Crime Story: मुंबई की बरसात भले ही शहर को भीगा दे, लेकिन कुछ लोगों की प्यास कभी नहीं बुझती। होटल ब्लू ओशन के सुइट नंबर 706 में नीली रोशनी के बीच एक सिल्क की चादर पर दो जिस्म लिपटे हुए थे। नेहा की साँसें तेज़ हो रही थीं, और समीर की उंगलियाँ उसके बालों में उलझी थीं।
“तुम्हें डर नहीं लगता?” नेहा ने उसके कान में फुसफुसाया।
समीर ने हल्की हँसी हँसी, “डर और मैं? कभी नहीं।”
नेहा मुस्कुराई, लेकिन उसकी आँखों में कुछ छिपा था—एक रहस्य, एक साज़िश।
अगली सुबह, जब होटल के स्टाफ ने दरवाज़ा खटखटाया, तो कोई जवाब नहीं मिला। जबरदस्ती दरवाज़ा खोला गया, और जो उन्होंने देखा, उससे उनकी रूह काँप गई।
समीर का नंगा जिस्म बेड पर पड़ा था—गले पर एक धारदार ब्लेड से गहरा चीरा। खून से पूरा बिस्तर लाल हो चुका था। मगर नेहा कहीं नहीं थी।
पुलिस आई, सबूत इकट्ठा किए गए, लेकिन कमरे में किसी बाहरी शख्स के आने का कोई निशान नहीं था। CCTV कैमरों में सिर्फ़ नेहा और समीर अंदर जाते दिखे थे—लेकिन बाहर जाते हुए सिर्फ़ नेहा नहीं, बल्कि एक नकाबपोश महिला दिख रही थी।
इंस्पेक्टर आदित्य को केस सौंपा गया। जब उन्होंने नेहा के बारे में पता लगाया, तो चौंकाने वाली जानकारी मिली—नेहा का असली नाम नीलम था, और वह पहले भी दो पुरुषों के कत्ल के मामलों में संदिग्ध रह चुकी थी। लेकिन हर बार सबूतों की कमी से वह बच निकलती थी।
आदित्य ने नेहा को ट्रैक किया और एक बार फिर वही नज़ारा देखा—एक और मर्द उसके जाल में फँस चुका था। इस बार उसका शिकार एक बिजनेसमैन था, जो उसी होटल में ठहरा था।
“अब और नहीं!” आदित्य ने ग़ुस्से में कहा और नेहा को रंगे हाथ पकड़ने का प्लान बनाया।
रात के अंधेरे में जब नेहा अपने शिकार को बेहोश करने वाली थी, दरवाज़ा टूट पड़ा। पुलिस अंदर घुस गई। आदित्य ने उसे पकड़ लिया, लेकिन नेहा मुस्कुराई, “इंस्पेक्टर, क्या आप जानते हैं कि मैं ऐसा क्यों करती हूँ?”

“तुम्हारे मन में नफरत है!” आदित्य ने ग़ुस्से से कहा।
नेहा ने उसकी आँखों में देखा और धीरे से फुसफुसाई, “नफरत नहीं, प्यास! मेरी माँ को मेरे पिता ने मारा था। वो भी ऐसे ही एक होटल रूम में। मैं हर उस आदमी को मारती हूँ जो औरतों को सिर्फ़ इस्तेमाल करना चाहता है।”
“लेकिन क़ानून तुम्हारी इस वहशी भूख को नहीं मानेगा,” आदित्य ने हथकड़ी पहनाते हुए कहा।
नेहा सिर्फ़ मुस्कराई, “शायद! लेकिन कुछ हसरतें कभी खत्म नहीं होतीं।”
