Hindi Kahani: जब मेरा दाखिला कक्षा 9वी में कराया गया नया स्कूल था घर से ज्यादा दूर था इसलिए मुझे एक साइकिल दिलाई गई
स्कूल के पहले दिन मेरे पापा मुझे छोड़ने गए मैं साइकिल पर थी और पापा मेरे साथ-साथ मोटरसाइकिल से थे और मुझे सही से रोड पर चलना बता रहे थे धीरे-धीरे साइकिल चलाते हुए मैं और मेरे पापा दोनों स्कूल के गेट पर पहुंच गए…
स्कूल के गेट पर बहुत सारी चीजों के ठेले लगे हुए थे जिन पर इमली कैथा हरी इमली अमरख और आलू की टिक्की पानी बतासा बिक रहे थे
बहुत सारी मेरी ही हम उमर लड़कियां ने सबसे ज्यादा भीड़ इमली कैथा के ठेले पर लगा रखी थी अच्छी खासी भीड़ थी वैसे भी लड़कियां मीठा कम खट्टा और चटपटा ज्यादा पसंद करती हैं।
मैं और मेरे पापा गेट पर रुके मैं साइकिल से उतर के खड़ी हो गई तब मुझे मेरे पापा ने समझाया इमली कैथा जो खट्टे थे बोले इससे हमारे स्वास्थ्य को हानि होती है। एसिड बनता है ।यह चीज स्वास्थ्यवर्धक नहीं है। कभी कबार खा सकते हैं ।बोले अगर तुम्हें खाना है ।तो हमेशा फ्रूट अमरूद केला सेब खाना और इन चीजों को कभी कबार ही ले लेना मैंने अपने पापा की बात को गांठ बांध लिया
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यह सिलसिला काफी समय तक चलता रहा मैंने कभी भी इमली कैथा को हाथ नहीं लगाया हमेशा फ्रूट खरीदती या आलू की टिक्की लेती अपनी पॉकेट से… अपनी पॉकेट मनी को भी बचा कर रखती जो मम्मी पापा से मिलती थी
ऐसे ही एक दिन की बात है ।हमारी छुट्टी हुई थी हम गेट से निकल रहे थे स्कूल में बहुत संख्या में छात्राएं पढ़ती थी तो सभी बहुत जल्दी-जल्दी निकलते यह मानिए कि कभी कबार हम गिर भी पडते… किस लिए सोचती कि सारे निकल जाएंगे तो आराम से बाद में निकलूंगी
जैसे ही मैंने अपनी साइकिल निकली उस दिन मै सबसे पीछे थी सारी लड़कियां निकलती जा रही थी मैं भी निकलने वाली थी कि गेट के किनारे पर एक बूढ़े बाबा बैठे हुए थे जिनकी उम्र 75,76 वर्ष करीब रही होगी
कपड़े भी थोड़े गंदे से पहने थे और छोटा सा तराजू लिए थे और एक लकड़ी की टोकरी थी उसमें शहतूत रखे थे शहतूत एक प्रकार का फल होता है। यह फल मुझे भी कभी पसंद नहीं आया लेकिन जैसे ही मैंने बाबा की तरफ देखा अनायास ही उनकी बेबस आंखें मुझसे कुछ कह रही थी
मैं वही साइकिल लेकर रुक गई मैंने बाबा की आंखों की तरफ देखा तो मुझे लगा यह शायद बहुत बड़ी मुसीबत में है ।और वह मुझे कुछ कहना चाह रहे हैं। जब मैं रुक गई तो बाबा बोले बिटिया यह शहतूत ले लो… सुबह से बैठा हूं कोई लेने नहीं ही आया… बहुत अच्छे हैं।… बेटा मुझे पैसों की बहुत जरूरत है।
मैंने अपनी स्कर्ट की पॉकेट में हाथ डाला तो उसमें केवल ₹20 थे… मैंने बाबा को ऐसे ही देना चाह लेकिन बाबा बहुत स्वाभिमानी थे बोले नहीं बेटा यह सभी तुम ले लो उनकी डलिया में जितने भी शहतूत थे उन्होंने सब भर के मुझे दे दिए
₹20 के बदले उन्होंने मुझे करीब ₹40 के शहतूत दे दिए होंगे जो मुझे ठीक नहीं लग रहा था मैंने मना भी किया लेकिन बाबा बड़े खुश थे खुशी-खुशी सारे शहतूत मुझे दे दिए और अपना तराजू उठाया ₹20 जेब में डालें और न जाने कितनी दुआएं देते हुए वह आगे निकल गए
मैं उनकी पीठ को देखते रही कि मेरे ₹20 देने पर बाबा की न जाने कितनी मदद हो गई बाबा की चाल में अब एक फुर्ती थी
मेरे ₹20 उसे सन् 1996 में ठीक-ठाक अहमियत रखते होंगे शायद उनके काम आ गए होंगे और मुझे उन ₹20 के बदले शहतूत और इतनी दुआएं मिली जो आज भी मुझे किसी भी बड़ी मुसीबत से बाहर निकाल लेती हैं ।जब मैं मुसीबत से बाहर आती हूं ।तो कहीं ना कहीं एक बार मन में सोचने लगती हूं।कि वह बाबा की दुआएं ही मुझे इतनी काम आ रही है। और मुझे लगता है। वह शहतूत बेचने वाले बाबा का आशीर्वाद सदा मेरे साथ रहता है। मैंने तो पैसों के बदले शहतूत लिए थे इससे बाबा का भी स्वाभिमान बचा रहा और मदद भी हो गई…
इस पूरी कहानी के पीछे मेरे माता पिता की बहुत बड़ी सीख हमेशा मेरे साथ रही मेरे पिता ने सदैव जरूरतमंद की मदद की और दूसरे की मुसीबत तकलीफ को समझते आए हैं और हमें भी यही सिखाया… और बेबस आंखों को पढ़ना सिखाया है।
यह कहानी बिल्कुल सत्य है। आज भी कई स्वाभिमानी लोग होते हैं जो फ्री में लेना पसंद नहीं करते तो ऐसे कुछ बेबस लोगों की बेबसी को समझ कर उन चीजों को भी कभी कबार खरीद लेना चाहिए जिनकी हमें आवश्यकता ना होऔर उनकी मुसीबत में थोड़ा सा सहारा दे दे। लोगों की बेबस आंखों को पढ़ना सीखें.. यथासंभव मदद भी करें..
