Summary: दादी से बनारस को अलग पहचान
ग्राहक नीचे से आवाज़ लगाते हैं और दादी ऊपर से बाल्टी के सहारे सामान भेज देती हैं, जिससे यह अनोखी किराने की दुकान सोशल मीडिया पर चर्चा में आ गई। दादी खिड़की से दुकान चलाकर साबित कर रही हैं कि यहां कारोबार भी अपने अलग अंदाज़ में होता है।
Varanasi Dadi Ki Dukaan: बनारस… या कहिए काशी। यह शहर जितना पुराना है, उतना ही रंगीन भी। यहां हर गली, हर मोड़ पर कोई न कोई कहानी मिल जाती है। कोई घाटों की सीढ़ियों पर सुकून ढूंढता है, कोई गंगा आरती में श्रद्धा, तो कोई कचौड़ी-सब्ज़ी में स्वाद। इन सबके बीच बनारस की एक संकरी गली में ऐसी दुकान भी है, जो अपनी सादगी और जुगाड़ से लोगों का दिल जीत रही है।
यह दुकान ज़मीन पर नहीं है… पहली मंज़िल की खिड़की से चलती है। जगह है रामघाट के पास की संकरी गली… जिसे सूत टोला कहा जाता है। यहां एक बुज़ुर्ग दादी अपनी छोटी-सी किराने की दुकान चलाती हैं। न कोई चमक-दमक, न बड़े-बड़े बोर्ड। रोज़मर्रा का सामान जैसे बिस्कुट, नमकीन, साबुन, तेल जैसी चीज़ें। लेकिन तरीका ऐसा कि देखते ही लोग मुस्कुरा दें।
ग्राहक नीचे गली में खड़े होकर आवाज़ लगाते हैं। दादी ऊपर से झांकती हैं, सामान चुनती हैं और फिर बाल्टी या डोरी के सहारे नीचे भेज देती हैं। सामान पहुंच जाता है, लेन-देन हो जाता है और काम खत्म। न सीढ़ियां चढ़ने की ज़रूरत, न दुकान में घुसने की। बनारस की भाषा में कहें तो… “काम एकदम सेट”।
इस अनोखी दुकान का वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर होते ही वायरल हो गया। वीडियो शेयर करने वाले कंटेंट क्रिएटर ने लिखा, “बनारस की एक संकरी गली में यह दुकान पहली मंज़िल पर है। इसे एक बुज़ुर्ग दादी चलाती हैं। ग्राहक नीचे से आवाज़ देते हैं और दादी खिड़की से सामान भेजती हैं। यही है बनारस, जहां पहली मंज़िल की दुकान की भी अपनी पहचान है।”
वीडियो पर लोगों के कमेंट भी कम मजेदार नहीं हैं। एक यूज़र ने लिखा कि मणिकर्णिका घाट के पास उन्होंने भी ऐसी ही एक दुकान देखी थी, जहां नीचे से आवाज़ लगाने पर ऊपर से जवाब मिलता था। उन्होंने बताया कि वहां नीचे ज़मीन पर पायल और छोटे गहने मिलते थे, लेकिन असली “दुकानदार” ऊपर रहती थीं। एक और यूज़र ने हंसते हुए सलाह दे दी… “दादी को पहले पैसे ले लेने चाहिए।”
यही तो बनारस है…
दरअसल, यही तो बनारस की खासियत है। यहां भरोसा अभी ज़िंदा है। ग्राहक भी जानते हैं और दुकानदार भी कि सामने वाला बेईमानी नहीं करेगा। दादी की यह दुकान किसी बड़े बिज़नेस मॉडल का हिस्सा नहीं है, लेकिन इसमें ज़िंदगी की समझ और अनुभव साफ झलकता है। उम्र के इस पड़ाव पर सीढ़ियां चढ़ना आसान नहीं, तो दादी ने अपने हिसाब से रास्ता निकाल लिया… खिड़की ही काउंटर बन गई। इसी बीच बनारस एक और नए बदलाव की ओर बढ़ रहा है। शहर में जल्द ही काशी रोपवे शुरू होने जा रहा है, जो देश का पहला पब्लिक ट्रांसपोर्ट रोपवे होगा। यानी एक तरफ हाईटेक ट्रांसपोर्ट और दूसरी तरफ पहली मंज़िल की खिड़की से चलती दादी की दुकान। यह शहर परंपरा और जुगाड़, श्रद्धा और सादगी, तकनीक और ठेठपन… सबको एक साथ जीता है। शायद इसी वजह से बनारस हर बार कुछ नया दिखा देता है, बिना ज़्यादा शोर किए, बस अपने अंदाज़ में।
