भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
खासी पहाड़ियों में बहने वाली नदी उम्सिंग के किनारे एक गाँव में किशोर नाम का एक बालक रहता था। जिसको पेड़ों से बहुत लगाव था। उसके घर के पीछे एक पेड़ था, जिससे उसकी गहरी मित्रता थी। किशोर अपने माता-पिता की इकलौती संतान था इसलिए जब भी उसे मौका मिलता, वह पेड़ के पास चला जाता। अपना सारा समय वह उसी पेड़ के साथ गुजारा करता, उसी की छाँव में खेलता, उससे बातें करता. उसके फल खाता और उसकी डालियों पर बैठकर रंग-बिरंगी किताबें पढ़ता। किशोर लगभग पाँच साल का हो गया था लेकिन घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण उसके पिताजी ने उसे स्कूल नहीं भेजा था।
“किशोर इस साल पाँच साल का हो गया है, अब उसे स्कूल भेजना ही पड़ेगा”, किशोर की माँ ने किशोर के पिता से कहा।
उसके पिता जी ने चिंता जताई, “इस साल उसे मैं भी स्कूल भेजना चाहता हूँ। जब भी देखो पीछे पेड़ के पास खेलता रहता है, स्कूल की फीस कैसे भरेंगे, घर के हालत तो बहुत खराब हैं।”
“क्यों न इस पेड़ को काटकर पैसे की व्यवस्था की जाए”, माँ ने सलाह दी।
“तुम ठीक कहती हो किशोर की माँ, मैं आज ही बात करता हूँ,” पिताजी को अपनी पत्नी सलाह अच्छी लगी। किशोर स्कूल जाने की बात सुनकर बहुत खुश था, पर जब उसने सुना कि उसके स्कूल की फीस भरने के लिए उसके दोस्त पेड़ को काटा जाएगा, तो बहुत दुखी हो गया। वह सरपट पेड की तरफ भागा. उसे अपनी बाँहों में भरकर रोने लगा। पेड की समझ में कुछ नहीं आया। उसने किशोर से पूछा- क्या बात है किशोर? तुम क्यों रो रहे हो? तुम्हारे स्कूल का आज पहला दिन है न? खुशी-खुशी जाओ और स्कूल से लौटकर सारी बातें बताना। “बात यह नहीं है दोस्त,” कहकर किशोर ने सिसकते हुए सारी बात बतला दी।
पेड़ ने किशोर को अपनी गोद में बैठाया और उसके सर पर हाथ फेरते हुए बोला “मेरे दोस्त, मैं जब छोटा था तो तुम्हारे पिता जी ने ही मेरी देख-रेख की और मुझे इतना बड़ा किया। आज उन्हें मेरी जरूरत है तो भला मैं कैसे उनके काम न आऊँ। तुम बिलकुल भी चिंतित मत हो, हमारी दोस्ती अमर है, हम एक-दूसरे के सच्चे साथी हैं। देखना, मैं एक दिन फिर हरा-भरा हो जाऊँगा। बस मेरी जड़ों में पानी देते रहना। उदास किशोर अपने मित्र की बात कैसे टालता। वह वहाँ से जाने को हुआ ही था कि पानी की एक बूंद उसके सिर पर गिरी और ललाट से होती हुई उसकी आँखों की आँसू बनकर जमीन में जा गिरी। ऐसा लगा मानो दोनों एक साथ रो रहे हों।
आखिर पेड़ को काट लिया गया, किशोर हर समय पेड़ के कटे हुए तने की ओर देखता रहता और रोज उसकी जड़ों में पानी देता। एक दिन किशोर तने के पास बैठा था, जून का महीना था और तपती धूप थी। इस जला देने वाली चिलचिलाती धूप में भी किशोर को वहाँ बैठा देख उसके पिता जी ने किशोर से पूछा, “बेटा, इतनी धूप में तुम क्यों बैठे हो यहाँ?” किशोर कुछ न बोला, तब पिता जी ने दूसरी बार पूछा तो वह रोते हुए बोला- “पिता जी अगर आज मेरा मित्र यहाँ होता तो इस तपती धूप में भी हमें शीतलता प्रदान कर रहा होता।” पिता जी ऐसी बात सुनकर अवाक् रह गए और सोचने लगे कि सचमुच पेड़ हमारे जीवन के लिए बहुत महत्त्वपूण f हैं। उन्हें अपनी गलती का एहसास हो रहा था.. तभी अचानक आसमान में काले-काले बादल दिखाई दिए। देखते ही देखते झमाझम वर्षा होने लगी। दोनों घर की ओर चल पड़े।
तीन-चार दिन बाद किशोर ने कुछ ऐसा देखा कि उसे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ। वह पवन की-सी तीव्र गति से दौड़ा और तने के पास जाकर जोर-जोर से चीखने लगा “पिता जी पिता जी…मित्र…मित्र मेरा मित्र।” पिता जी ने देखा कि तने के बगल से एक नूतन टहनी निकल रही है। किशोर की खुशी का ठिकाना न रहा। वह खुशी से पेड़ की टहनी से लिपट गया, तभी उसके कानों में कुछ आवाज सुनाई दी- अरे मित्र! अबकी बार एक नहीं कई मित्र बनाना ताकि जरूरत पड़ने पर बहुत सारे लोगों की मदद हो सके। आज किशोर के एक नहीं कई मित्र हैं। क्या हम किशोर बन सकते हैं? बच्चों अभी ऐसे मित्रों की बहुत कमी है। मैं तो चला मित्र बनाने और आप…?
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
