजीज के मामले देखने को मिलते हैं।
क्या है रेबीज़
रेबीज़ एक जानलेवा जूनोटिक वायरल डिजीज है जो लायसा न्यूरोट्राॅफिक वायरस के संक्रमण से होती है। ये वायरस वार्म ब्लडेड स्तनधारी जीवों को आसानी से अपना शिकार बनाते हैं। जब रेबीज वायरस से ग्रसित एनिमल या रेबिड दूसरे एनिमल को काटता है तब ये वायरस उसके स्लाइवा या लार के माध्यम से दूसरे एनिमल में ट्रांसमिट हो जाते हैं। वो एनिमल डोमेस्टिक या वाइल्ड, कोई भी हो सकता है।रेबिड एनिमल जब किसी मनुष्य को काटता है, या अपने नाखूनों से उनकी त्वचा पर स्क्रैच डालता है या फिर उसकी चोट,घाव, खरोंच या कटी-फटी त्वचा को चाटता है।तो उसके स्लाइवा, नाखूनों के माध्यम से रेबीज वायरस मानव शरीर में ट्रांसमिट हो जाते हैं।
रेबीज़ न्यूरो-इनवेसिव वायरल बीमारी है। इसके वायरस तंत्रिका तंत्र यानी सेंट्रल नर्वस सिस्टम पर अटैक करते हैं। ये वायरस शरीर में मौजूद नव्र्स या तंत्रिकाओं के माध्यम से स्टीमुलेट होकर ब्रेन तक पहुंचते हैं। वहां बड़ी तेजी से मल्टीप्लाई होकर व्यक्ति को रेबीज का शिकार बनाते हैं।रेबिड एनिमल के काटने, वायरस ब्रेन तक पहुंच कर मल्टीप्लाई होने और रेबीज के लक्षण आने के बीच के समय यानी इंक्यूबेशन पीरियड अलग-अलग होता है। आमतौर पर यह पीरियड 1-4 सप्ताह का होता है, कुछ मामलो में यह 6महीने या उससे अधिक समय भी ले लेता है।
यह इस बात पर निर्भर करता है कि एनिमल ने मरीज केा शरीर के किस हिस्से पर काटा है।रेबिड एनिमल अगर मरीज के पैरों पर काटने के बजाय कंधे, मुंह या सिर के आसपास काटता है, तो मरीज रेबीज का जल्दी शिकार हो जाता है। क्योकि यहां नव्र्स का बड़ा जाल होता है जिनसे वायरस ब्रेन तक जल्दी पहुंच जाता है। कई मामलों में मरीज को 5-5 साल तक कुछ नहीं होता। रेबिड एनिमल से से ट्रांसमिट हुए वायरस मरीज के शरीर में निष्क्रिय पडे़ रहते हैं। स्टीमुलेट न होने के कारण मल्टीप्लाई नही कर पाते।
लेकिन एक बार जब रेबीज के लक्षण जब मरीज में दिखने शुरू हो जाते हैं, तो मरीज को बचाया नही जा सकता।रेबीज ऐसी खतरनाक जानलेवा बीमारी है जिसके इलाज के लिए जरूरी कोई एंटीवायरल मेडिसिन अभी तक विकसित नही हुईं है। मरीज बामुश्किल 8-10 दिन तक ही जिंदा रह पाता है।लेकिन थोड़ी सतर्कता बरती जाए, किसी भी एनिमल के काटने पर तुरंत डाॅक्टर को कंसल्ट किया जाए और वायरस के इंक्यूबेशन पीरियड में समुचित वैक्सीन लगवाई जाएं ,तो रेबीज जैसी खतरनाक बीमारी से बचाव हो सकता है।
क्या है लक्षण
न्यूरो-इनवेसिव वायरल बीमारी होने के कारण पीडित व्यक्ति नाॅर्मल नही रह पाता।मरीज को शुरू के एक-दो दिन में बुखार, भूख न लगना, कमजोरी, चिड़चिड़ापन होता है। एनिमल काटने से हुए जख्म मंे तेज दर्द, जलन और इंचिंग रहती है। 2-3 दिन बाद न्यूराॅजिकल सिम्टम शुरू होते हैं जैसे- मानसिक परेशानी, व्यग्रता, मतिभ्रम, अनिद्रा, एब्नाॅर्मल आक्रामक बिहेवियर,सांस लेने में परेशानी, पानी से डर या हाइड्रोफोबिया, तेज आवाज, तेज रोशनी से डरने लगता है, मांसपेशियों में दबाव पड़ने और मुंह से स्लाइवा अधिक निकलने केी वजह से निगलना मुश्किल हो जाता है। आंशिक पक्षाघात, बेहोशी, हृदय काम करना बंद कर देता है, मरीज कोमा में चला जाता है। यह बहुत लास्ट की स्टेज होती है और आखिर में 6-10 दिन में मरीज की मौत हो जाती है।
क्या करना चाहिए
रेबीज से बचने के लिए सही समय पर प्रिवेन्टिव उपाय करने जरूरी हंै। यानी उसके वायरस को मरीज के शरीर में मल्टीप्लाई या बढ़नेे से रोका जा सकता है और रेबीज डिजीज से बचा जा सकता है। जब किसी रेबिट एनिमल ने बाइट किया हो, तो सबसे पहले जख्म को साबुन और नल के बहते हुए पानी से 10-15 मिनट तक लगातार क्लीनिंग या धोना चाहिए। अच्छी तरह वाॅश करने के बाद जख्म केा डिटोल, टिंचर, आयोडीन एंटीसेप्टिक या आफ्टर शेव से अच्छी तरह साफ कर लें। ऐसा करने से एनिमल के स्लाइवा में पाए जाने वाले लायसा वायरस की मात्रा कुछ कम हो जाती है।
उसके तुरंत बाद मरीज को तुरंत अस्पताल या डाॅक्टर के पास जाना चााहिए और 20-24 घंटे के भीतर वैक्सीनेशन जरूर कराना चाहिए। कुछ लोग हल्दी, तेल या मिर्च जख्म पर लगा लेते हैं- जो गलत है। इसका कोई फायदा नही है। इसके बजाय मरीज को सबसे पहले वायरस को फ्लश आउट करके शरीर में उसको फैलने से रोकना चाहिए।
क्या है इलाज
सबसे पहले डाॅक्टर एनिमल और मरीज की हिस्ट्री जानते हैं। यह जानने के लिए कि एनिमल रेबिड है या नहीं,तकरीबन 10 दिन तक उसे वाॅच करने को कहते हैं। अगर वो एनिमल रेस्टलैस या इरीटेबल होकर इधर-उधर घूमते रहते है,पागल-सा हो जाता है और या अगर वह बिना किसी मतलब के मरीज को कोट लेता हैै। तो समझा जाता है कि उसे रेबीज संक्रमित है और 10 दिन में उसकी मौत हो जाती है। लेकिन अगर वो एनिमल 10 दिन बाद भी हैल्दी रहता है, तो माना जाता है कि मरीज को रेबीज संक्रमण नही हुआ है और उसको दी जा रही एंटी रेबीज वैक्सीन बंद कर दी जाती हैं।
रेबीज से बचाव के लिए मरीज को पोस्ट-एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस वैक्सीन दी जाती हैं। सरकारी अस्पतालों में ये वैक्सीन फ्री दी जाती है। ये एक तरह के वायरस ही होते हैं जो डैड वायरस होते हैं। वैक्सीन के माध्यम से इन्हें मरीज के शरीर में इंजेक्ट किया जाता है। ये वायरस शरीर में इम्यूनिटी बढ़ाते हैं जिससे शरीर रेबीज वायरस के विकास को रोकने में सक्षम हो जाती है। इसमें दो तरह के इंजेक्शन लगाए जाते हैं-
एंटी रेबीज वैक्सीन
यह वैक्सीन इंटरा मस्कुलर शेड्यूल और इंटरा डर्मल शेड्यूंल दो तरीके से मरीज की बाह के ऊपरी हिस्से डेल्टोइड रीजन और जांघ के सामने वाले हिस्से ग्लूटियल रीजन में लगाई जाती है।इंटरा डर्मल शेड्यूल में वैक्सीन एनिमल के काटने वाले दिन यानी 0 डे पर स्किन मे लगाई जाती है यानी जैसे ही काटा, उसी दिन डाॅक्टर के पास चले जाना चाहिए। लेकिन अगर मरीज वैक्सीनेशन के लिए उसके अगले दिन आता है, तो डाॅक्टर उसी को 0 डे मानते हैं। उसके बाद मरीज को 3, 7, 14 और 28वें दिन वैक्सीन दी जाती है।यह वैक्सीन व्यस्क मरीजो को बाह के ऊपरी हिस्से डेल्टोइड रीजन की स्किन में लगाई जाती है।
एंटी रेबीज ईम्युनोग्लोब्यूलिन सिरम
सिरम उन्हे दिया जाता है जिन्हें एनिमल ने मुंह या आस-पास बाइट किया है या बहुत गहरा घाव है। यह आशंका हो कि उस व्यक्ति में यह बीमारी जल्दी फैल जाएगी, डाॅक्टर उसे वैकसीन के साथ-साथ यह सिरम भी दिया जाता है। सिरम का इंजेक्शन जख्म के आसपास की जगह पर लगाया जाता है। यह सिरम तेजी से काम करता है और वायरस को फैलने से रोकता है।
अन्य सावधानियां
इनके अलावा जानलेवा रेबीज डिजीज से बचने के लिए प्री-एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस वैक्सीन डोमेस्टिक एनिमल्स को 3 महीने की उम्र से पहले जरूर लगवानी चाहिए। समय-समय पर इम्यूनाइज़ किया जाना चाहिए। रेबीज का इंजेक्शन पहले से ही लगा लेना चाहिए ताकि एनिमल्स को रेबीज होने की संभावना कम होगी।
ऐसे लोग जो रेबीज होने के हाई रिस्क में हों जैसे-वेटेनरी डाॅक्टर, एनिमल अस्पताल में काम करने वाले एनिमल हैंडलर वर्कर्स, लेबोरेटरी पर्सनल, एनिमल लवर्स या रेबीज एरिया में काम करने वाले व्यक्ति। इन्हें भी प्री-एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस वैक्सीनजरूर लेनी चाहिए। यह वैक्सीन 0, 7 और 21 या 28 वें दिन पर दी जाती है।
(डाॅ राहुल नागर, इंटरनल मेडिसिन फीजिशियन ,सहगल नियो अस्पताल, नई दिल्ली )
