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गोदान - मुंशी प्रेमचंद - Hindi novel Godan by Premchand | Grehlakshmi
godan by munshi premchand

गोबर अंधेरे ही मुँह उठा और कोदई से विदा माँगी । सबको मालूम हो गया था कि उसका ब्याह हो चुका है, इसलिए उससे कोई विवाह-सम्बन्धी चर्चा नहीं की । उसके शील-स्वभाव ने सारे घर को मुग्ध कर लिया था । कोदई की माता को तो उसने ऐसे मीठे शब्दों में और उसके मातृपद की रक्षा करते हुए, ऐसा उपदेश दिया कि उसने प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया था । तुम बड़ी हो माता जी, पूज्य हो । पुत्र माता के रिन से सौ जन्म लेकर भी उरिन नहीं हो सकता, लाख जन्म लेकर भी उरिन नहीं हो सकता । करोड़ जन्म लेकर भी नहीं? बुढ़िया इस संख्यातीत श्रद्धा पर गद्गद हो गयी । इसके बाद गोबर ने जो कुछ कहा, उसमें बुढ़िया को अपना मंगल ही दिखाई दिया । वैद्य एक बार रोगी को चंगा कर दे, फिर रोगी उसके हाथों विष भी खुशी से पी लेगा-अब जैसे आज ही बहू घर से रूठकर चली गयी तो किसकी हेठी हुई? बहू को कौन जानता है? किसकी लड़की है, किस की नातिन है, कौन जानता है! सम्भव है, उसका बाप घसियारा ही रहा हो । बुढिया ने निश्चयात्मक भाव से कहा-घसियारा तो है ही बेटा, पक्का घसियारा । सबेरे उसका मुँह देख लो, तो दिन-भर पानी न मिले । गोबर बोला-तो ऐसे आदमी की क्या हंसी हो सकती है! हंसी हुई तुम्हारी और तुम्हारे आदमी की । जिसने पूछा, यही पूछा कि किसकी बहू है? फिर वह अभी लड़की है, अबोध अल्हड़ । नीच माता-पिता की लड़की है, अच्छी कहीं से बन जाये? तुमको तो बूढ़े तोते को राम-नाम पढ़ाना पढ़ेगा । मारने से तो वह पढ़ेगा नहीं, उसे तो सहज स्नेह ही से पढ़ाया जा सकता है । ताड़ना भी दो, लेकिन उसके मुँह मत लगो । उसका तो कुछ नहीं बिगड़ता, तुम्हारा अपमान होता है । अब गोबर चलने लगा, तो बुढ़िया ने खाँड और सत्तू मिलाकर उसे खाने को दिया । गाँव के और कई आदमी मजूरी की टोह में शहर जा रहे थे । बातचीत में रास्ता कट गया और नौ बजते-बजते सब लोग अमीनाबाद के बाजार में जा पहुँचे । गोबर हैरान था । इतने आदमी नगर में कही से आ गये? आदमी पर आदमी गिरा पड़ता था । उस दिन बाजार में चार-पाँच सौ मज़दूरों से कम न थे । राज और बढ़ई और लोहार और बेलदार और खाट बुनने वाले और टोकरी ढोने वाले और संगतराश सभी जमा थे । गोबर यह जमघट देखकर निराश हो गया । इतने सारे मजूरों को कही काम मिला जाता है । और उसके हाथ तो कोई औजार भी नहीं है । कोई क्या जानेगा कि वह क्या काम कर सकता है । कोई उसे क्यों रखने लगा । बिना औजार के उसे कौन पूछेगा? धीरे-धीरे एक-एक करके मजूरों को काम मिलता जा रहा था, कुछ लोग निराश होकर घर लौटे जा रहे थे । अधिकतर वह बूढ़े और निकम्मे बच रहे थे, जिनका कोई पुछंतर न था । और उन्हीं में गोबर भी था । लेकिन अभी आज उसके पास खाने को है । कोई गम नहीं । सहसा मिर्ज़ा खुर्शेद ने मज़दूरों के बीच में आकर ऊँची आवाज से कहा-जिसको छः आने रोज पर काम करना हो, वह मेरे साथ आये । सबको छः आने मिलेंगे । पाँच बजे छुट्टी मिलेगी । दस-पाँच राजों और बढ़इयों को छोड़कर सब-के-सब उनके साथ चलने को तैयार हो गये । चार सौ फटे-हालों की एक विशाल सेना राज गयी । आगे मिर्ज़ा थे कंधे पर मोटा सोटा रखे हुए । पीछे मुखमरों की लम्बी कतार थी, जैसे भेड़ें हों । एक बूढ़े ने मिर्ज़ा से पूछा-कौन काम करना है मालिक? मिर्ज़ा ने जो काम बतलाया, उस पर सब और भी चकित हो गये । केवल एक कबड्डी खेलना! यह कैसा आदमी है, जो कबड्डी खेलने के लिए छः आना रोज दे रहा है । सनकी तो नहीं है कोई! बहुत धन पाकर आदमी सनक भी जाता है । बहुत पढ़ लेने से भी आदमी पागल हो जाते हैं । कुछ लोगों को सन्देह होने लगा, कहीं यह कोई मखौल तो नहीं है! यहाँ से घर पर ले जाकर कह दे,कोई काम नहीं है, तो कौन उसका क्या कर लेगा? वह चाहे कबड्डी खिलाये, चाहे ईख मिचौनी चाहे गुल्लीडंडा, मजूरी पेशगी दे दे । ऐसे झक्कड़ आदमी का क्या भरोसा? गोबर ने डरते-डरते कहा-मालिक, हमारे पास कुछ खाने को नहीं है । पैसे मिल जायँ, तो कुछ लेकर खालूँ ।

मिर्ज़ा ने झट छः आने पैसे उसके हाथ में रख दिये और ललकारकर बोले-मजूरी सबको चलते-चलते पेशगी दे दी जायेगी । इसकी चिन्ता मत करो । मिर्ज़ा साहब ने शहर के बाहर थोड़ी-सी जमीन ले रखी थी । मज़दूरों ने जाकर देखा, तो एक बड़ा अहाता घिरा हुआ था और उसके अन्दर केवल एक छोटी-सी फूस की झोंपड़ी थी, जिसमें तीन-चार कुर्सियाँ थी । झोपड़ी बेलों और लताओं से ढकी हुई बहुत ही सुन्दर लगती थी । अहाते में एक तरफ आम और नींबू और अमरूद के पौधे लगे थे, दूसरी तरफ कुछ फूल । बड़ा हिस्सा परती था । मिर्ज़ा ने सबको एक कतार में खड़ा करके ही मजूरी बाँट दी । अब किसी को उनके पागलपन में सन्देह न रहा । गोबर पैसे पहले ही पा चुका था, मिर्ज़ा ने उसे बुलाकर पौधे सींचने का काम सौंपा । उसे कबड्डी खेलने को न मिलेगी । मन में ऐंठकर रह गया । इन बुड्ढों को उठा-उठाकर पटकता; लेकिन कोई परवाह नहीं । बहुत कबड्डी खेल चुका है । पैसे तो पूरे मिल गये । आज युगों के बाद इन ज़राग्रस्तों को कबड्डी खेलने का सौभाग्य मिला । अधिकतर तो ऐसे थे, जिन्हें याद भी न आता था कि कबड्डी खेली है या नहीं । दिनभर शहर में पिसते थे । पहर रात गये घर पहुँचते थे और जो कुछ रूखा मिल जाता था, खाकर पड़ रहते थे । प्रातःकाल फिर वही चरखा शुरू हो जाता था । जीवन नीरस, निरानन्द, केवल एक ढर्रा मात्र हो गया था । आज जो यह अवसर मिला तो बूढ़े भी जवान हो गये, अधमरे बूढ़े ठठरियाँ लिये, मुँह में दाँत न पेट में आँत, जाँघ के ऊपर धोतियाँ या तहमद चढ़ाये ताल ठोंक-ठोंककर उछल रहे थे. मानो उन बूढी हड्डियों में जवानी धँस पड़ी हो । चटपट पाली बन गयी, दो नायक बन गये । गोइयों का चुनाव होने लगा । और बारह बजते-बजते खेल शुरू हो गया । जाड़ों की ठण्डी धूप ऐसी क्रीड़ाओं के लिए आदर्श है । इधर अहाते के फाटक पर मिर्ज़ा साहब तमाशाइयों को टिकट बाँट रहे थे । उन पर इस तरह की कोई-न-कोई सनक हमेशा सवार रहती थी । अमीरों से पैसा लेकर गरीबों में बाँट देना । इस बूढ़ी कबड्डी का विज्ञापन कई दिन से हो रहा था । बड़े-बड़े पोस्टर चिपकाये गये थे, नोटिस बाँटे गये थे । यह खेल अपने ढंग का निराला होगा, बिलकुल अभूतपूर्व । भारत के बूढ़े आज भी केसे पोढ़े हैं, जिन्हें यह देखना हो, आयें और अपनी आँखें तृप्त कर लें । जिसने यह तमाशा न देखा, वह पछतायेगा । ऐसा सुअवसर फिर न मिलेगा । टिकट दस रुपये से लेकर दो आने तक थे । तीन बजते-बजते सारा अहाता भर गया । मोटरों और फिटनों का ताँता लगा हुआ था । दो हजार से कम की भीड़ न थी । रईसों के लिए कुर्सियों और बेंचों का इन्तजाम था । साधारण जनता के लिए साफ सुथरी जमीन । मिस मालती, मेहता, रवन्ना, तंखा और रायसाहब सभी विराजमान थे । खेल शुरू हुआ तो मिर्ज़ा ने मेहता से कहा-आइए डॉक्टर साहब, एक गोई हमारी और आपकी हो जाए मिरर मालती बोली-फिलासफर का जोड़ तो फिलॉसफर ही से हो सकता है । मिर्ज़ा ने मूंछों पर ताव देकर कहा-तो क्या आप समझती हैं, मैं फिलॉसफर नहीं हूँ, मेरे पास पुछल्ल नहीं है, लेकिन हूँ मैं फिलॉसफर: आप मेरा इम्तहान ले सकते हैं । मेहता जी! मालती ने पूछा-अच्छा बतलाइए, आप आइडियलिस्ट हैं या मैटीरियलिस्ट? मैं दोनों हूँ । यह क्योंकर? बहुत अच्छी तरह । जब जैसा मौका देखा वैसा बन गया । तो आपका अपना कोई निश्चय नहीं हैं । जिस बात का आज तक कभी निश्चय न हुआ, और न कभी होगा, उसका निश्चय मैं भला कैसे क्या कर सकता हूँ; और लोग आंखें फोड़कर और किताबें चाटकर जिस नतीजे पर पहुँचते हैं, वही मैं यों ही पहुँच गया । आप बता सकती हैं, किसी फिलॉसफर ने अक्लीगद्दे लड़ाने के सिवाय और कुछ किया है?’

डॉक्टर मेहता ने अचकन के बटन खोलते हुए कहा-तो चलिए हमारी और आपकी बाजी हो ही जाय और कोई माने या न माने, मैं आपको फिलॉसफर मानता हूं। मिर्ज़ा ने खन्ना से पूछा-आपके लिए भी कोई जोड़ ठीक करूँ? मालती ने पुचारा दिया-हाँ, ही इन्हें जरूर ले जाइये, मिस्टर तंखा के साथ । खन्ना झेंपते हुए बोले-जी नहीं, मुझे क्षमा कीजिए । मिर्ज़ा ने रायसाहब से पूछा-आपके लिए कोई जोड लाऊँ? रायसाहब बोले-मेरा जोड़ तो ओंकारनाथ का है, मगर वह आज नजर नहीं आते । मिर्ज़ा और मेहता भी नंगी देह, केवल जाँघिये पहले हुए मैदान में पहुँच गए । एक इधर, दूसरा उधर । खेल शुरू हो गया । जनता बूढ़े कुलेलों पर हंसती थी, तालियाँ बजाती थी, गालियाँ देती थी, ललकारती थी, बाजियाँ लगाती थी । वाह! ज़रा इन बूढ़े बाबा को देखो! किस शान से जा रहे हैं, जैसे सबको मारकर ही लौटेंगे । अच्छा, दूसरी तरफ से भी उन्हीं के बड़े भाई निकले । दोनों कैसे पैंतरे बदल रहे हैं । इन हड्डियों में अभी बहुत जान है । इन लोगों ने जितना घी खाया है, उतने अब हमें पानी भी मयस्सर नहीं । लोग कहते हैं, भारत धनी हो रहा है, होता होगा । हम तो यही देखते हैं कि इन बुड्ढों-जैसे जीवट के जवान भी आज मुश्किल से निकलेंगे । वह उधर वाले बुड्ढे ने इसे दबोच लिया । बेचारा छूट निकलने के लिए कितना जोर मार रहा है, मगर अब नहीं जा सकते बच्चा! एक को तीन लिपट गए । इस तरह लोग अपनी दिलचस्पी जाहिर कर रहे थे, उनका रगरा ध्यान मैदान की ओर था । खिलाड़ियों के आघात-प्रतिघात, उछल-कूद, धर-पकड़ और उनके मरने-जीने में तन्मय हो रहे थे । कभी चारों तरफ से कहकहे पड़ते, कभी कोई अन्याय या धाँधली देखकर लोग ‘छोड़ दो, छोड़ दो’ का गुल मचाते । कुछ लोग तैश में आकर पाली की तरफ दौड़ते, लेकिन जो थोड़े-से सज्जन शामियाने में ऊँचे दर्जे के टिकट लेकर बैठे थे, उन्हें इस खेल का विशेष आनन्द न मिल रहा था । वे इससे अधिक महत्त्व की बातें कर रहे थे ।

खन्ना ने जिंजर का ग्लास खाली करके सिगार सुलगाया और रायसाहब से बोले-मैंने आपसे कह दिया, बैंक इससे कम सूद पर किसी तरह राजी न होगा और यह रिआयत भी मैंने आपके साथ की है, क्योंकि आपके साथ घर का मुआमला है । रायसाहब ने मूँछों से मुस्कराहट को लपेटकर कहा-आपकी नीति में घरवालों को ही उलटे छुरे से हलाल करना चाहिए? यह आप क्या फरमा रहे है? ठीक कह रहा हूँ ।’ सूर्यप्रताप सिंह से आपने केवल सात फीसदी लिया है, मुझसे नौ फीसदी माँग रहे हैं और उस पर एहसान भी रखते हैं । क्यों न हो! उन शर्तों पर मैं आपसे भी वही सूद ले लूंगा । हमने उनकी जायदाद रेहन रख ली है और शायद यह जायदाद फिर उनके हाथ न जायेगी । मैं अपनी कोई जायदाद निकाल दूँगा । नौ परसेंट देने से यह कहीं अच्छा है कि फालतू जायदाद अलग कर दूँ । मेरी जैकसन रोडवाली कोठी आप निकलवा दें । कमीशन ले लीजियेगा । उस कोठी का सुभीते से निकलना ज़रा मुश्किल है । आप जानते हैं, वह जगह बस्ती से कितनी दूर है; मगर खैर, देखूँगा । आप उसकी कीमत का क्या अन्दाज़ा करते हैं? रायसाहब ने एक लाख पच्चीस हजार बताए । पन्द्रह बीघे जमीन भी तो है । उसके साथ । खन्ना स्तम्भित रह गए । बोले-आप आज के पन्द्रह साल पहले का स्वप्न देख रहे हैं रायसाहब! आपको मालूम होना चाहिए कि इधर जायदादों के मूल्य में पचास परसेंट की कमी हो गई है । रायसाहब ने बुरा मानकर कहा-जी नहीं, पन्द्रह साल पहले उसकी कीमत डेढ़ लाख थी । मैं खरीददार की तलाश में रहूँगा, मगर मेरा कमीशन पांच प्रतिशत होगा आपसे । औरों से शायद दस प्रतिशत हो, क्यों! क्या करोगे इतने रुपये लेकर? आप जो चाहें दे दीजियेगा । अब तो राजी हुए । शुगर के हिरसे अभी तक आपने न खरीदे? अब बहुत थोड़े-से हिस्से बच रहे हैं । हाथ मलते रह जाइयेगा । इंश्योरेंस की पॉलिसी भी आपने न ली । आप में टाल-मटोल की बुरी आदत है । जब अपने लाभ की बातों का इतने टाल-मटोल, तब दूसरों को आप लोगों से क्या लाभ हो सकता है! इसी से कहते हैं, रियासत आदमी की अक्ल चर जाती है । मेरा बस चले तो मैं ताण्डकेदारों की रियासतें जब्त कर लूँ ।

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मिस्टर तंखा मालती पर जाल फेंक रहे थे । मालती ने साफ कह दिया था कि वह एलेक्शन के झमेले में नहीं पड़ना चाहती, पर तंखा इतनी आसानी से हार माननेवाले व्यक्ति न थे । आकर कुहनियों के बल मेज पर टिककर बोले-आप ज़रा उस मुआमले पर फिर विचार करें । मैं कहता हूँ, ऐसा मौका शायद आपको फिर न मिले । रानी साहब चन्दा को आपके मुकाबले में रुपये में एक आना भी चांस नहीं है । मेरी इच्छा केवल यह है कि कांउन्सिल में ऐसे लोग जायँ, जिन्होंने जीवन में कुछ अनुभव प्राप्त किया है और जनता की कुछ सेवा की है । जिस महिला ने भोग-विलास के सिवा कुछ जाना ही नहीं, जिसने जनता को हमेशा अपनी कार का पेट्रोल समझा, जिसकी सबसे मूल्यवान सेवा वे पार्टियाँ हैं, जो वह गवर्नरों और सेक्रेटरियों को दिया करती हैं, उनके लिए इस काउन्सिल में स्थान नहीं है । नई कांउसिल में बहुत कुछ अधिकार प्रतिनिधियों के हाथ में होगा और मैं नहीं चाहता कि वह अधिकार अनधिकारियों के हाथ में जाय | मालती ने पीछा छुड़ाने के लिए कहा-लेकिन साहब, मेरे पास दस-बीस हजार एलेक्तान पर खर्च करने के लिए कही है? रानी साहब तो दो-चार लाख खर्च कर सकती हैं । मुझे भी साल में हजार-पाँच सौ रुपए उनसे मिल जाते हैं, यह रकम भी हाथ से निकल जायगी । पहले आप यह बता दें कि आप जाना चाहती हैं या नहीं? जाना तो चाहती हूँ, मगर फ्री पास मिल जाय!

‘तो यह मेरा जिम्मा रहा । आपको फ्री पास मिल जायेगा । जी नहीं, क्षमा कीजिए । मैं हार की जिल्लत नहीं उठाना चाहती । जब रानी साहिबा रुपये की थैलियाँ खोल देंगी और एक-एक वोट पर एक-एक अशर्फी चढ़ने लगेगी, तो शायद आप भी उधर वोट देंगे । आपके ख्याल में एलेक्शन महज रुपये से जीता जा सकता है? जी नहीं, व्यक्ति भी एक चीज़ है । लेकिन मैंने केवल एक बार जेल जाने के सिवा और क्या जनसेवा की है? और सच पूछिए तो उस बार भी मैं अपने मतलब ही से गयी थी, उस तरह जैसे रायसाहब और खन्ना गये थे । इस नई सभ्यता का आधार धन है । विद्या और सेवा और कुल और जाति सब धन के सामने हेय हैं । कभी-कभी इतिहास में ऐसे अवसर आ जाते हैं, जब धन को आन्दोलन के सामने नीचा देखना पड़ता है, मगर इसे अपवाद समझिए । मैं अपनी ही बात कहती हूँ । कोई गरीब औरत दवाखाने में आ जाती है, तो घण्टों उससे बोलती तक नहीं । पर कोई महिला कार पर आ गई, तो द्वार तक जाकर उसका स्वागत करती हूँ ओर उसकी ऐसी उपासना करती हूँ, मानों साक्षात् देवी है । मेरा और रानी साहब का कोई मुकाबला नहीं । जिस तरह के कांउन्सिल बन रहे हैं, उनके लिए रानी साहब ही ज्यादा उपयुक्त है । उधर मैदान में मेहता की टीम कमजोर पड़ती जाती थी । आधे से ज्यादा खिलाड़ी मर चुके थे । मेहता ने अपने जीवन में कभी कबड्डी न खेली थी । मिर्ज़ा इस फन के उस्ताद थे । मेहता की तातीलें अभिनय के अभ्यस में कटती थी । रूप भरने में वह अच्छे-अच्छे को चकित कर देते थे । और मिर्ज़ा के लिए सारी दिलचस्पी अखाड़े में थी, पहलवानों के भी और परियों के भी ।मालती का ध्यान उधर भी लगा हुआ था । उठकर रायसाहब से बोली-मेहता की पाटी तो बुरी तरह पिट रही है । रायसाहब और खन्ना में इंश्योरेन्स की बातें हो रही थी । रायसाहब उस प्रसंग से ऊबे हुए मालूम होते थे । मालती ने मानों उन्हें एक बन्धन से मुक्त कर दिया । उठकर बोले-जी हाँ, पिट तो रही है । मिर्ज़ा पक्का खिलाड़ी है । मेहता को यह क्या सनक सूझी! व्यर्थ अपनी भद्द करा रहे हैं । इसमें काहे की भद्द? दिल्लगी ही तो है । मेहता की तरफ से जो बाहर निकलता है, वही मर जाता है । एक क्षण के बाद उसने पूछा-क्या इस खेल में हाफ टाइम नहीं होता?
खन्ना को शरारत सूझी । बोले-आप चले थे मिर्ज़ा से मुकाबला करने? समझते थे, यह भी फिलॉसफी है । मैं पूछती हूँ, इस खेल में हाफ टाइम नहीं होता? खन्ना ने फिर चिढ़ाया-अब खेल ही खतम हुआ जाता है । मजा आएगा तब, जब मिर्ज़ा मेहता को दबोचकर रगड़ेंगे और मेहता साहब ‘चीं बोलेंगे । मैं तुमसे नहीं पूछती । रायसाहब से पूछती हूँ । रायसाहब बोले-इस खेल में हाफ टाइम! एक ही एक आदमी तो सामने आता है। अच्छा, मेहता का एक आदमी और मर गया । खन्ना बोले-आप देखती रहिए! इसी तरह सब मर जायेंगे । और आखिर में मेहता साहब भी मरेंगे । मालती जल गई-आपकी हिम्मत न पड़ी बाहर निकलने की । मैं गँवारों के खेल नहीं खेलता । मेरे लिए टेनिस है । टेनिस में भी मैं तुम्हें सैकड़ों गेम दे चुकी हूँ । आपसे जीतने का दावा ही कब किया है? अगर दावा हो तो, मैं तैयार हूँ । मालती उन्हें फटकार बताकर फिर अपनी जगह पर आ बैठी । किसी को मेहता से हमदर्दी नहीं है । कोई यह नहीं कहता कि अब खेल खतम कर दिया जाय । मेहता भी अजीब बुद्ध आदमी हैं, कुछ धाँधली क्यों नहीं कर बैठते । यही अपनी न्याय-प्रियता दिखा रहे हैं । अभी हारकर लौटेंगे तो चारों तरफ से तालियाँ पड़ेंगी । अब शायद बीस आदमी उनकी तरफ और होंगे, और लोग कितने खुश हो रहे हैं । ज्यों-ज्यों अन्त समीप आता जाता था, लोग अधीर होते जाते थे और पाली की तरफ बढ़ते जाते थे । रस्सी का जो एक कठघरा-सा बन गया था, वह तोड़ दिया गया । स्वयंसेवक रोकने की चेष्टा कर रहे थे; पर उस उत्सुकता के उन्माद में उनकी एक न चलती थी । यही तक कि ज्वार अन्तिम बिन्दु तक आ पहुँचा और मेहता अकेले बच गए और अब उन्हें गूँगे का पार्ट खेलना पड़ेगा । अब सारा दारमदार उन्हीं पर है, अगर वह बचकर अपनी पाली में लौट आते हैं, तो उनका पक्ष बचता है । नहीं हार का सारा अपमान और लज्जा लिए हुए उन्हें लौटना पड़ता है, वह दूसरे पक्ष के जितने आदमियों को छूकर अपनी पाली में आयेंगे, वह सब मर जायेंगें और उतने ही आदमी उनकी तरफ जी उठेंगे । सबकी आँखें मेहता की ओर लगी हुई थीं । वह मेहता चले । जनता ने चारों ओर से आकर पाली को घेर लिया । तन्मयता अपनी पराकाष्ठा पर थी । मेहता कितने शान्त भाव से शत्रुओं की ओर जा रहे थे । उनकी प्रत्येक गति जनता पर प्रतिबिम्बित हो जाती है, किसी की गर्दन टेढ़ी हुई जाती है, कोई आगे को झुक पड़ता है । वातावरण गर्म हो गया, पारा ज्वाला-बिन्दु पर आ पहुँचा है । मेहता शत्रुदल में घुसे । दल पीछे हटता चला जाता है । उनका संगठन इतना दृढ़ है कि मेहता की पकड़ या स्पर्श में कोई नहीं आ रहा है । बहुतों को आशा थी कि मेहता कम-से-कम अपने पक्ष के दस-पाँच आदमियों को तो जिला ही लेंगे, वे निराश होते जा रहे हैं ।

सहसा मिर्ज़ा एक छलाँग मारते हैं और मेहता की कमर पकड़ लेते हैं । मेहता अपने को छुड़ाने के लिए जोर मार रहे हैं । मिर्ज़ा को पाली की तरफ खींचे लिये आ रहे हैं । लोग उन्मत हो जाते हैं । अब इसका पता चलना मुश्किल है कि कौन खिलाड़ी है, कौन तमाशाई । सब एक गडमड हो गए हैं । मिला और मेहता में मल्लयुद्ध हो रहा है । मिर्ज़ा के कई बुड्ढे मेहता की तरफ लपके और उनसे लिपट गए । मेहता जमीन पर चुपचाप खड़े हुए हैं, अगर वह किसी तरह खींच-खीचकर दो हाथ और ले जाये, तो उनके पचासों आदमी जी उठते हैं, मगर वह एक इंच भी नहीं खिसक सकते । मिर्ज़ा उनकी गर्दन पर बैठे हुए हैं । मेहता का मुख लाल हो रहा हैं । आँखें बीर-बहूटी बनी हुई हैं । पसीना टपक रहा है, और मिर्ज़ा अपने स्थूल शरीर का भार लिये उनकी पीठ पर हुमच रहे हैं । मालती ने समीप जाकर उत्तेज़ित स्वर में कहा-मिर्ज़ा खुर्शेद, यह फेयर नहीं है । बाजी ज्ञान रही । खुर्शेद ने मेहता की गर्दन पर एक घस्सा लगाकर कहा-जब तक यह ‘चीं’ न बोलेंगे, मैं हरगिज न छोड़ेगा । क्यों नहीं ‘चीं बोलते? मालती ओर आगे बड़ी-‘चीं’ बुलाने के लिए आप इतनी जबरदस्ती नहीं कर सकते । मिर्ज़ा ने मेहता की पीठ पर हुमचकर कहा-बेशक कर सकता हूँ । आप इनसे कह दें,’चीं’ बोलें, मैं अभी उठा जाता हूँ ।
मेहता ने एक बार फिर उठने की चेष्टा की, पर मिर्ज़ा ने उनकी गर्दन दबा दी । मालती ने उनका हाथ पकड़कर घसीटने की कोशिश करके कहा-यह खेल नहीं, अदावत है । अदावत ही सही । आप न छोड़ेगी? उसी वक़्त जैसे कोई भूकम्प आ गया । मिर्ज़ा साहब जमीन पर पड़े हुए थे और मेहता दौड़े हुए पाली की ओर भागे जा रहे थे और हज़ारों आदमी पागलों की तरह टोपियाँ और पगडियाँ और छडियाँ उछाल रहे थे । कैसे यह कायापलट हुई कोई समझ न सका । मिर्ज़ा ने मेहता को गोद में उठा लिया और लिये हुए शामियाने तक आये । प्रत्येक मुख पर यह शब्द थे-डॉक्टर साहब ने बाजी मार ली । और प्रत्येक आदमी इस हारी हुई बाजी के एकबारगी पलट जाने पर विस्मित था । सभी मेहता के जीवट और धैर्य का बखान कर रहे थे ।
मज़दूरों के लिए पहले से नारंगियाँ मँगा ली गई थी । उन्हें एक-एक नारंगी देकर विदा किया गया । शामियानें में मेहमानों के चाय-पानी का आयोजन था । मेहता और मिर्ज़ा एक ही मेज पर आमने-सामने बैठे । मालती मेहता के बगल में बैठी । मेहता ने कहा-मुझे आज एक नया अनुभव हुआ । महिला की सहानुभूति हार को जीत बना सकती है । मिर्ज़ा ने मानती की ओर देखा-अच्छा! यह बात थी! जभी तो मुझे हैरत हो रही थी कि आप एकाएक कैसे ऊपर आ गए । मालती शर्म से लाल हुई जाती थी । बोली-आप बड़े बेमुरौवत आदमी हैं मिर्ज़ाजी! मुझे आज मालूम हुआ ।

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‘कुसूर इनका था । यह क्यों ‘चीं’ नहीं बोलते थे? मैं तो ‘चीं’ न बोलता, चाहे आप मेरी जान ही ले लेते । कुछ देर मित्रों में गप-शप होती रही । फिर धन्यवाद के और मुबारक़वाद के भाषण हुए और मेहमान लोग विदा हुए । मालती को भी एक विजिट करनी थी। वह भी चली गयी । केवल मेहता और मिर्ज़ा रह गए । उन्हें अभी रझान करना था । मिट्टी में सने हुए थे । कपड़े कैसे पहनते? गोबर पानी खींच लाया और दोनों दोस्त नहाने लगे । मिर्ज़ा ने पूछा-शादी कब तक होगी? मेहता ने अचम्भे में आकर पूछा-किसकी? आपकी । मेरी शादी! किसके साथ हो रही है? वाह! आप तो ऐसा उड़ रहे हैं गोया यह भी छिपाने की बात है ।’
‘नहीं-नहीं, मैं सच कहता हूँ, मुझे बिलकुल ख़बर नहीं है । क्या मेरी शादी होने जा रही है?
और आप क्या समझते हैं, मिस मालती आपकी कम्पेनियन बन कर रहेंगी?’ मेहता गंभीर भाव रो बोले-आपका ख्याल बिलकुल ग़लत है । मिर्ज़ाजी! मिस मालती हसीन हैं, खुशमिज़ाज हैं, समझदार हैं, रोशन ख़याल है और भी उनमें कितनी खूबियाँ है, लेकिन मैं अपनी जीवन-संगिनी में जो बात देखना चाहता हूँ, वह उनमें नहीं और न शायद हो सकती हैं । मेरे जेहन में औरत वफ़ा और त्याग की मूर्ति है, जो अपनी बेजाबानी से, अपनी कुर्बानी से, अपने को बिलकुल मिटाकर पति की आत्मा का एक अंश बन जाती है । देह पुरुष की रहती है पर आत्मा स्त्री की होती है । आप कहेंगे, मर्द अपने को क्यों नहीं मिटाता? औरत ही से क्यों इसकी आशा करता है? मर्द में वह सामर्थ्य ही नहीं है । वह अपने को मिटाएगा, तो शून्य हो जाएगा । वह किसी खोह में जा बैठेगा और सर्वात्मा में मिल जाने का स्वप्न देखेगा । वह तेज़प्रधान जीव है, और अहंकार में यह समझकर कि वह ज्ञान का पुतला है सीधा ईश्वर में लीन होने की कल्पना किया करता है । स्त्री पृथ्वी की भाँति धैर्यवान् है, शान्ति-सम्पन्न है, सहिष्णु! है । पुरुष में नारी के गुण आ जाते हैं, तो वह महात्मा बन जाता है । नारी में पुरुष के गुण आ जाते हैं, तो वह कुलटा हो जाती है । पुरुष आकर्षित होता है स्त्री की ओर जो सर्वांश में स्त्री हो । मालती ने अभी तक मुझे आकर्षित नहीं किया । मैं आपसे किन शब्दों में कहूँ कि स्त्री मेरी नज़रों में क्या है । संसार में जो कुछ सुन्दर है, उसी की प्रतिमा को मैं स्त्री कहता हूँ, मैं उससे यह आशा रखता हूँ कि उसे मार ही डालूँ तो भी प्रतिहिंसा का भाव उसमें न आये, अगर मैं उसकी अस्त्रों के सामने किसी स्त्री को प्यार करूँ तो, भी उसकी ईर्ष्या न जागे । ऐसी नारी पाकर मैं उसके चरणों में गिर पड़ेगा और उस पर अपने को अर्पण कर दूँगा । मिर्ज़ा ने सिर हिलाकर कहा-ऐसी औरत आपको इस दुनिया में तो शायद ही मिले । मेहता जी ने हाथ मारकर कहा-एक नहीं हज़ारों, वरना दुनिया वीरान हो जाती । ऐसी ही मिसाल दीजिए । मिसेज खन्ना को ही ले लीजिए । लेकिन खन्ना! खन्ना अभागे हैं, जो हीरा पाकर काँच का टुकड़ा समझ रहे हैं । सोचिए, कितना त्याग है और उसके साथ ही कितना प्रेम है । खन्ना के रूपासक्त मन में शायद उसके लिए रत्ती-भर भी स्थान नहीं है; लेकिन आज खन्ना पर कोई आफत आ जाय, तो वह अपने को उन पर न्योछावर कर देगी । खन्ना आज अन्धे या कोढ़ी हो जायँ, तो भी उसकी वफादारी में फर्क न आएगा । अभी खन्ना उसकी कूद नहीं कर सकते हैं, मगर आप देखेंगे, एक दिन यही खन्ना उसके चरण धो-धोकर पिएंगे । मैं ऐसी बीवी नहीं चाहता, जिससे मैं आइंस्टीन के सिद्धान्त पर बहस कर सकूँ, या जो मेरी रचनाओं में भूप। देखा करें । मैं ऐसी औरत चाहता हूँ, जो मेरे जीवन को पवित्र और उज्ज्वल बना दे-अपने प्रेम और त्याग से । खुर्शेद ने दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए जैसे कोई भूली हुई बात याद करके कहा-आपका ख्याल बहुत ठीक है मिस्टर मेहता! ऐसी औरत अगर कहीं मिल जाय, तो मैं भी शादी कर लूँ, लेकिन मुझे उम्मीद नहीं है कि मिले । मेहता ने हँसकर कहा-आप भी तलाश में रहिए, मैं भी तलाश में हूँ । शायद कभी तकदीर जागे । मगर मिरर मालती आपको छोड़ने वाली नहीं । कहिए लिख दूँ । ऐसी औरतों से मैं केवल मनोरंजन कर सकता हूँ, ब्याह नहीं । ब्याह तो आत्मसमर्पण है।, अगर ब्याह? आत्मसमर्पण है तो प्रेम क्या है? प्रेम जब आत्मसमर्पण का रूप लेता है, तभी ब्याह है; उसके पहले ऐयशी है । मेहता ने कपड़े पहने और विदा हो गए । शाम हो गई थी । मिर्ज़ा ने जाकर देखा, तो गोबर अभी तक पेड़ों को सींच रहा था । मिर्ज़ा ने प्रसन्न होकर कहा-जाओ अब तुम्हारी छुट्टी है । कल फिर आओगे? गोबर ने कातर भाव से कहा-मैं कहीं नौकरी चाहता हूँ मालिक! नौकरी करना है, तो हम तुझे रख लेंगे । कितना मिलेगा हुजूर? जितना तू माँगे । मैं क्या मांगू । आप जो चाहे दे दें । हम तुम्हें पन्द्रह रुपये देंगे और खूब कसकर काम लेंगे । गोबर मेहनत से नहीं डरता । उसे रुपये मिले, तो वह आठों पहर काम करने को तैयार है । पन्द्रह रुपये मिलें, तो क्या पूछना । वह तो प्राण भी दे देगा । बोला-मेरे लिए कोठरी मिल जाय, वहीं पड़ा रहूँगा । हाँ-हाँ, जगह का इन्तजाम मैं कर दूँगा । इसी झोपड़ी में एक किनारे तुम भी पड़ रहना । गोबर को जैसे स्वर्ग मिल गया ।

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