Hindi Best Story: शकुन छोटी-छोटी बात पर बहस करती थी, बात-बात में रोना आरंभ कर देती थी और कई बार तो ऐसी गालियां कर देती थीं कि नकुल और अनुभा दोनों अपना सिर पीट लेते थे।
आं टी, आप यहां बैठ जाइए। मेट्रो में इस स्वर को अपनी ओर आते देख अनुभा पलटी तो देखा पीछे एक 19-20 साल की किशोरी मुस्करा कर उसे खाली सीट पर बैठने का इशारा कर रही थी। अनुभा
यह सुनकर सीट पर बैठ गई और किशोरी को थैंक्स बोलकर किताब निकालकर पढ़ने लगी। वास्तव में किताब पढ़ना तो बहाना था लेकिन अनुभा को स्वयं को उस किशोरी के द्वारा आंटी बुलाए जाना बहुत अखर रहा था। क्या वह इतनी बड़ी हो गई है कि किशोरी लड़कियां उसे आंटी कहकर पुकारें।
अभी कल की ही तो बात है जब लोग उसकी तुलना श्रीदेवी से करते थे। उसकी खूबसूरती के साथ ही गुणों की मिसाल देते हुए नहीं थकते थे। अनुभा थी ही ऐसी। पढ़ाई में बेहद होशियार। 23 साल की उम्र में ही सरकारी सेवा में कार्यक्रम अधिकारी के पद पर उसकी नौकरी लग गई थी। आम युवतियों की तरह ही उसका 27 साल की आयु में अरेंज्ड विवाह हुआ। लेकिन पति के साथ समीकरण न बैठ पाने से जल्दी ही तलाक भी हो गया। कुछ समय तक वह डिप्रेशन का शिकार भी रही। सरकारी नौकरी
के चलते उसे आर्थिक समस्याएं तो नहीं थीं।
वह कुछ साल माता-पिता के साथ रही। फिर एकमात्र भाई का विवाह हो गया। भाभी घर में आई। सदियों पुरानी इस कहावत को अनुभा बार-बार सुन चुकी थी कि ननद भाभी साथ-साथ रहें तो घर क्लेश का स्थान बन जाता है। इसलिए उसने अपनी बचत से एक चार कमरों का लैट ले लिया। पर
अकेले रहना भी तो किसी चुनौती से कम नहीं था। फिर अनुभा को अकेले रहने की आदत न थी। इसलिए सर्वसमति से यह निर्णय लिया गया कि पिताजी की बहन शकुन को बुला लिया जाए, जिससे कि वह अनुभा के साथ रह सके।
शकुन अनुभा के पिता की बहन थी। वह बाल विधवा थी। उसका स्वयं का कोई ठिकाना नहीं था। कभी एक रिश्तेदार के घर रहती तो कभी किसी दूसरे रिश्तेदार के यहां। छह महीने में एक माह वह अनुभा के घर रहती थी। वह अशिक्षित थी। अक्सर हमारे भारतीय समाज में। जो भाई बहन विवाह से
पहले एक-दूसरे पर जान छिड़कते हैं, विवाह होते ही उनमें दूरियां पनपने लगती हैं। सभी को दूसरे से अधिक अपनी जिमेदारियां कठिन लगने लगती हैं। शकुन की उम्र इस समय साठ साल थी। वह जब भी अनुभा के घर रहने आती तो अनुभा और उसके भाई नकुल दोनों ही उसे देखकर नाक भौं सिकोड़ते थे। शकुन छोटी-छोटी बात पर बहस करती थी, बात-बात में रोना आरंभ कर देती थी और कई बार तो ऐसी गालियां कर देती थीं कि नकुल और अनुभा दोनों अपना सिर पीट लेते थे। दबे मुंह से वे कई बार पिता को बोल भी चुके थे कि, ‘क्यों बुआ जी यहां आती हैं? उनका रहने का कहीं ऐसा प्रबंध कराइए कि उन्हें यहां न आना पड़े। इस पर पिता कहते, ‘बेटा, मैं अकेले कैसे प्रबंध करूं? दूसरा वे अकेली जान हैं, अकेले परेशान हो जाती हैं। इसलिए ऐसा बोल देती हैं। लेकिन वे दिल की बुरी नहीं
हैं। इस पर अनुभा के मुंह से कई बार निकल जाता था, ‘क्या पापा? उनका अपना परिवार तो है नहीं, दूसरों के परिवार को देखकर कुढ़ती रहती हैं, खीजती रहती हैं? पिता कहते, ‘नहीं बेटा, ऐसा नहीं है। लेकिन अनुभा उस समय कुछ न सुनती थी। वह एक महीना जब शकुन बुआ वहां आती थीं तो रोते कलपते ही बीतता था। जिस दिन शकुन बुआ वहां से जाती, उस दिन नकुल और अनुभा दोनों पार्टी करते और खुशी से पूरा दिन बिताते।
अब उन्हीं शकुन बुआ को हमेशा के लिए अनुभा के घर में रहने का प्रस्ताव दिया जा रहा था। पहले तो अनुभा ने साफ मना कर दिया। इस पर नकुल बोला, ‘दीदी, आप अकेले सब कैसे कर पाएंगी? रख लीजिए न बुआ को। आप दोनों एक-दूसरे का सहारा बन जाएंगी। न उनके आगे पीछे कोई है, और न आपके आगे पीछे। आप दोनों की खूब बनेगी जोड़ी।
यह बोलकर नकुल हंसने लगा तो भाभी ने भी चुटकी बजाते हुए कहा, ‘बिल्कुल सही बात है। नकुल के बोल अनुभा के कानों में पिघला शीशा बनकर चुभ गए। उसकी आंखों में नमी आ गई। लेकिन सब के सामने उसने बड़ी कुशलता से आंसुओं को छिपाया और होंठ काटते हुए बोली, ‘ठीक है, मैं देखती हूं।
जब अनुभा ने कहा कि वह मां को अपने साथ ले जाएगी, तो अंजना तपाक से बोलीं, ‘दीदी, आप भी न सिर्फ अपने विषय में सोचती हैं। ममी के बिना इस उम्र में पापा अकेले कैसे रहेंगे? दोनों अब बूढ़े हो रहे हैं। दोनों को एक-दूसरे के साथ की जरूरत होगी। इसलिए शकुन बुआ से बेहतर विकल्प
आपको नहीं मिल सकता।
सब लोगों के दबाव पर कुछ अकेलेपन के कारण अनुभा ने इस बात की समति दे दी। शकुन बुआ खुशी-खुशी अनुभा के लैट पर रहने के लिए आ गई। बेशक अनुभा शकुन बुआ की गालियों, रोने पीटने से परेशान थी लेकिन कभी-कभी वह दिल से उनके प्रति सहानुभूति भी प्रकट करती थी।
शकुन बुआ ने अनुभा के साथ रहना प्रारंभ कर दिया। कुछ दिन तो दोनों का साथ बहुत अच्छे से कटा। लेकिन कुछ समय बाद ही शकुन बुआ अनुभा के ऑफिस से लौटते ही किसी न किसी बात को पकड़ कर बैठ जाती और अनुभा जब उन्हें चुप कराती तो वे रोने बैठ जातीं। ऐसा अब सप्ताह में चार-पांच दिन होने लगा। जब अनुभा ऑफिस के लिए तैयार हो रही होती और दर्पण में लिपस्टिक लगा रही होती तो शकुन बुआ अक्सर उस पर व्यंग्य कसती, ‘तु हें अपने रूप का बहुत दर्प है। जब देखो तब स्वयं को दर्पण में निहारती रहती हो। ये रूप सदा नहीं रहने वाला। अनुभा को बहुत
चिढ़ लगती और वे गुस्से से उन्हें देखने लगतीं।
एक दिन अनुभा ने अपनी सहेलियों के साथ घूमने का प्रोग्राम बनाया। वे शकुन से बोलीं, ‘बुआ, मैं नकुल को बोल जाऊंगी वह आप को दोनों समय खाना दे जाया करेगा।
यह सुनकर शकुन रोते हुए बोली, ‘मेरे पैरों में बहुत दर्द है। तुम पूरा घर मेरे हवाले छोड़कर अपनी सहेलियों के साथ घूमने जा रही हो। मुझसे पूरे घर की देखभाल नहीं हो पाएगी। फिर अंजना खाने में बहुत मिर्च डालती है। मुझसे इतना तीखा नहीं खाया जाएगा। तु हें क्या पड़ी है घूमने की? छोड़ो न घूमना फिरना। फिर रास्ते में इतने एक्सीडेंट होते हैं, भगवान न करे कुछ ऊंच नीच हो जाए।
बुआ की इस बात पर अुनभा का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। वह बोली, ‘बुआ कुछ तो शर्म किया करो। एक तो तुम मेरे साथ रहती हो, मेरी दी गई रोटियां तोड़ती हो। फिर मेरे लिए ही बद्दुआएं निकालती हो। किसी में इतनी हिमत नहीं जो तु हें अपने साथ रख सके। मैं रख रही हूं न तो उसका एहसान माना करो। यह बोलकर वह पर्स उठाकर ऑफिस के लिए निकल गई। बाद में अनुभा को
अहसास हुआ कि आज वह कुछ ज्यादा ही बोल गई। उसका पूरे दिन ऑफिस में मन नहीं लगा।
शाम को ऑफिस से निकलते हुए उसने बुआ के लिए मूंगफली और गरम-गरम जलेबियां लीं। बुआ को दोनों ही बहुत पसंद थीं। अनुभा के द्वारा मूंगफली और गरम गरम जलेबियां पाकर बुआ बिल्कुल बच्ची सी बन गईं। अपना मनपसंद चैनल देखते हुए वे मूंगफली और जलेबियां खाने लगीं।
अनुभा शाम के खाने की तैयारी में लग गई।
‘दीदी, आप अकेले सब कैसे कर पाएंगी? रख लीजिए न बुआ को। आप दोनों एक-दूसरे
का सहारा बन जाएंगी। न उनके आगे पीछे कोई है, और न आपके आगे पीछे। आप
दोनों की खूब बनेगी जोड़ी।’
ऐसा ही खट्टा-मीठा रिश्ता बंध गया था अब अनुभा और शकुन के बीच। अनुभा अपने ऑफिस में इन दिनों बहुत व्यस्त थी। एक दिन बुआ बोलीं, ‘अनु, मेरे पैरों में बहुत दर्द है। मुझे डॉक्टर को दिखा दे। अनुभा बोली, ‘बुआ, यह महीना मेरा बहुत व्यस्त है। मैं नकुल को बोलती हूं। नकुल दो टूक जवाब देते हुए बोला, ‘जब रहती तु हारे पास हैं तो जिमेदारी भी तु हारी बनती है न। नकुल की बातें अब अनुभा को शकुन बुआ से अधिक तड़पाने लगी थीं। एक दिन अनुभा ने मूली के परांठे बनाए और शकुन बुआ को खिलाए। बुआ बोलीं, ‘तू खाना बहुत अच्छा बनाती है। पर ऐसे कब तक चलेगा? मेरा भरोसा नहीं कि कब ईश्वर अपने पास बुला ले। तू कोई अच्छा सा लड़का देखकर विवाह क्यों नहीं कर लेती?

मेरी तरह अपनी जिंदगी मत बिताना। मैंने तो किसी तरह अपनी जिंदगी काट ली, बस मत पूछ कैसे?
बुआ की बातों ने अनुभा के हृदय पर शूलसा वार किया। अब अनुभा चालीस पार कर चुकी थी। लेकिन लगती अभी भी तीस की थी। शकुन बुआ 75 के पड़ाव पर पहुंच चुकी थीं। अब उनके पैरों के दर्द की शिकायत बहुत बढ़ गई थी। एक दिन अनुभा ऑफिस से घर पहुंची तो देखती है कि शकुन बुआ बुरी तरह रो रही हैं। अनु ने पर्स एक ओर फेंका और जल्दी से शकुन के पास पहुंच कर बोली, ‘बुआ, क्या हुआ?
शकुन बोली, ‘आज मेरा पैर हिल ही नहीं रहा। बहुत दर्द हो रहा है। अनुभा ने उनके पैर को उठाने की बहुत कोशिश की। लेकिन पैर को छूते वे बुरी तरह कराहती। कई बार अनुभा को लगता कि बुआ जानबूझ कर बीमारी को बढ़ा-चढ़ा कर बताती हैं। अनुभा दो पाटों में बुरी तरह पिस रही थी। घर में
बुआ और ऑफिस का काम का बोझ उसे तनावग्रस्त करने लगा था। बुआ की जिमेदारी से अब सब बचने लगे थे। अब शकुन बुआ का घर पहुंचते ही रोज किसी न किसी बीमारी से तड़पना उसके लिए एक अजीब चुनौती बन गया था। उस दिन अनुभा जब सोकर उठी तो देखा कि बुआ बिस्तर में पड़ी कराह रही हैं।
अनुभा ने हाथ लगाकर पूछा, ‘क्या हुआ बुआ? बुआ बोलीं, ‘अनु आज तो मुझसे बिस्तर से उठा ही नहीं जा रहा। पता नहीं क्या हो गया। ऐसा लगता है कि हड्डी टूट गई है।
उन्हें बुरी तरह कराहते देख अनुभा ने एंबुलेंस बुलवाई और अकेले ही उन्हें अस्पताल लेकर चल दी। वैसे भी बताती किसे? सभी यही कहते कि उसकी जिमेदारी है। अस्पताल में बुआ की जांच हुई, एक्सरे आदि के बाद पता चला कि उनके घुटने की हड्डी टूट गई है। डॉक्टर ने तुरंत रिप्लेसमेंट के लिए कहा। अकेले अनुभा को दौड़ भाग करते देख अस्पताल के बैड पर लेटी शकुन बुआ की आंखें आंसुओं से
भीग गईं।
वे मन में बोलीं, ‘ये खुद भी तो अकेली है। पर अपना सारा दुख-दर्द भूलकर मेरा कितना ध्यान रखती है? मैं स्वयं पर काबू नहीं रख पाती। पूरा दिन अकेले बिताने के कारण इसे उल्टा-सीधा भी खूब बोलती हूं। फिर भी मेरे खाने-पीने का ध्यान रखती है। पूरा सप्ताह लगभग नाम मात्र खाकर अनुभा
अस्पताल के चक्कर काटती रही। शकुन बुआ अस्पताल से लौटीं तो लेकिन वे अब कमजोर हो गई थीं। अनुभा ने उनके लिए एक फुल टाइम मेड की व्यवस्था की। उनके लिए सुबह का खाना तैयार करके जाती। शाम को उनके लिए दवाइयां आदि खरीदकर लातीं। शकुन और आभा अपने अपने दर्द को पीकर जिए जा रहीं थीं, जिंदगी को चुनौती दिए जा रही थीं।
एक दिन शकुन बुआ को पेट में तेज दर्द हुआ। वे बुरी तरह चिल्लाने लगीं। अनुभा एंबुलेंस से उन्हें अस्पताल लेकर पहुंची तब तक वे इस दुनिया को छोड़कर जा चुकी थीं। शकुन बुआ की निर्जीव देह को देखकर अनुभा को समझ ही नहीं आ रहा था कि पल में ये क्या हो गया? वह शून्य हो गई थी,
जड़ हो गई थी।
उनके अंतिम संस्कार के बाद जब वह घर लौटी तो उसे घर काटने को दौड़ा। वह उल्टे पैर वहां से भागी और मां से बोली, ‘मैं
अकेले नहीं रह पाऊंगी। मैं मर जाऊंगी। बेटी की ऐसी हालत देखकर कुछ दिन मां उसके साथ रही। लेकिन आखिर कब तक?
मां बोली, ‘अब मुझे जाना ही होगा। पिताजी घर पर अकेले हैं। अनुभा बोली, ‘ममी आप और पापा यहीं
रह जाओ न। मां बोली, ‘बेटा तेरे पापा और मैं दोनों ही सीढ़ियां चढ़ और उतर नहीं सकते।
अब हमारी भी उम्र हो चली है। तेरा लैट बहुत ऊपर है। मां के चले जाने पर घर अनुभा को काटने को दौड़ता।
जिस कमरे में शकुन बुआ रहती थीं, उस कमरे में जाते ही लगता कि शकुन बुआ उसे घूरकर देख रही हैं । अनेकों रातें अनुभा ने पलकें झपकाते हुए बिताई। ऑफिस की महिलाओं को भी उससे सहानुभूति हुई। सबने उसे समझाया कि इस दुनिया में पीड़ा
को अकेले ही झेलना पड़ता है।
एक दिन रात को उसे शकुन बुआ की बातें याद आ रही थीं। शकुन बुआ अक्सर गुस्से में कहती थीं कि मरने के बाद भी मैं यहीं रहूंगी तू मुझे यहां से निकलने के लिए बोलती है। मैं कहां जाऊंगी? मेरा कोई नहीं है। ये शब्द याद आते ही अनुभा पसीने पसीने हो गई। वह लाइट जलाकर ही सोती थी। उसका दिल डर से थर-थर कांपने लगा। उसने मनोवैज्ञानिकों से भी इस बारे में बात की। सबने यही कहा कि वे और शकुन बुआ एक-दूसरे से भावनात्मक रूप से बहुत जुड़ गई थीं। इसलिए उनका जाना अनुभा को सहज नहीं लग रहा है। इसलिए उसे ऐसा प्रतीत होता है कि वे अभी भी वहीं हैं, उसी घर में ।
शकुन बुआ अक्सर गुस्से में कहती थीं कि मरने के बाद भी मैं यहीं रहूंगी तू मुझे यहां से निकलने के लिए बोलती है। मैं कहां जाऊंगी? मेरा कोई नहीं है। ये शब्द याद आते ही अनुभा पसीने पसीने हो गई। वह लाइट जलाकर ही सोती थी।
दिन बीतते रहे। हर रात अनुभा के लिए एक चुनौती लेकर आती। एक दिन अनुभा ऑफिस से थकी हुई लौटी। उसने खाना बनाया और जल्दी से खाकर सो गई। उस दिन उसे बहुत गहरी नींद आई। गहरी नींद में उसने एक सपना दिखा। सपने में शकुन बुआ थीं। उन्हें देखकर अनुभा उन्हें कसकर पकड़ते हुए बोली, ‘अब तो आप मुझे छोड़कर नहीं जाएंगी न। मरने का नाटक नहीं करेंगी न।
आप जिंदा हैं न बुआ…प्लीज मुझे छोड़कर मत जाओ। मेरे पास आपके अलावा कोई
नहीं है।’
यह सुनकर बुआ उसे अपने से अलग करते हुए बोलीं, ‘अनु, मैं तुझे बहुत प्यार करती हूं। मैं सदा तेरे साथ आशीर्वाद बनकर रहूंगी और हां आज के बाद तुझे रात में कभी डर नहीं लगेगा। तूने मेरा बुढ़ापे में साथ निभाया है, मैं अंत तक तेरा साथ निभाऊंगी। इसके बाद वे एक श्वेत प्रकाश में ओझल हो गईं।
अनुभा की नींद खुली तो सुबह के चार बज रहे थे। उसने आंखें मलते हुए कमरे की ओर देखा, ‘कहीं कुछ न था। वह कुछ देर तक बिस्तर पर ऐसे ही पड़ी रही। अन्य दिनों की तरह उसने दैनिक कार्य किए और ऑफिस के लिए निकल गई। रात को उस दिन उसे सचमुच डर नहीं लगा। अगले दिन
वह पूरी नींद लेकर उठी। इसके बाद तो ऐसा प्रतिदिन होने लगा अब शकुन बुआ उसे सपने में दिखती और उससे मुस्करा कर बातें करतीं, कई बार कुछ बात बतातीं और फिर ओझल हो जातीं। इसी बीच अनुभा की प्रमोशन हो गई।

अब तो शकुन बुआ के निधन को सात वर्ष हो गए थे। इन सात वर्षों में वह 49 साल के पड़ाव पर आ पहुंची थी। अब अनुभा को अपनी बढ़ती उम्र से डर लगने लगा था। बढ़ती उम्र के अहसास के साथ ही अनुभा को शकुन बुआ की चिड़चिड़ाहट, अपशब्द और बददुआएं अक्सर याद आ जाती थीं। उनके पास तो अपना कहने को कुछ भी नहीं था। उन्हें अपने बुढ़ापे और बीमारी को लेकर कितना भय सताता होगा? वह भय, खीज ही चिड़चिड़ाहट और गालियों के रूप में सब पर निकलती थी। मगर अफसोस किसी ने इस बात को कभी महसूस ही नहीं किया। आज जब मेट्रो में किशोरी ने उसे आंटी
कहकर बुलाया तो एक पल को उसे लगा कि वह शकुन बुआ जैसी दिखने लगी है। अचानक एक हवा का झोंका आया। अनुभा ने देखा कि उसका स्टेशन आ गया था। यानी मेट्रो में उसकी आंख लग गई थी। इसी दौरान उसने एक बार फिर से शकुन बुआ के पूरे साथ को याद कर लिया था। वह पर्स लेकर उठ खड़ी हुई। अचानक ही उसने स्वयं से कहा, ‘बढ़ती उम्र से क्या डरना? मैंने शायद उस समय बुआ के अकेलेपन और बढ़ती उम्र के डर को महसूस नहीं किया था। अगर किया होता तो उनके
गुस्से, खीझ और गालियों को सिर माथे लगाती, कभी उन पर पलटवार न करती। वह
सोच में डूबी-डूबी ही ऑफिस में अपनी सीट पर आ बैठी और काम में खो गई।
