इश्क का जाल-गृहलक्ष्मी की कहानियां
Ishaq ka Jaal

Hindi Kahani: उसे रंग पसन्द नही थे,कोई भी रंग।कोई भी रंग समझते हैं न… रंगों से परहेज तो इतना था कि वो शर्बत भी नींबू का पीते थे… एकदम फीका।ऐसा नहीं था कि किसी डॉक्टर ने मना किया था या फिर कोई एलर्जी पर कुछ तो था। बटुक नाथ होली के नाम पर बिदक जाते और हत्थे से उखड़ जाते।वैसे हमारे बटुक भाई पहले ऐसे रूखे-सूखे से नहीं थे। रंगों से उन्हें बेहद प्यार था,फागुन आते ही फगुवा उन पर चढ़ जाता।महीनों से तैयारी होती,बाकायदा खरीदारी होती।ऐसे-ऐसे रंग ढूंढ कर लाते कि महीनों रगड़ते रह जाओ चमड़ी छिल जाए पर रंग नहीं छूटता था।
लाल-पीले रंगों से पुते बटुक भाई पूरे रंगे सियार से दिखते।आँखों पर रंगीन चश्मा,सर पर तिरछी टोपी,
सफेद कुर्ता पायजामा भई वाह…वैसे इस बार उन्होंने ख़ास तैयारियाँ की थी। मौसम के साथ-साथ उनका मन भी रूमानी हो रहा था। होना भी था पड़ोस में आई उस सुंदर बाला को देख वो बिन पानी मछली की तरह छटपट-छटपटा रहे थे।इश्क का मायाजाल ऐसे महीन धागे से बना होता है जिससे निकलना बड़े-बड़े शूरवीरों के लिए भी नाममुकिन होता है।फिर ये तो भाई बटुकनाथ ही थे।जिनका दिल इतना कमजोर था की पेण्डुलम की तरह हर बाला को देख फुदकने लगता था।कभी-कभी लगता वो अपना दिल हथेलियों पर लिए फुदकता रहता है।

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सम्भवतः वह बचपन में बॉलीबाल के अच्छे प्लेयर रहें होंगे शायद इसलिए बचपन की आदत वह अभी तक नही भूल पाए थे बस फर्क इतना ही था कि इस बार बॉल की जगह वो दिल उछाल रहे थे।हाँ ये बात अलग था कि इस बार निशाना लाख कोशिशों के बावजूद चूक जा रहा था पर इस बार उन्होंने कमरकस ली थी। सोच लिया था इस बार होली पर पड़ोसी के किराएदार की उस सुंदर बाला से अपने दिल का हाल बयाँ कर ही देंगे पर उन्हें क्या पता था कि सर मुड़ाते ही ओले पड़ जाएंगे। तो हुआ यूँ कि बटुकनाथ उस सुंदर बाला को इम्प्रेस करने के चक्कर में अपनी लम्बाई से भी ऊँची पिचकारी लिए छत पर सवार हो गए।
हमले की तैयारी जोरों-शोरो से थी।मौका मिलते ही उन्होंने ये sss….जोगी रा सरर्रा।उनके चेहरे की विजयी
मुस्कान देखते ही बन रही थी।
“बुरा न मानो होली है।”
कह कर बटुक जी मुस्कुरा दिए।
बगुले सी सफेद सलवार-कमीज में लिपटी वह सुंदर बाला छत पर बाल सूखा रही थी।अचानक हुए इस हवाई हमले से अचकचा गई। उनके मासूम चेहरे पर पसरे डर को देख बटुक भाई अपनी बत्तीसी और जबड़े के साथ खिलखिला कर हँस दिए।मोहतरमा ठंडे पानी की वजह से कांप रही थी पर गुस्से से उनका चेहरा तप रहा था।
उन्होंने बटुक जी को भर-भरकर बातें सुनाई।बटुक का मासूम दिल टुकड़े-टुकड़े हो गया। सारे अरमानों और सपनों पर पानी फिर गया।बटुक ने उस दिन से कान पकड़ लिए …बस और क्या वो दिन था और आज का
दिन पर उनके बिदकने और उखड़ने से होली को आने से तो कोई नहीं रोक सकता था तो भाई हर साल की तरह इस साल भी होली धूम-धड़ाके और गाजे-बाजे के साथ आ गई।
चारों तरफ होली का माहौल था। कहीं दूर हवाओं के पंखों पर सवार होकर गाने के बोल उसके कानों में आकर टकरा गए। आज न छोड़ेंगे हम हमजोली खेलेंगे हम होली…
“हूँ sss”
बटुक जी ने बुरा सा मुँह बनाया और अपने सफेद झक्क से कुर्ते पर नजर डाली।छः साल से लगातार वह यही कुर्ता-पायजामा पहन रहे थे पर मजाल है कि किसी ने उन पर रंग भी डाला हो।हिम्मत ही नहीं थी।हिम्मत होती भी तो कैसे उनके मन-मस्तिष्क में तो एक ही गाना “ये लाल रंग कब मुझे छोड़ेगा” फुल डॉल्बी साउंड के साथ बज रहा था।
उन्होंने झट से हाथ बढ़ाकर दरवाजे को बंद कर दिया। हवा के रथ पर सवार स्वर लहरियों पर मानो अचानक से किसी ने तेज़ी से ब्रेक लगा दिया पर आवाजें भी मानो नहा-धोकर बटुकनाथ के पीछे पड़ गई थी।दरवाजों और खिड़कियों से गाने की आवाज़ छन्न कर आ रही थी। बटुक जी खिसियाए से बैठे हुए थे। पर बटुकनाथ का दिल उनके इस त्याग को स्वीकार करने को तैयार नहीं था। मन बार-बार भटक कर उसी गली तक पहुँच जाता। बटुकनाथ ने सबकी नजरों से बचकर दरवाजे के पट को धीरे से खोला।तभी लहराता हुआ एक गुब्बारा उनके शानदार सफेद कुर्ते को भिगोकर चला गया।बटुकनाथ कुछ समझ पाते तब तक वह भीग चुके थे। बटुकनाथ ने गुस्से से दरवाजे को खोला। सामने एक सुंदर बाला अपने हाथों में पानी भरे गुब्बारे और गुलाल लिए खड़ी थी। कुछ दिनों पहले ही पड़ोस में रहने आई थी।उसकी आँखों मे एक शरारत थी।
उसने अपनी आँखों को गोल गोल घुमाकर कहा
“मैं सुबह से देख रही हूँ।आप यूँ सूखे-सूखे टहल रहे है।होली का दिन वो भी यूँ सूखे-सूखे…दिस इस नॉट फेयर “
बटुक जब तक कुछ समझते उसने उन के गालों पर गुलाल मल दिया। बटुक धीरे से बुदबुदाए “हैप्पी होली”
आज उनकी होली सचमुच हैप्पी हो गई थी।इश्क के माया जाल में दूसरों को फँसाते-फँसाते वह खुद फंस चुके थे।