सुधा ने वह घर सदा के लिए छोड़ दिया जो उसका स्वर्ग था-और वह शहर भी जो उसके लिए तीर्थ स्थान था। अपने बच्चे को छाती से लगाए वह अपनी मां तथा बाबा के साथ लखनऊ का अस्पताल छोड़ने के बाद सीधे मेरठ चली आई। आने से पहले एक बार वह अवश्य अपने ससुराल वालों से मिलना चाहती थी-उस ड्योढ़ी पर अपना मस्तक टेकना चाहती थी जहां उसका मन्दिर था, परन्तु फिर डरकर उसका दिल कांप उठा था।
पापी देवता नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- भाग-1
ससुराल वालों ने यदि उसके दिल का टुकड़ा छीन लिया, तब क्या होगा ? बच्चे को जब तक देखा नहीं तब तक तो ठीक था। देख लेने के बाद प्यार का छलक आना कोई बड़ी बात नहीं। इसीलिए वह किसी से मिले बिना ही मेरठ चली आई थी। उसे ज्ञात था कि वह उनके लिए मर चुकी है। जिस नागिन ने उनके घर में पग रखते ही एक जवान बेटे को डस लिया हो उसे वह क्यों क्षमा करेंगे ? काश कोई उसके दिल के अन्दर भी झांककर देखता-तब पता चल जाता कि उसका घाव तो नासूर है-पीप बह रहा है दिल में।
मेरठ आकर सुधा ने परिस्थितियों से समझौता कर लेना चाहा परन्तु सफल नहीं हो सकी। सफल होती भी कैसे ? घाव इतनी आसानी से नहीं भरने वाला था। उसके दिल को इतना बड़ा सदमा पहुंचा था कि कभी-कभी अकेले में चुपचाप बैठे-बैठे वह अचानक ही फूट-फूटकर रो पड़ती थी। फिर रोते-रोते उसे घण्टों बीत जाते। आंसू रुकने का नाम ही नहीं लेते। सिसकियों तथा हिचकियों से उसका पूरा शरीर कांप उठता था। वह अपने बच्चे को छाती से लगा लेती, परन्तु मन जरा भी हल्का नहीं होता। रोते-रोते उसका गला भारी हो जाता, आंखें सूज आतीं। तब उसकी अवस्था मां तथा बाबा से देखी नहीं जाती। मां उसे छाती से लगाकर स्वयं भी रो पड़ती। बाबा उसके सिर पर हाथ फेरने लगते-उसे तसल्ली देते-समझाते।
धीरे-धीरे उसकी मां तथा बाबा को विश्वास हो गया कि उसके पति ने अवश्य हत्या की थी। अपराधी कोई भी हो, मृत्युदण्ड देने में अदालत भूल नहीं कर सकती। आखिर पुलिस इंस्पेक्टर को उसके पति से कोई बैर तो था नहीं। इस बात का सहारा लेकर उन्होंने कई बार चाहा कि सुधा का घर बसा दें। उनके जीवन के अब दिन ही कितने हैं ? यदि उन दोनों को कुछ हो गया तो सुधा का जीवन पहाड़ बन जायेगा। एक असहाय अबला के लिए भरी जवानी में सम्मान के साथ जीवन बिताना आसान नहीं होता।
सुधा के बाबा ने जिस महाजन के हाथ अपना मकान गिरवी रखकर विवाह के लिए रुपये लिए थे वह तो सुधा को देखते ही उस पर दीवाना हो गया था। कम्बख्त की आयु पचपन वर्ष से कम नहीं, पत्नी को चिता पर फूंक आया है, तीन-तीन लड़कियों के हाथ पीले कर चुका है, फिर भी सुधा का हाथ मांगने से नहीं चूका था। इस मकान को गिरवी रखने की एक शर्त थी ? यदि पांच वर्ष के अन्दर सूद समेत सारे रुपये नहीं अदा किए गए तो महाजन को मकान नीलाम कराकर अपने रुपये वसूल करने का पूरा अधिकार होगा। परन्तु सुधा सारी परिस्थितियों से परिचित होकर भी दूसरा विवाह करने को तैयार नहीं हुई। वरन् एक बार रोते-रोते उसने साफ कह दिया कि किसी ने अब और उससे दूसरे विवाह की बात छेड़ी तो वह घर छोड़कर सदा के लिए चली जायेगी। यदि बच्चे का पालन-पोषण नहीं कर सकी तो बच्चे सहित आत्महत्या कर लेगी। उसे अपने पति के निर्दोष होने पर कोई सन्देह नहीं था। उसका दिल कहता था कि उसे गलत दण्ड मिला है। यह केवल उसका अपना दुर्भाग्य था जो उसका पति बेमौत मारा गया। अपने इसी दुर्भाग्य को लेकर पति की याद में वह दिन-रात आठ-आठ आंसू बहाने पर विवश थी। इसका परिणाम यह हुआ कि धीरे-धीरे उसकी आंखों की ज्योति कम होने लगी और एक दिन जब उसे इस बात का पूरा अहसास हुआ तो उसने अपने टूटे दिल पर पत्थर रख लेना चाहा। उसे आंखों की आवश्यकता थी-सख्त आवश्यकता-ताकि अपने जिगर के टुकड़े को अपनी पलकों की छांव तले फलता-फूलता देख सके। अंधी रहकर तो वह अपने बच्चे के उज्ज्वल भविष्य के लिए कुछ भी नहीं कर सकती थी।
उसने सब्र कर लिया-सब्र करने में काफी सीमा तक वह सफल भी हुई। परन्तु जब रात का अंधकार गम का लबादा ओढ़े समीप आता, जब वातावरण की खामोशी में वह अपने बच्चे को छाती से लगाए पलंग पर लेटकर आंखें बंद कर लेना चाहती तो उसके कानों में कदमों की एक जानी-पहचानी चाप बहुत हल्के-हल्के सुनाई पड़ने लगती। ऐसा लगता मानो उसके पति की आत्मा यहीं-कहीं मंडरा रही है। यह उसके दिल का भ्रम था या वास्तविकता, वह नहीं जान सकी और न ही जानना भी चाहती थी। परन्तु उसकी समीपता महसूस करके वह उठकर अवश्य बैठ जाती थी। फिर आंखें फाड़-फाड़कर वह इधर-उधर देखने लगती। और जब कुछ भी नहीं दिखाई देता तो लेटकर वह अपने बच्चे को छाती में समा लेती और फूट-फूटकर रोने लगती। फिर बहुत देर तक वह चुपके-चुपके आंसू बहाती रहती। विवाह के कुछ दिनों के अन्दर ही उसका पति उसके दिल और दिमाग पर किस प्रकार छा गया था, यह आज उसके आंसुओं को देखकर मालूम होता था। उसके आंसुओं के साथ उसकी आंखों की ज्योति कम हो रही थी-और भी कम होने लगी। और एक दिन जब उसकी आंखों के सामने हर वस्तु धुंधलाने लगी तो विवश होकर उसने चश्मे का उपयोग करना आरम्भ कर दिया। अपने बच्चे को वह एक पल भी अपनी दृष्टि से ओझल होने नहीं देना चाहती थी।
दो वर्ष बीतने को आए। इन दो वर्षों में इंस्पेक्टर जोशी-आनन्द जोशी-अपनी हर घटना समान उस घटना को भी भूल गया जिसने सुधा नाम की एक स्त्री को विधवा बना दिया था। ऐसी घटनाओं से दो चार होना तो उसका पेशा था। किस-किसको याद रखता ? इन दो वर्षों में कितने ही पुलिस इंस्पेक्टरों को एक जगह से दूसरी जगह तबादला हो गया, परन्तु उसका अपना पुराना ही हलका था। इन दो वर्षों के अन्दर लखनऊ जिले का अधिकार एक नए डी.आई.जी. को मिला जिनका तबादला कानपुर से हुआ था। एक ही विभाग में एक ही पद पर काम करने के कारण यह डी.आई.जी. उसके स्वर्गवासी पिता के गहरे मित्र भी रह चुके थे। उसके पिता की मेहनत, ईमानदारी तथा बहादुरी सारे विभाग में प्रख्यात थी। लखनऊ आने पर जब डी.आई.जी. साहब ने यह गुण इंस्पेक्टर आनन्द जोशी में पाया तो उन्हें हार्दिक प्रसन्नता मिली। उन्होंने उसे बधाई दी।
इंस्पेक्टर जोशी को वह आरम्भ से ही अपने बेटे समान चाहते आए थे। इंस्पेक्टर जोशी भी उन्हें अपने पिता के जीवन काल में ‘अंकल’ कहकर सम्बोधित करता था। परन्तु अब उनसे उनकी भेंट पांच वर्ष बाद हुई थी और एक ही विभाग में उनसे छोटे पद पर काम करने के कारण वह उन्हें ‘सर’ करने पर विवश था। फिर भी डी.आई.जी., साहब जानते थे कि इंस्पेक्टर जोशी का उज्ज्वल भविष्य सुरक्षित है। अपनी मेहनत, लगन, ईमानदारी तथा बहादुरी के कारण वह उनसे भी बड़ा अधिकारी बनकर विभाग का गौरव बन सकता है। विभागीय परीक्षाएं योग्यतानुसार सभी उम्मीदवारों को अवसर देती हैं। परीक्षाएं हुईं, इंस्पेक्टर जोशी परीक्षा में बैठ गया। परिणाम निकलने में अभी देर थी। परन्तु उन्हीं दिनों डी.आई.जी. साहब की सुपुत्री किरण भी कानपुर से अपनी शिक्षा समाप्त करके लखनऊ चली आई तो उन्हें अपने आप ही इंस्पेक्टर जोशी का विचार आ गया, जिस समय कानपुर से उनका तबादला लखनऊ हुआ था उस समय किरण एक कालेज में पढ़ रही थी। उसे अपने साथ लाते तो उसकी पढ़ाई अधूरी रह जाती। यही कारण था कि पत्नी के साथ लखनऊ आने से पहले उन्होंने अपनी बेटी के रहने का सारा प्रबन्ध कानपुर में कर दिया था। किरण की शिक्षा समाप्त होने के बाद हर माता-पिता के समान उसकी पत्नी तथा उन्हें भी अपनी बेटी के हाथ पीले कर देने की चिन्ता सताने लगी थी। परन्तु जब उनके मस्तिष्क में इंस्पेक्टर जोशी का विचार आया तो मन को सन्तोष ही नहीं प्रसन्नता मिल गई। उनकी एकमात्र बेटी के लिए उनकी दृष्टि में इंस्पेक्टर जोशी बहुत ही उपयुक्त वर लगा। जब यह बात उन्होंने अपनी धर्मपत्नी को बताई तो वह तुरन्त सहमत हो गईं। इंस्पेक्टर जोशी उनके बंगले में कभी-कभी उपस्थिति देना आवश्यक समझता था। वह अब भी उसे इंस्पेक्टर जोशी के बजाय आनन्द के नाम से ही सम्बोधित करती थीं। उन्हें उससे उसके पिता के जीवन-काल से ही सहानुभूति थी क्योंकि वह आरम्भ से ही बिन मां की सन्तान था। पांच वर्ष पहले जब आनन्द से मिली थीं तो आनन्द अपनी शिक्षा के अन्तिम वर्ष में था और किरण केवल तेरह वर्ष की थी। अब किरण वास्तव में विवाह योग्य हो चुकी थी।
किरण से जब इंस्पेक्टर जोशी की भेंट हुई तो उसे देखकर वह सख्त आश्चर्य में पड़ गया। पांच वर्ष पहले ‘स्कर्ट-ब्लाउज’ पहनकर स्कूल जाने वाली यह छोकरी इतना अधिक खिल उठी थी कि वह उसे देखता ही रह गया। वह अब बचपन की लजाई कली नहीं थी-बहारों का खिला हुआ फूल थी। बचपन के समान वह कम बातें करने वाली भी नहीं थी बल्कि दिल की साफ और खुलकर बातें करने वाली थी। पहली ही भेंट में वह उससे पूरी तरह घुल-मिल गई और जब मुलाकातें बढ़ीं तो उसने ज्ञात किया कि किरण ‘माडर्न’ ही नहीं ‘अल्टा माडर्न’ भी है-फैशन की दीवानी। वह सुन्दर थी और इसीलिए जो भी फैशन करती उस पर उसकी सुन्दरता और खिल उठती थी। तंग कपड़े पहनती थी तो इस तरह कि उसके कसे हुए शरीर का अंग-अंग निखर आता-ढीले कपड़े पहनती तो इतने ढीले कि छितरी हुई किनारी में उसका सुन्दर मुखड़ा एक अकेले फूल के समान खिलने लगता।
जब मुलाकातें बढ़ीं तो किरण उसे अपना दिल भी हार बैठी। फिर धीरे-धीरे उसे दिल और जान से भी प्यार करने लगी। कोई भी लड़की होती तो ऐसा ही कर बैठती। इंस्पेक्टर जोशी एक सुन्दर व्यक्तित्व का मालिक था-तबियत का संजीदा। उसका रंग गोरा था और कद लम्बा, इसलिए इंस्पेक्टर की वर्दी में वह खूब खिलता था। यह सारी बातें स्वतन्त्र विचार, खुश मिजाज और नित नये फैशन करने वाली किरण की पसन्द के बिल्कुल विरुद्ध थीं, फिर भी वह इंस्पेक्टर जोशी पर दीवानी हो गई। नारी को स्वयं नहीं मालूम उसका दिल कब और किस पर रीझ जायेगा। वह तो बस अपनी पसन्द से समझौता करके उसकी हो जाने को तड़प उठती है जिसके लिए उसका दिल धड़कने लगता है। अपनी इस कमजोरी के कारण कभी-कभी एकांत में वह इंस्पेक्टर जोशी की बांहों में समा जाने को भी तड़प उठती थी। तब इंस्पेक्टर जोशी बहुत गम्भीर मुस्कान के साथ उसे टाल जाता। वह सिद्धान्त का पक्का था। किसी भी गलत काम में रुचि लेना उसके आगे अपराध था। अनुचित बातों से उसे घृणा थी। परन्तु कभी-कभी वह एकान्त में अवश्य सोचता, क्या वह मांस से बना एक मानव नहीं है जिसके अन्दर एक धड़कता हुआ दिल भी होता है ?
शायद वह उसके पेशे का दोष था जिसने दिन-रात बदमाशों, चोर-डाकुओं तथा अत्याचारों पर सख्ती कराकर उसके दिल को पत्थर बना दिया था। शायद इसीलिए उसका दिल किरण के लिए कभी धड़क नहीं सका। उसकी अनुपस्थिति में तड़प नहीं सका। रात की तन्हाई में उसकी कमी नहीं महसूस कर सका। नींद के मध्य वह उसके सपने नहीं देख सका। क्या उसके दिल की चट्टान के नीचे कभी प्यार का सोता नहीं फूटेगा ? उसे सन्देह था और इसीलिए उसने अपने-आपको किरण के भरोसे छोड़ दिया। आखिर कभी तो उसे किसी से विवाह करना ही है और उसे विश्वास करना पड़ा कि उसके लिए किरण से अच्छी लड़की और कोई नहीं हो सकती। किरण उसे प्यार करती है-और विवाह उसी लड़की के साथ करना चाहिए जो उसे प्यार करती हो-न कि उससे जिसे वह प्यार करता है। लेकिन प्यार नाम की धड़कन उसके दिल के किसी कोने में थी ही नहीं तो वह किसे प्यार करता ? अपने दादा को अपना इरादा लिखकर उसने किरण की एक तस्वीर भी भेज दी। उधर डी.आई.जी. साहब ने भी अपनी पसन्द में बेटी की पसन्द मिलाकर विवाह की सारी तैयारियां आरम्भ कर दीं। फिर तारीख भी निश्चित हो गई। कार्ड भी छप गए। लोगों को आमंत्रित भी कर दिया गया। बहुत बेचैनी के साथ पुलिस विभाग के लगभग सभी कर्मचारी इस विवाह की प्रतीक्षा करने लगे।
उन्हीं दिनों इंस्पेक्टर जोशी के हाथों एक ‘केस’ लगा। शहर के दो ऐसे प्रतिष्ठित व्यक्तियों की हत्या हो गई थी कि पूरे शहर में सनसनी मच गई। हत्या बहुत निर्दयता के साथ की गई थी। इंस्पेक्टर जोशी ने अपनी योग्यतानुसार बहुत लगन से इस ‘केस’ की जांच की और हत्या का पता चलाने में सफल हो गया। फिर बिना समय गंवाए ही उसने पुलिस के जत्थे के साथ सुबह लगभग चार बजे हत्यारे के ठिकाने पर छापा मारा। अपराधी हाथ लगा। उसे थाने लाकर इंस्पेक्टर जोशी ने उचित सख्ती बरती। पूछताछ के मध्य जब हंटर लगाए तो अपने दांव-पेंच वाले प्रश्नों के उत्तर में उसे पता चला कि अपराधी पेशेवर हत्यारा है। यह बात जानकर उसे अपने उन मामलों की जांच करने की भी आशा बंध गई जो अधूरे थे। पेशेवर हत्यारे को देखकर थाने में उपस्थित अन्य इंस्पेक्टर भी चले आए। जिन्हें अपने-अपने मामलों में हत्यारों की तलाश थी।
‘‘बताओ।’’ इंस्पेक्टर जोशी ने गरजकर पूछा, ‘‘इससे पहले तुमने कितनी हत्याएं की हैं और किन-किन व्यक्तियों की हत्या की है ?’’
हत्यारा जानता था कि अब पुलिस के हाथ से उसका बच निकलना असम्भव है। पिछले दिनों एक साथ की दो हत्याओं पर उसे मृत्युदण्ड मिलना निश्चित था इसलिए अब उसने अपने सारे अपराध स्वीकार कर लेने में ही भलाई समझी। यदि कुछ छिपाने का प्रयत्न किया तो यह पुलिस वाले मार-मार कर उसका कचूमर बना देंगे। यूं भी अब तक पड़े कोड़ों के कारण उसकी गर्दन, कन्धे तथा पीठ का जोड़-जोड़ दुख रहा था। उसने अपनी गर्दन पर हाथ रखकर सहलाते हुए कहा, ‘‘यह तो मुझे याद नहीं कि अब तक मैंने कितनी हत्याएं की हैं-शायद बारह हत्याएं की हों तो कह नहीं सकता-परन्तु जो भी हत्याएं की हैं वह पिछले दो वर्ष के अन्दर ही की हैं।’’ हत्यारे ने एक दर्द की कराह ली और फिर बोला, ‘‘पहले मैं छोटा-मोटा अपराध करके गुजारा कर लेता था परन्तु जब मैंने देखा कि पुलिस के हाथों से अपराधी का बच निकलना बहुत आसान है तो पैसे के लालच में आकर मैंने बड़े-बड़े अपराधों की ओर भी पग बढ़ा दिये। फिर एक दिन हत्या करने का समय भी आ गया। आज से लगभग दो वर्ष पहले मैंने अपने जीवन में पहली हत्या की थी-गोविन्द प्रसाद एण्ड कम्पनी के मालिक सेठ गोविन्द प्रसाद की।’’

‘‘क्या !’’ सहसा इंस्पेक्टर जोशी इस प्रकार चौंक गया कि उसके हाथ से कोड़ा छूटते-छूटते बचा। उसकी आंखों के सामने तुरन्त सेठ गोविन्द प्रसाद की हत्या का दृश्य घूम गया। उसने खुद अपनी आंखों से जगदीश को उनकी हत्या करने के बाद छुरी निकालते हुए देखा था। अपने बयान के अतिरिक्त उस छुरी पर पड़ी अंगुलियों के निशान भी उसकी की हुई हत्या का सबसे बड़ा सबूत था। उसे हत्यारे की बात का जरा भी विश्वास नहीं हुआ। वह मानो खुद ही बड़बड़ाता हुआ बोला, ‘‘नहीं…नहीं…ऐसा कैसे हो सकता है ? वह हत्या तो…वह…।’’

