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महानगर | Mahanagar novel S Balwant | best novel in hindi | Grehlakhami
Mahanagar

उस दिन सुबह आते ही कालीचरण ने दफ्तर का दरवाजा खोलकर माथा टेका और बाद में वह अपने कैबिन में बने रब्ब के सामने भी झुका।

कालीचरण ने पूजा के स्थान पर में सभी धर्मों के अवतारों को शामिल किया हुआ था। उसका सभी धर्मों पर विश्वास था।

वह कहता “भगवान तो एक है बस हमारी देखने की नजर में फर्क है।”

वैसे भी उसको अपने अतीत के बारे में अपनी मां के अलावा कुछ भी पता नहीं था।

कालीचरण की मां बानो की बड़ी इच्छा थी कि उसका बेटा तवायफों के कोठों से दूर चला जाये। बल्कि वह तो यहां तक चाहती थी कि कोठे बन्द होने चाहिए और तवायफों के बच्चों को पढ़ा लिखा कर सही कामों पर लगाना चाहिए।

वह अपने इलाके की मशहूर तवायफ थी। पूरे रोड पर वह आकर्षण का केन्द्र थी। उसके मजरे के लिए पता नहीं कहां-कहां से लोग आते थे। वह अपने हुस्न और मिजाज के साथ उनको यूं फिदा करती जैसे शेर को आदमी का मांस खाने की आदत पड़ जाए और फिर वह बस उसके कोठे के चक्कर काटता रहे।

तब कालीचरण का अधिक समय वहीं बीतता था। तीखी से तीखी ६ पार का आदमी वह देख चुका था। बानो ने कालीचरण को स्कूल में डाला और होस्टल में ही रहने का इंतजाम करवा दिया।

पर कालीचरण छुट्टी के वक्त या जब भी दिल करता उस रोड पर आ जाता। उसका पढ़ने को दिल भी न करता। पर मां की डांट खा-खा कर मुश्किल से मैट्रिक तो पास कर ही गया और एक छोटी सी नौकरी भी कर ली। पर हर वक्त इधर-उधर की तरकीबें सोचता रहता।

जल्दी ही उसे प्लेसमैंट सर्विस का काम समझ में आ गया। उसने अपनी मां की मदद से एक जगह ले ली और काम शुरू कर दिया।

वह समाचार पत्रों में विज्ञापन देता। तरह तरह की नौकरियों के लिए लोग उसके पास आते।

अपनी गद्दी पर बैठते कालीचरण ने रीटा को बुलाकर सारे काम की रिपोर्ट मांगी। रीटा ने बताया “कल ग्यारह कैंडिडेट “एडजस्ट” हो गये थे। तीन डबल परपज और आठ सिंगल जो छ: लोग पिछले महीने लगवाये थे उनमें से पांच की वसूली हो गई है। एक कंपनी के पैसे अभी भी रहते हैं। वह नखरे कर रहे हैं। रीटा ने यह भी बताया कि “आज कुछ नये कैंडिडेट आए हैं। इंटरव्यू करके भेजती हूं।”

कालीचरण यह सब सुनता रहा।

एक खुशखबरी यह भी है कि कल शाम फैक्स आया कि दुबई की एक मशहूर कंपनी ने मैनपावर की सप्लाई के लिए हमारा नाम मंजूर कर लिया है। उन्होंने फैक्स में लिखा है दो सौ आदमी चाहिए। ड्राइवर से लेकर स्टैनो टाइपिस्ट तक। वह सब आदमी हमसे लेंगे।” यह सुन कालीचरण खुशी से झूम उठा। उसको लगा रीटा की मेहनत व लगन से यह कंपनी खूब आगे बढ़ेगी। बाहर कुछ कैंडिडेट आए हुए थे।

रीटा उठकर बाहर गई।

कालीचरण टेलीफोन खड़काने लगा। रीटा ने धीरे-धीरे कैंडिडेट बुलाने शुरू किए।

सबकी एप्लीकेशन्ज पढ़ती। उनके काम करने की ख्वाहिश, कम से कम वेतन तथा और ब्यौरे के बारे में पूछती।

सबसे पहली कैंडिडेट सुमन थी। वह बी. ए. पास थी। कोई तजुरबा नहीं था। पर शार्टहैंड जानती थी।

“नौकरी क्यों करनी है।” रीटा ने पूछा।

“जरूरत है।” सुमन ने कहा।

“कोई तजुरबा भी है।

“तजुरबा तो नौकरी मिलने पर होगा, आप कहीं नौकरी दिलवाओ तो सही।… एम्लॉयमैंट एक्सचेंज में भी नाम लिखवाया हुआ है।… पर नम्बर ही नहीं आता… ”

“मुझे पता है आजकल नौकरी मिलनी कितनी कठिन है और एम्पलायमैंट एक्सचेंज में से लोग धक्के खा-खाकर तो हमारे पास आते हैं।… और क्या-क्या कर सकती हो?”

“जो भी काम हो।”

“अच्छी नौकरी लेनी है तो मर्दों को खुश भी करना पड़ता है। कर सकोगी?… रीटा ने सुमन के साथ सीधी बात की।

सुमन सहम गई।

उसने यह सुन तो रखा था। पर आज यह बात उसे बड़ी नयी और अजीब सी लगी।

पर घर में कितनी देर ये बातें सुनती रहेगी कि “निखट्टु पैदा हुई है।… ब्याह भी तो नौकरी वाली का जल्दी होता है…। पर वह इस उलझन से न निकल सकी।

“इसके बारे मैं कल बताऊंगी।” कांपते हुए सुमन बस इतना ही कह पाई और उठ कर चली गई।

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रीटा बाकी लोगों का इन्टरव्यू करती रही। उसने सबसे रजिस्ट्रेशन फीस ली और उनका नाम रजिस्टर्ड कर लिए।

और सबको जल्दी नौकरी दिलवाने का वायदा करती रही।

आज के लोगों में से दो लड़कियां “सभी काम” करने के लिए हां कर रही थीं।

रीटा के पास ऐसी नौकरी तो हर वक्त रहती। उसने उसी वक्त फोन लगाया और शर्मा जी को बताया। शर्मा जी ने फौरन कैंडिडेट भेजने के लिए कहा। विनोद के साथ दोनों कैंडिडेटों को भेज दिया गया।

विनोद जल्दी ही एग्रीमेंट कर शर्मा जी से दोनों की एक महीने की तनख्वाह का चैक एडवांस में ही ले आया।

और वह दोनों “काम” पर लग गईं।

इस तरह कालीचरण का यह प्लेसमैंट चल रहा था।

शाम हुई तो सब लोग अपने-अपने घरों को चल दिए।

कालीचरण ने भी अपना दफ्तर बंद किया और क्लब चला गया।

इस क्लब की मैम्बरशिप बड़ी मुश्किल से मिलती थी। पर कालीचरण की निजी पहुंच के कारण उसको स्पैशल कैटीगरी में मैम्बरशिप मिल गई कि वह सोशल वर्कर है।

कुछ ही समय में वह क्लब में इतना प्रसिद्ध हो गया कि सारे बिजनेसमैन अपनी अपनी कंपनी की मैनपावर रिक्वायरमेंट उससे लेने के लिये तैयार होने शुरू हो गये।। कालीचरण के पास से एक से एक खूबसूरत लड़कियां कैंडिडेट के रूप में होती। रीटा पहले ही ऐसी लड़कियों को छांट लेती जो डबल परपज होती। लिस्ट में उनका नाम टॉप पर होता और दूसरों का नीचे। उसके पास हर प्रकार का कैंडिडेट मिलता था।

रात जब वह घर जाता तो पूरी तरह थक चुका होता। घर में नौकर उसका खाना बना देता। कभी वह खा लेता ओर कभी बाहर से खा आता।

एक दिन उसने फैसला किया कि वह अपनी मां को भी अपने पास ले आएगा और वह ले भी आया। तवायफों वाले रोड के लोगों से निपटना उसके लिये कुछ मुश्किल न था। वैसे उसकी मां का सब आदर करते थे।

वे मां बेटा दोनों इकट्ठे रहने लगे।

प्लेसमैंट सर्विस चलती रही। सुमन जैसी लड़कियां आतीं। पहले तो हिचकिचातीं फिर लौट आतीं। वह उनको मुनासिब काम पर लगवा देता।

कालीचरण की एक खूबी यह भी थी कि उसने खुद कभी किसी लड़की को हाथ नहीं लगाया था।

इस तरह वह यह सफर तय करता रहा। उसकी मां भी खस थी क्योंकि उसका रोड का धंधा छूट गया। बेटा अब बड़े-बड़े लोगों में उठता बैठता। अच्छा कारोबार चल रहा था। खूब पैसा था उसके पास!

और अचानक एक दिन कालीचरण का एक्सीडेंट हो गया। जल्दी से उसको अस्पताल पहुंचाया गया। चोटें काफी लगीं पर वह बच गया।

उसकी मां परेशान। सारा-सारा दिन उसके पास बैठी रहती।

अभी अस्पताल में कई दिन और लगने थे।

बानो ने सोचा क्यों न वह कालीचरण के दफ्तर का हाल भी देख ले?… वैसे वहां रीटा तो थी ही पर फिर भी उसने सोचा एक बार खुद जाना चाहिए।

जब वह कालीचरण के दफ्तर गई तो उसका पता चला कि कालीचरण केवल तवायफों के रोड का नहीं बल्कि पूरे समाज के मजबूर लोगों के लिए भड़ुए का काम कर रहा था। वह मजबूर और जरूरतमंद औरतों के शरीर की दलाली करता था। नौकरी के लालच में उनके शरीर को प्लेट में डाल कर पेश करता था और जरूरतमंद लड़कियां आंखें भींचकर सब कुछ मान लेती थीं और सोचती जैसे अंधेरे में और को कुछ भी न दिखता हो …फर्क इतना था कि रोड के भड़ुए लड़कियाँ बेच कर मुंह छुपाते फिरते हैं पर कालीचरण का समाज के मोहतबर लोगों के साथ उठना बैठना था।

मां गुस्से से भर गई।

उसको अपने आप पर भी हैरानी हुई। उसने पहले क्यों न पता किया?

इससे पहले कि वह गुस्से में रीटा को कुछ कहती दफ्तर से बाहर निकल अस्पताल की ओर चल पड़ी।

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