papi devta by Ranu shran Hindi Novel | Grehlakshmi

‘‘वह हत्या मैंने ही की थी इंस्पेक्टर साहब।’’ हत्यारे ने कहा, ‘‘और मुझे अच्छी तरह याद है कि उस हत्या पर जगदीश नामक एक निर्दोष व्यक्ति को मृत्युदण्ड भी दे दिया गया था।’’

पापी देवता नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- भाग-1

इंस्पेक्टर जोशी सन्न रह गया। सुधा का मुखड़ा उसकी आंखों के सामने घूम गया। विवाह के जोड़े में उसका वह दमकता हुआ मुखड़ा उसकी मनहूस बात सुनकर कितनी जल्दी अपनी रंगत खो बैठा था। बड़ी-बड़ी आंखों की लम्बी-लम्बी पलकों से निकलता हुआ आंसुओं का सोता-सिसकियां-हिचकियां-दर्द भरी चीख और उसकी वह तड़पती आवाज, ‘नहीं-नहीं- नहीं, ऐसा नहीं हो सकता-ऐसा कभी नहीं हो सकता। यह झूठ है। वह कभी किसी की हत्या नहीं कर सकते।’ सुधा को अपने पति पर कितना विश्वास था-कितना अधिक ! उसके दिल की बात कितनी सच थी।

इंस्पेक्टर जोशी के कान फटने लगे। सुधा की चीख अब और तेज होकर उसके कानों में गूंज रही थी। उसकी आंखों के सामने वह दृश्य भी आकर स्थिर हो गया जब अदालत में न्यायाधीश के आने से पहले फैसले के दिन उसने सुधा को देखा था। तब सुधा की आंखों में उसके प्रति घृणा की कितनी भयानक आग थी। ऐसा लगता था मानो अदालत में ही उसे अपनी दृष्टि द्वारा जलाकर राख कर देना चाहती थी। अपने पति के लिए मृत्यु-दण्ड सुनकर तो वह अपना दुख सहन ही नहीं कर सकी थी। गश खाकर वहीं धम्म से गिर पड़ी थी।

सुधा की स्थिति याद करके इस समय इंस्पेक्टर जोशी को भी चक्कर आने लगा। उसने क्या कर दिया ? एक निर्दोष को मृत्यु के घाट उतार दिया ! ऐसी नारी की मांग का सिन्दूर मिटा दिया जिसके हाथों की मेंहदी भी अभी नहीं छूटी थी। यह…सब कैसे गया ? कैसे ? इतनी बड़ी भूल ? उसने सख्ती से अपने होंठ भींचे और हत्यारे पर क्रोध से पागल होकर कोड़े बरसाने लगा, इस प्रकार मानो अपनी भूल का सारा क्रोध उसी पर उतार रहा हो। इंस्पेक्टर जोशी उसे मारता ही गया-मारता ही गया, इतना अधिक कि समीप खड़े सिपाही तथा इंस्पेक्टर्स भी उसे आश्चर्य के साथ देखने लगे। इंस्पेक्टर जोशी ने किसी अपराधी के साथ पहली बार ऐसा व्यवहार किया था।

‘‘बताओ।’’ इंस्पेक्टर जोशी ने कोड़ा मारते हुए क्रोध से पूछा। क्रोध के कारण उसकी आंखों में रक्त झलक आया था। उसने कहा, ‘‘बताओ, वह हत्या तुमने क्यों की थी ? क्यों ?’’

‘‘बताता हूं…बताता हूं सरकार…’’ हत्यारे ने एक घायल पशु के समान तड़पकर कहा, ‘‘उस हत्या को करने के लिए मुझे…दस हजार रुपये दिए गए थे।’’

‘‘किसने दस हजार रुपये दिए थे ?’’ इंस्पेक्टर जोशी ने गरजकर उस पर एक कोड़ा और मारा।

‘‘सेठ की चचेरी बहन के लड़के मनोहर ने।’’

‘‘क्यों ?’’ इंस्पेक्टर आनन्द ने एक पल सोचकर दांत पीसा।

‘‘सेठ गोविन्द प्रसाद की एक चचेरी बहन के अतिरिक्त संसार में कोई नहीं था। इस बहन के पास एक सन्तान है-मनोहर। मनोहर के नाम वह अपनी सारी सम्पत्ति पहले ही कर चुके थे। मनोहर एक अय्याश और आवारा व्यक्ति है। सेठजी की सम्पत्ति प्राप्त करने के विश्वास में वह उनकी मृत्यु की प्रतीक्षा बहुत बेसब्री से साथ कर रहा था। इसी विश्वास पर उसने महाजनों से अगणित रुपया उधार ले रखा था। लेकिन एक दिन सेठजी को एक महाजन द्वारा बातों ही बातों में मनोहर के चरित्र का ज्ञान हो गया। यह भी ज्ञात हो गया कि वह उनकी मृत्यु की प्रतीक्षा बहुत बेसब्री के साथ कर रहा है तो उन्होंने अपनी ढलती आयु में ही विवाह करने का इरादा कर लिया ताकि उनकी मेहनत से जुटाई गई सम्पत्ति का दुरुपयोग न हो।

इस बात का ज्ञान मनोहर को उसी दिन उस महाजन से हो गया जिसने बातों ही बातों में सेठजी के सामने मनोहर के चरित्र के बारे में कह दिया था। मनोहर से वह कहने गया था कि अब सेठजी दूसरा विवाह करने की सोच रहे हैं इसलिए उसके रुपये लौटाने का प्रबन्ध तुरन्त कर दे वरना कानूनी कार्यवाही करेगा। मनोहर यह सुनकर पागल हो उठा। उसने तुरन्त बुड्ढे को रास्ते से हटा देने का इरादा कर लिया। इसके लिए उसने उसी दिन मुझसे सौदा किया-पूरे दस हजार रुपये का। फिर दूसरी सुबह मुझे साथ लेकर सेठजी के दफ्तर के सामने सड़क पर एक किनारे खड़ा हो गया ताकि मैं उन्हें पहचान लूं। मनोहर को ज्ञात था कि सेठजी दफ्तर खुलने के आधा घंटा बाद ही आते हैं-अर्थात् साढ़े दस बजे सेठजी अपने निश्चित समय पर आए। कार से नीचे उतरे तो कार चली गई। सेठजी अपने दफ्तर की ओर बढ़े कि तभी उनकी दृष्टि मनोहर पर पड़ गई। तब मनोहर मुझे उनको अच्छी तरह पहचान लेने का इशारा कर रहा था। सेठजी की नजर पड़ते ही मनोहर घबरा गया। फिर घबराकर नमस्ते करता हुआ वह उनके पास चला गया। मुखड़े पर कृत्रिम मुस्कान लाकर उसने उन्हें बताया कि वह इधर से अपने मित्र के साथ जा रहा था कि उनकी कार देखकर रुक गया।

‘अच्छा !’ सेठजी ने गर्दन हिलाकर कहा और चलते-चलते मुझे देखा-बहुत भेद भरी दृष्टि से। जब वह दफ्तर चले गये तो पल भर बाद मनोहर के बताये हुए इशारे पर मैं भी उनके दफ्तर पहुंचा। दरवाजे पर परदा था इसलिए मैंने झांककर देखा-सेठजी अपने कमरे में पहुंचकर खिड़की के समीप खड़े नीचे सड़क की ओर देख रहे हैं। शायद उन्हें हम पर संदेह हो गया था और इसीलिए वह हमें ही तलाश कर रहे थे। उनकी पीठ दरवाजे की ओर थी इसलिए अवसर से लाभ उठाकर मैं अन्दर पहुंचा और एक परदे की आड़ में खड़ा हो गया।

सेठजी अपनी कुर्सी पर आकर बैठ गए। बैठते ही उन्होंने पुलिस को फोन किया-शायद वह फोन आप ही को किया था।’’ हत्यारे ने अपने बयान में अनुमान लगाया और बात जारी रखी, ‘‘उसके बाद एक जगह और फोन मिलाकर पूछा, ‘‘एडवोकेट साहब हैं ?’’ शायद वह अपना वसीयतनामा भी बदलना चाहते थे। परन्तु उधर से बात न हो सकी तो फोन रख दिया। फिर घंटी बजाई। कुछेक क्लर्क आदि आए और अपनी फाइलों पर हस्ताक्षर लेकर चले गये। फिर वह अकेले एक कागजात पढ़ने लगे कि तभी मुझे अवसर मिला गया और मैंने दबे पगों आगे बढ़कर एक हाथ से उनका मुंह दाबा और दूसरे हाथ से अपनी छुरी उनकी पीठ में धंसा दी। मैं छुरी बाहर खींचने ही वाला था कि तभी अचानक मुझे अपनी ओर बढ़ती एक आहट मिली। चूंकि वह मेरे हाथों की गई जीवन की पहली हत्या थी इसलिए मैं घबरा गया। छुरी मैंने वहीं छोड़ दी और तुरन्त लपककर एक परदे की आड़ में छिप गया।

तभी कमरे में उनका एक कर्मचारी प्रविष्ट हुआ सेठजी की अवस्था देखकर वह घबरा गया। सेठजी की जान अटकी हुई थी। उन्हें बचाने के लिए उसने बिना कुछ सोचे-समझे तुरंत उनकी पीठ से छुरी बाहर खींच ली। परन्तु तब तक आप अचानक कमरे में प्रविष्ट हो चुके थे। उसके बाद वहां क्या हुआ आप स्वयं जानते हैं। जब कमरा दफ्तर के बाबुओं तथा ग्राहकों से भर गया तो मुझे वहां से बच निकलने में आसानी हो गई। मैं सीधा मनोहर से मिला उसने तुरन्त मेरा हिसाब चुकाया। फिर दस हजार रुपये और देने का वायदा करके उसने मुझे उस महाजन की हत्या कर देने को भी कहा जो सेठजी के इरादे से परिचित था। ऐसा न हो कि सेठजी की हत्या के बारे में सुनकर वह पुलिस के सामने अपना सन्देह प्रकट कर दे। रुपये की इतनी बड़ी राशि प्राप्त करके मेरा लालच बढ़ गया था। मैंने उसी रात उस महाजन की भी हत्या कर दी। एक दिन में दो हत्याएं करके मैंने अपना पेशा आरम्भ किया था और अब एक समय में दो हत्याएं एक साथ करके मैं…’’

परन्तु इंस्पेक्टर जोशी उसकी बात नहीं सुन सका। क्रोध के कारण उसका चेहरा लाल होकर तमतमा रहा था। इस समय वह स्वयं को एक हत्या का जिम्मेदार समझ रहा था। वह हत्यारा है-हत्यारा-जिसके कारण एक अच्छा-भला घर बरबाद हो गया, एक मांग सूनी हो गई, एक जीवन बेमतलब मृत्यु का ग्रास बन गया। सुधा की तड़पती चीख फिर उसके कानों में गूंजने लगी तो उसने अपराधी को दोबारा बुरी तरह मारना आरम्भ कर दिया-मारता ही गया-इस प्रकार मानो उसे जान से मारकर ही दम लेगा।

हत्यारा घायल होकर गिर पड़ा और तड़प-तड़पकर चीखने लगा। तभी बीच में एक-दूसरे इंस्पेक्टर ने हस्तक्षेप किया। वह बोला, ‘‘बस करो इंस्पेक्टर जोशी, अधिक मारने से यदि यह मर गया तो हम अपने अधूरे मामलों की जांच भी नहीं कर सकेंगे। साथ ही पुलिस विभाग की बहुत बदनामी होगी।’’

इंस्पेक्टर जोशी ने फूलती हुई सांसों के साथ क्रोध में कोड़ा फेंक दिया। फिर दांत पीसता हुआ मुट्ठी बांधकर मानो स्वयं से ही बोला, ‘‘मनोहर का बच्चा ! कम्बख्त आज भी अपनी चालाकी के कारण गोविन्द प्रसाद एण्ड कम्पनी का मालिक बना बैठा है। परन्तु मैं उसे हर्गिज नहीं छोड़ूंगा-हर्गिज नहीं। उसके कारण आज मेरे सर एक निर्दोष का खून मढ़ गया है।’’ इंस्पेक्टर जोशी उसी प्रकार दांत पीसता हुआ कमरे के बाहर निकल गया।

उसी दिन इंस्पेक्टर जोशी ने सेठ गोविन्द प्रसाद की हत्या की पुरानी फाइल निकाली और फिर विस्तार में एक रिपोर्ट तैयार की। रिपोर्ट में उसके दिल की भड़ास झलकती थी। परन्तु उसे इसकी चिन्ता जरा भी नहीं थी। उस व्यक्ति को वह कड़ी से कड़ी सजा दिलाने के लिए अधीर था जिसके कारण उसने इतनी बड़ी भूल की थी-जीवन की सबसे बड़ी भूल, जिसका अब कोई सुधार नहीं था। उसकी भूल के कारण एक नारी का जीवन नर्क बन गया था। पूरी रिपोर्ट तैयार करने के बाद उसने अपने अधिकारी को भेज दी ताकि शीघ्र से शीघ्र कानूनी कार्यवाही की जा सके।

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