फातिमा जब घर आई तो अख्तर काफी गुस्से में था।
वह घबरा गई। उसने सोचा उसका नौकरी करना अख्तर को अच्छा नहीं लगा। वह चुपचाप अंदर चली गई। शगूफा अभी स्कूल से नहीं आई थी।
वह अपने कमरे में जाकर कुर्सी पर बैठ अख्तर की ओर देखने लगी।
वह चारपाई पर पड़ा करवटें बदल रहा था।
फातिमा के दिल में आया कि वह उठे और जाकर उससे पूछे कि वह ऐसा क्यों कर रहा है? आखिर वह उसकी मां है?… पर वह हिम्मत न कर सकी।… खुद भी कौन सा वह नौकरी करना चाहती थी।… यह तो वक्त की मार थी जो आज उसे ये दिन देखने पड़े।… यह तो जख्मों की फसल थी जो उसके खाविन्द के मरने के उपरांत ऐसी पनपी कि जो बढ़ती ही जा रही थी।
उसके खाविन्द प्रो. जावेद को गुजरे पूरा साल हो चुका था। जब वह जिन्दा थे तो फातिमा और उसके परिवार को हर कोई जानता था। लोगों का उसके घर आना जाना था। तब फातिमा को जरा-सा भी बुखार आ जाता तो लोग भागे हुए उसके घर आ जाते थे। प्रो. जावेद के आने से पहले पिछड़े हुए इलाके में बनी इस यूनिवर्सिटी को तो कोई पहचानता भी नहीं था। जावेद ने उसको संसार की प्रसिद्व यूनिवर्सिटियों में लाकर खड़ा कर दिया था बल्कि वह हमेशा इस बात पर गौरव करता। कहीं भी कोई अकादमिक चर्चा होती किसी न किसी संदर्भ में इस यूनिवर्सिटी का नाम जरूर आ जाता। खोज के क्षेत्र में इस यूनिवर्सिटी के कई विभागों को ख्याति मिली हुई थी और कई विभाग तो प्रो० जावेद के बलबूते पर ही खोले गए थे।
उस दिन वह अमरीका जाने की तैयारी कर रहा था। बहुत खुश था। वहां उसे अंतर्राष्ट्रीय स्थितियों पर भारत का पक्ष प्रस्तुत करना था पर अचानक उसकी विरोधी पार्टी को सुराग मिल गया। उन्होंने कोशिश करके उसको एन. ओ. सी. न लेने दी। उसको काफी गुस्सा आया। वह चांसलर के पास गया और अनुमति तो ले आया। पर इसी भागादौड़ी में उसको दिल का दौरा पड़ा और वह वहीं खत्म हो गया। उसकी मौत की खबर सारे शहर में आग की तरह फैल गई थी। कुछ पलों में ही घर के बाहर भीड़ का तांता लग गया।
यूनिवर्सिटी के कई लोग आ गये थे। शहर के कॉलेजों से कई टीचर और प्रो. जावेद के विद्यार्थी थे, आ गये। लोग आपस में ही एक दूसरे के साथ अफसोस जाहिर करते रहे। प्रो. अग्रवाल और प्रो. जावेद की खूब दोस्ती थी। वह यूनिवर्सिटी की राजनीति में भी एक दूसरे के साथ कंधा जोड़ कर चलते। अपने लोगों को प्रोमोट करते और पूरी धाक से अपनी धौंस बनाए रखते।
पर आज तो जैसे प्रो. अग्रवाल की बाजू ही कट गई। उनके सामने अंधेरा था।
उस दिन कैसे शगूफा बौखलाई हुई फातिमा से चिपकी हुई थी। अख्तर भी अभी छोटा ही था। इस बार स्कूल का आखिरी साल था। लाश घर के पहले कमरे में पड़ी हुई थी। लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। लोग आते दिलासा देते और बाहर बिछी दरी पर अपनी पहचान के लोगों के पास जा बैठते।
कितनी विशाल होती थी उनकी दुनिया। प्रोफेसर साहब प्रगतिशील ख्यालों का होने के कारण हर धर्म के लोगों के साथ मेल रखते थे। लोग कहते कि उसके लेखन में सांझी संस्कृति की मिसाल झलकती है और इसी कारण उसका नाम हर जुबान द्वारा आदर से लिया जाता। पर इस सारी भाग दौड़ में वह अपने परिवार की ओर पूरा ध्यान न दे पाये। फातिमा पर्दा करती थी। गरीब और पिछड़े हुए परिवार में जन्म होने के कारण जावेद को आगे बढ़ने में काफी दिक्कत आई थीं। इसलिए घर उससे हमेशा पीछे होता गया।
फातिमा को याद था जावेद ने कई बार कोशिश भी की कि वह परदे में से निकल कर बाहर आये और दुनिया के रंगों में शामिल हो जाए। पर वह अपने संस्कारों से मजबूर थी। कोशिश करने पर भी वह निकल नहीं पाती और सोचती कि बुरके में से बाहर निकल कर करना भी क्या है? अपनी छोटी सी दुनिया ही अच्छी है। पर उसको क्या पता था कि प्रो० जावेद इस तरह चले जाएंगे।
अख्तर हमेशा प्रोफेसर के साथ ही रहता। शायद वह भी ज्यादा से ज्यादा उन्हें जानना चाहता था। वह प्रोफेसर के साथ हर शाम रहता। उसके दोस्तों की बातें सुनता। वाद-विवाद देखता और उनको सोडा व बर्फ ला-लाकर देता।
आखिर में लाश को कब्रिस्तान ले जाया गया और पूरे इस्लामी ढंग से उसे दफना दिया गया। सब लोग अपने-अपने घर चले गये।
प्रो० अग्रवाल उनके पास शाम को भी आकर बैठे रहे व हौंसला देते रहे। अग्रवाल की पत्नी फातिमा को समझा रही थी कि वह अब नौकरी कर ले। पर वह सोचती कि वह तो हमेशा परदे में रही है।… नौकरी कैसे कर सकेगी?… इस तरह की बातें करते-करते रोते हुए जब काफी रात हो गई तो प्रो. अग्रवाल और उसकी पत्नी भी अपने घर चले गए।
अब घर में बस तीन ही सदस्य रह गए थे।
सुबह हुई तो अखबार में खबर छपी हुई थी। प्रो. जावेद के बारे पूरी जानकारी व श्रद्धांजलियां छपी थीं… और साथ में ही एक खबर थी कि कुछ लोगों ने रात को जाकर प्रो. जावेद की कब्र खोदने की कोशिश की। वह कहते थे कि प्रो० जावेद मुसलमान नहीं थे। उसको कोई हक नहीं कि उन्हें इस्लामी रसमों से दफनाया जाये। उनको जलाया जाना चाहिए।
पर मौके पर लोगों ने ऐसा न होने दिया और पुलिस को खबर कर दी। पुलिस कुछ लोगों को पकड़ कर भी ले गई।
इस खबर के बाद सब कांप गये। लगता था कुछ देर में ही जैसे शहर का हर शख्स इसी बात पर चर्चा कर रहा हो।
जब फातिमा को यह खबर पता चली तो वो तो बैठी ही रह गई। अपने खाविंद के बारे में ऐसी बात सुनकर वह उठ न सकी।
इधर यूनिवर्सिटी में प्रो० जावेद के विद्यार्थी और टीचर यूं भी उनकी अचानक मौत पर अपने आपको अकेला महसूस कर रहे थे। उन्होंने सबको मीटिंग पर बुला लिया और शहर में जुलूस निकालने का सुझाव लेकर वह प्रो० अग्रवाल के पास आए। पर प्रो. अग्रवाल के काफी समझाने पर भी वे न माने और प्रो० जावेद के हक में जुलूस निकालने चल दिए। वह उन लोगों को गिरफ्तार करने की मांग भी कर रहे थे जिन्होंने प्रो. जावेद की कब्र खोदने की कोशिश की थी।
जब वह पुलिस कमिश्नर के पास गए तो उसने बताया कि कुछ लोग तो पहले ही गिरफ्तार किए जा चुके हैं। बाकी कर लिए जाएंगे।
इतने में लोगों में भगदड़ मच गई।
किसी ने कोई झूठी अफवाह उड़ा दी थी। भागादौड़ी के कारण कई लोग नीचे गिरकर कुचले गए व कई जख्मी हो गए।
आखिर मोहतबर लोग सामने आये और दोनों तरफ के लोगों को समझा बुझाकर बात खत्म की।
शहर में अमन तो हो गया। पर फातिमा बिस्तर से उठ न पाई। उसको इस सदमे की वजह से अधरंग हो गया।
ये बातें सोचते हुए उसकी आंखें भर आईं।
शगूफा स्कूल से आ गई थी। फातिमा ने खाना गर्म किया। शगूफा को खिलाया। अख्तर को पूछा। वह चुप रहा। उसने खुद नहीं खाया और जाकर फिर वहीं बैठ गई।

शगूफा को आराम करने को कह वह फिर उन्हीं यादों में डूब गई।
कैसे तंगी के दिन थे। धीरे-धीरे जावेद की सारी जमा पूंजी खर्च होती गई। कुछ फातिमा के इलाज पर लग गई और कुछ घर पर। फातिमा ठीक होने लगी और धीरे-धीरे चलने के काबिल भी हो गई।
इस सारे समय में लोगों का आना-जाना तकरीबन बन्द सा हो गया था। बल्कि लोग आंखें चुरा कर निकल जाते। अग्रवाल जी भी दिल्ली चले गए थे।
और वह अकेले रह गए थे। बिलकुल अकेले। अख्तर ने कॉलेज जाने के बजाय नौकरी करने की बात की तो फातिमा को बड़ा बुरा लगा।
और आखिर फातिमा को परदा उतारना ही पड़ा।
उसने फैसला किया कि वह बुरके की गुलामी उतार फैंकेगी।
अब वह बाहर अंदर बगैर बुरके के आने जाने लगी। यूनिवर्सिटी में उसको नौकरी मिल सकती थी। पर थोड़ी पढ़ी लिखी होने के कारण वह छोटी नौकरी करना नहीं चाहती थी। प्रो. जावेद की बीवी होने का उसको मान भी था और गर्व भी। उसने अख्तर को बताए बगैर आधे दिन की नौकरी कर ली और आज पहला दिन था जब वह नौकरी पर गई थी।
वापिस लौटी तो अख्तर गुस्से में भरा बैठा था।
वह इस बात से डरी हुई थी कि अख्तर उसकी नौकरी का बुरा न मान जाये। उधर अख्तर करवटें लेता कभी उदास हो जाता तो कभी गुस्से से लाल। उसके मन में बार-बार आ रहा था कि वह अपनी हॉकी उठाए और दो-चार को हॉकी से ढेर कर दे।

पर फिर अपने आपको निहत्था समझ उदास हो जाता। आखिर फातिमा ने हिम्मत करके उसे पूछ ही लिया “क्या बात है?”
वह कुछ ना बोला बल्कि एक कागज का टुकड़ा उसको पकड़ा कर अपनी हॉकी उठा, गुस्से में बाहर दालान में उगी घास को गेंद की भांति मारने लग पड़ा। फातिमा ने जब पढ़ा तो वह कागज यूनिवर्सिटी की तरफ से घर खाली करने का नोटिस था।
इससे पहले कि फातिमा अख्तर को कुछ कहती वह गुस्से में पूरी घास नष्ट कर चुका था।
