Dada dadi ki kahani : एक दुष्ट जादूगरनी थी। उसके घर के सामने एक बड़ा-सा बाग था। बाग में बहुत सारे फूल लगे हुए थे।
एक महिला उस घर के आगे से होकर जा रही थी। उसने सुंदर गुलाब देखे। उसने सोचा कि मंदिर में चढ़ाने के लिए एक फूल तोड़ लिया जाय। लेकिन जैसे ही उसने फूल तोड़ने के लिए हाथ बढ़ाया, जादूगरनी आ गई। वह चिल्लाकर बोली, ‘रुक जा मूर्ख महिला। तूने मेरे फूल को छूआ है। यहाँ किसी को भी मेरे फूल छूने की आज्ञा नहीं है। तेरी इस गलती की सज़ा तुझे ज़रूर मिलेगी। मैं तुझे भी गुलाब का फूल बनाती हूँ।’
यह कहकर जादूगरनी ने इशारा किया। वह महिला घबराकर रोने लगी। वह बोली, ‘मुझे माफ़ कर दो। मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई। मेरे ऊपर दया करो। मुझे फूल मत बनाओ।’
उसका रोना सुनकर जादूगरनी ने कहा, ‘मैंने एक बार जो कह दिया, वह तो होकर ही रहेगा। मैं इतना कर सकती हूँ कि तेरी सज़ा थोड़ी कम हो जाए। आज पूरे दिन तू इस क्यारी में रहेगी और रात होने पर ही अपने घर जा सकेगी। लेकिन सुबह होते ही तुझे यहाँ वापिस आना होगा। यदि ऐसा नहीं हुआ तो तू अपने घर पर ही एक फूल बन जाएगी। लेकिन पौधे पर लगी न होने के कारण तू जल्दी ही सूख जाएगी। इसलिए सुबह होते ही यहाँ आ जाना। हाँ, अगर तुझे किसी ने यहाँ के फूलों में से पहचान लिया तो मेरा जादू टूट जाएगा और तू हमेशा के लिए जा सकेगी।
जादूगरनी के इतना कहते ही वह महिला गुलाब का फूल बनकर एक पौधे से जुड़ गई। रात होते ही वह वापस अपने रूप में आ गई। दिन-भर धूप में रहने से बेचारी परेशान थी। वह देर रात अपने घर पहुँची। घर पर सब परेशान थे।
उसने पूरी कहानी अपने बेटे को सुनाई। उसके बेटे ने कहा-‘माँ आप सुबह वहाँ वापस चली जाना। मैं आपके कुछ देर बाद आऊँगा और आपको पहचान लूँगा। आप बिल्कुल चिंता मत करो।’
सुबह को सूरज निकलने से भी पहले महिला जादूगरनी के बाग में जाकर फूल बन गई। तभी उसका बेटा वहाँ आया। उसने देखा वहाँ गुलाब के बहुत सारे पौधे थे। उन पौधों पर सैकड़ों फूल लगे हुए थे। उसने एक-एक फूल को ध्यान से देखना शुरू किया। काफ़ी सारे फूल देखने के बाद उसने एक फूल चुना और बोला, ‘यही मेरी माँ है।’
इतना कहते ही उसकी माँ पर किया गया जादू टूट गया। वह अपने रूप में वापिस आ गई। खुशी में उसने अपने बेटे को गले से लगा लिया। उसने बेटे से पूछा, ‘एक बात बता बेटा। तूने मुझे पहचाना कैसे?’ बेटे ने कहा, ‘सीधी बात है माँ। जितने भी फूल रात-भर यहाँ रहे, उन सभी पर ओस की बूंदें थीं। लेकिन आप तो रात को घर पर थीं, इसलिए आप बिल्कुल सूखी हुई थीं। मैंने आपको आसानी से पहचान लिया।’
अपने बेटे की बुद्धिमानी देखकर माँ को बहुत खुशी हुई। जादूगरनी ने जब माँ और बेटे का प्यार देखा तो उसको इतना अच्छा लगा कि उसने सबको परेशान करना छोड़ दिया। अब वह दुष्ट जादूगरनी नहीं थी, बल्कि एक अच्छी और नेक जादूगरनी बन गई थी।
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