Abhishap by rajvansh Best Hindi Novel | Grehlakshmi
Abhishap by rajvansh

मनु आज सुबह से ही व्यस्त थी और नौकर के साथ पूरी कोठी की इस भांति सफाई करा रही थी, मानो वहां कोई पार्टी होने वाली हो। आनंद इन सब बातों से अलग था और कमरे में बैठा बार-बार क्लॉक को देख रहा था। सुबह के आठ बज चुके थे और किसी ने उससे नाश्ते के विषय में भी न पूछा था, जबकि उसे नौ बजे अपने कॉलेज पहुंचना था।

अभिशाप नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- भाग-1

आनंद यह तो जानता था कि आज इस घर में नई गाड़ी आ रही थी और गाड़ी के साथ-साथ एक विशिष्ट मेहमान भी आ रहा है, किन्तु यह बात उसकी समझ से परे थी कि केवल निखिल के लिए पूरी कोठी की सफाई क्यों हो रही थी।

फिर जब सवा आठ बज गए तो वह उठा और ड्राइंगरूम में आ गया। मनु उस समय ड्राइंगरूम में ही थी और अपने हाथों से गुलदस्ते में ताजे फूल सजा रही थी। नौकर बाहर लॉन में उगे पौधों की सूखी पत्तियां हटा रहा था।

आनंद उसे कुछ क्षणों तक तो देखता रहा और फिर बोला- ‘देवीजी! तुम कहो तो इस सफाई अभियान में मैं भी शामिल हो जाऊं?’

‘रहने दो-मैं सब कुछ कर लूंगी।’

‘कर तो लोगी-किन्तु मेरा क्या होगा?’

‘क्यों?’

‘मुझे कॉलेज जाना है।’

‘ठीक है।’ मनु ने मेज पर झुके-झुके उत्तर दिया- ‘जाओ।’

‘और-नाश्ता?’

‘बाहर प्रताप है-उससे कह दो।’

‘क्या तुम्हारे पास इतना भी समय नहीं कि अपने पति के लिए नाश्ता भी बना सको?’

‘समझा करो आनंद!’ गुलदस्ता रखकर मनु ने आनंद को देखा और बोली- ‘तुम तो देख ही रहे हो कि सुबह से मैं कितनी व्यस्त हूं। एक पल का भी समय नहीं मिला।’

‘सफाई इतनी जरूरी थी?’ न चाहते हुए भी आनंद पूछ बैठा।

‘विवाह के पश्चात् सफाई हुई कहां थी? सभी कमरे गंदे पड़े थे। कोई मेहमान आए और घर को अस्त-व्यस्त तथा गंदा देखे तो क्या यह अच्छा लगता है?’

इसके पश्चात् मनु ने नौकर को बुलाकर उससे कहा- ‘सुनो! लॉन की सफाई हो गई?’

‘क्यारी में पानी डालना बाकी है।’

‘कमाल है-तुमने अभी पानी भी नहीं डाला। क्या कर रहे हो तुम सुबह से? नौ बजने में अब समय ही कितना रह गया है?’

‘बस-पांच मिनट में हो जाएगा मेम साहब!’ नौकर बोला।

‘ठीक है। पांच मिनट में यह काम करो और उसके पश्चात् साहब के लिए नाश्ता तैयार कर दो।’

‘ठीक है मेम साहब!’ कहकर नौकर मुड़ा।

आनंद ने उसे रोककर कहा- ‘नहीं प्रताप! तुम अपना काम करो। सफाई नाश्ते से अधिक जरूरी है। मैं कैंटीन में कुछ खा लूंगा।’

नौकर चला गया।

मनु ने आनंद को गुस्से में देखकर कहा- ‘कभी-कभी यह क्या हो जाता है तुम्हें? क्या तुम एक दिन नौकर के हाथ से बना नाश्ता नहीं कर सकते?’

‘प्रश्न नाश्ते का नहीं है मनु!’ आनंद अपना आक्रोश न दबा सका और बोला- ‘प्रश्न है उपेक्षा का। तुम मेरी उपेक्षा कर रही हो। तुम निखिल के आने की खुशी में यह भी भूलती जा रही हो कि तुम किसी की पत्नी हो। तुम्हारे अपने पति के प्रति भी कुछ कर्त्तव्य हैं।’

‘तुम्हें निखिल से इतनी घृणा क्यों है?’

‘मुझे निखिल से नहीं तुम्हारे व्यवहार से घृणा है। तुम्हारा व्यवहार कभी-कभी इतना उपेक्षापूर्ण होता है कि…।’

‘यह तुम्हारा भ्रम है।’

‘यह भ्रम नहीं बल्कि सच्चाई है।’

‘अच्छा बाबा!’ मनु ने झुंझलाकर कहा- ‘अब तुम मेरा मूड खराब न करो और जाओ।’

आनंद ने क्रोध एवं घृणा से दांत पीस लिए, किन्तु उसने कुछ न कहा और तेज-तेज पग उठाते हुए कमरे से निकल गया।

मनु वहीं खड़ी अपने गुस्से को पीने का प्रयास करती रही। उसी समय गोपीनाथ कमरे में आकर उससे बोले- ‘आनंद को अचानक ही क्या हो गया?’

‘साहब के मन में जलन पैदा हो रही है।’

‘जलन-वह क्यों कर?’

‘निखिल की वजह से-वह आ रहा है न?’

‘इसमें जलन की क्या बात है? और फिर-निखिल तो यहां पहले से आता रहा है।’

‘पापा! यह बात आनंद जैसे दार्शनिक की समझ में नहीं आ सकती। वह तो यह चाहता है कि हम उसके लिए पुराने संबंधों को भी ठोकर मार दें। कहता था-सफाई की क्या जरूरत है? हुं-मुझे तो यह दार्शनिक लोग बहुत ही घटिया नजर आते हैं।’ मनु के स्वर में घृणा थी।

‘कोई बात नहीं।’ गोपीनाथ बोले- ‘मैं उसे समझा दूंगा। तुम नाश्ते का प्रबंध करो, नौ बजने वाले हैं।’

‘मेरा तो मूड ही बिगाड़ दिया आनंद ने।’

‘छोटी-छोटी बातों पर ध्यान नहीं दिया करते। तुम चलकर अपना काम देखो-निखिल आता ही होगा।’

तभी बाहर किसी गाड़ी के हॉर्न की आवाज सुनाई पड़ी।

हॉर्न की आवाज सुनकर गोपीनाथ एवं मनु बाहर निकले। देखा-हरे रंग की एक चमचमाती गाड़ी गेट के अंदर प्रवेश कर रही थी। गाड़ी की चालक सीट पर निखिल बैठा था।

गाड़ी ज्यों ही बरामदे के सामने आकर रुकी-मनु एवं गोपीनाथ तुरंत गाड़ी के समीप आ गए। दोनों के चेहरों पर प्रसन्नता की लहर छाई थी। तभी गाड़ी का द्वार खुला और निखिल ने बाहर आकर अभिवादन के उपरांत गोपीनाथ से कहा-

‘अंकल! मेरी ओर से यह छोटी-सी भेंट स्वीकार कीजिए।’ इतना कहकर उसने गाड़ी की चाबियां गोपीनाथ को थमाईं और कनखियों से मनु की ओर देखने लगा।

मनु मुस्कुरा रही थी।

गोपीनाथ चाबियां लेकर बोले- ‘निक्की! तुम्हारी महानता की कोई सीमा नहीं। लाखों की गाड़ी को तुम छोटी-सी भेंट कह रहे हो।’

‘अंकल! आप कुछ भी कहें-मैं तो इसे छोटी-सी भेंट ही कहूंगा। वैसे-गाड़ी पसंद आई आपको।’

‘पसंद!’ इस बार मनु बोली- ‘बहुत पसंद है निक्की। इसका रंग और मॉडल तो मुझे बहुत ही प्यारा लगा है।’ इतना कहकर मनु ने द्वार खोला ओर अंदर बैठ गई।

गोपीनाथ धीरे से हंसकर बोले- ‘निक्की! यह लड़की तो हमेशा बच्ची ही रहेगी।’ फिर उन्होंने मनु से कहा- ‘मनु बेटे! अब गाड़ी में बैठी रहोगी अथवा निक्की को कुछ खिलाओगी-पिलाओगी भी।’

मनु बाहर आ गई।

निखिल से बोली- ‘थैंक्यू निक्की! आओ।’

फिर सब ड्राइंगरूम में आ गए।

जलपान के दौरान निखिल गोपीनाथ जी से अपनी निर्माणाधीन फिल्म के विषय में बताने लगा। सुनकर मनु बोली- ‘निक्की! तुम्हारी इस फिल्म में कोई छोटा-मोटा रोल मुझे भी मिल सकता है?’

‘छोटा-मोटा रोल।’ निखिल ने एक बार गोपीनाथ की ओर देखकर मनु से कहा- ‘मनु! तुम तो हीरोइन बनने के योग्य हो। क्या नहीं है तुम्हारे पास-अच्छी शिक्षा, अच्छी आवाज और सुंदरता। मैं तो तुमसे इस संबंध में स्वयं ही कहने वाला था, किन्तु फिर सोचा कि शायद तुम्हें फिल्म इंडस्ट्री पसंद न हो।’

‘नहीं-मुझे तो बहुत पसंद है। पापा! क्या आपको भी फिल्म इंडस्ट्री पसंद है।’ मनु ने अपने पिता से पूछा।

गोपीनाथ बोले- ‘भई! बात पसंद-नापसंद की नहीं-असली बात तो उम्र की है। अब इस उम्र में हमें कौन रोल देगा?’

इस पर निखिल एवं मनु दोनों हंस पड़े।

हंसी रुकने पर मनु बोली- ‘आप भी कमाल करते हैं पापा! मैं तो पूछ रही थी कि क्या आप मेरा फिल्म इंडस्ट्री में जाना ठीक समझते हैं?’

‘इसमें बुराई भी क्या है।’

‘फिर ठीक है पापा!’ कहकर मनु ने अपनी चाय समाप्त की और निखिल से बोली- ‘निक्की! मैं तुम्हारी फिल्म में हीरोइन का रोल करने को तैयार हूं।’

‘थैंक्यू।’

‘कब साइन करूं?’

‘मैं उससे पहले तुम्हें स्क्रिप्ट दिखाना चाहूंगा। और हां-अभी तो स्टूडियो बनने में भी दो महीनों का समय लगेगा।’

‘कोई बात नहीं, मैं दो महीने प्रतीक्षा कर लूंगी। वैसे-फिल्म का नाम क्या है?’

‘दौलत और ईमान।’

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‘नाम तो अच्छा है।’ गोपीनाथ बोले- ‘कहानी?’

‘वह भी अच्छी है।’ निखिल ने कहा।

फिर जलपान समाप्त हो गया और गोपीनाथ उठकर बोले- ‘अच्छा भई! तुम लोग बैठो। मैं एक-दो फोन कर लूं।’ इसके उपरांत वे चले गए।

मनु उठकर निखिल के समीप बैठ गई और उसके कंधे पर सर रखकर बोली- ‘निक्की! रात तो मुझे नींद नहीं आई।’

‘क्यों?’

‘तुम्हारे आने की खुशी में।’

‘किन्तु मुझे तो सुबह आना था।’

‘मैं सुबह होने की प्रतीक्षा करती रही।’

‘मैं भी।’ निक्की ने मनु के बालों से खेलते हुए कहा और फिर कुछ सोचकर वह बोला- ‘आनंद साहब तो कॉलेज गए होंगे?’

‘हां-सुबह ही चले गए-नौ बजे। जाते-जाते मेरा मूड खराब कर दिया।’

‘वह क्यों?’

‘मुझसे नाश्ता तैयार करने के लिए कह रहे थे।’

‘तो?’

‘मेरे पास समय न था-सफाई में लगी थी। बस-साहब इसी बात पर बिगड़ गए और बिना नाश्ता किए ही चले गए। मैंने भी नहीं रोका।’

‘तुम्हारा आनंद दर्शन शास्त्र का प्रोफेसर है न?’

‘हां।’

‘तभी तो…। दरअसल यह दार्शनिक लोग कुछ अजीब किस्म के होते हैं। यह न तो स्वयं खुश रहते हैं और न ही दूसरों को खुश रहने देते हैं। इन्हें तो ऐसी दुनिया में रहना चाहिए, जहां कोई दूसरा न रहता हो। समझ में नहीं आता-तुम ऐसे इंसान के साथ निभाओगी कैसे?’

‘कोशिश करूंगी कि निभ जाए। न निभी तो फिर अलग हो जाऊंगी।’

‘अलग होकर कहां जाओगी।’

‘तुम्हारे पास-और कहां।’

निखिल को उसके इस वाक्य से खुशी हुई। मनु को चूमकर वह बोला- ‘खैर छोड़ो-आओ कहीं घूम आते हैं।’

‘एक शर्त।’ मनु उससे अलग होकर बोली- ‘गाड़ी मैं ड्राइव करूंगी।’

‘भई! गाड़ी तुम्हारी है तो ड्राइव और कौन करेगा। जाओ-अंकल से इजाजत ले लो-फिर चलते हैं।’

मनु ने उठकर मस्तक पर फैले बालों को हथेली से पीछे हटाया और चलकर अपने पिता गोपीनाथ के पास आ गई। गोपीनाथ उस समय फोन पर किसी से बातें कर रहे थे।

बातें समाप्त होने पर मनु उन पर पीछे से झुक गई और बोली- ‘पापा! आपकी इजाजत हो तो मैं कहीं घूम आऊं?’

‘निखिल गया?’ गोपीनाथ ने पूछा।

‘बैठे हैं।’

‘ठीक है-घूम आओ, किन्तु दोपहर का खाना?’

‘मैं बाहर खा लूंगी। आपका खाना प्रताप बना देगा।’

‘जैसी तुम्हारी इच्छा, किन्तु एक बात का ध्यान रखना-गाड़ी देख-भालकर चलना। नई गाड़ी है।’

‘डोंट वरी पापा! कुछ नहीं होगा। तो-मैं जाऊं?’

‘जाओ-बाबा! जाओ।’

‘थैंक्यू पापा!’ मनु ने कहा और फिर तेजी से चलकर निखिल के पास आ गई।

निखिल उस समय दर्पण के सामने खड़ा अपने बाल संवार रहा था।

अभिशाप- भाग-11 दिनांक 01 Mar. 2022 समय 04:00 बजे साम प्रकाशित होगा

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