मां बाप दोनों में से कोई एक फार्म भर रहा था और दूसरा बच्चे को रंगों, जानवरों, फलों के नाम सिखाने की कोशिश में था। कोई ‘बच्चों की कवितायेँ’ बच्चों से सुनने की चेष्टा में था। बड़ा ही रोचक सा नज़ारा था। मेले जैसा माहौल था, जहां लोग एक अजीब से तनाव से ग्रस्त थे, वहीँ बच्चे यहां वहां भाग रहे थे या फिर अपने मातापिता से मनमानी चीजें पाने की कोशिश में थे। कुछ झूलों पर खेलने की जिद कर रहे थे तो  कुछ ज़मीन पर लोटना चाहते थे। कुछ तो बेचारे अपने मम्मी पापा की गोद में दुबक कर सो भी रहे थे। मां बाप बच्चों को बहुत लालच भी दे रहे थे।

यह नज़ारा था एक बड़े स्कूल के  नर्सरी कक्षा 3-4 वर्ष-के बच्चों के एडमिशन का। तेज़ रफ़्तार से बढते इस युग की सबसे बड़ी कीमत तो शायद इन बच्चों को ही चुकानी पड़ती है। समय के साथ साथ मुश्किलें भी बढ़ती जा रही हैं और सामाजिक दरारें भी। अंधाधुंध दौड़ में बचपन तो खो सा  ही गया है। इसी उम्र से शुरू हो जाता  है तनाव का एक कभी न ख़त्म होने वाला दौर।

सुनील और शिक्षा की ख़ुशी की कोई सीमा न रही जब उन्हें अमित के दाखिले का पत्र स्कूल से प्राप्त  हुआ। दोनों ने चैन की सांस ली। अगले ही दिन  जा कर स्कूल में प्रवेश संबंधी सभी कार्यवाही पूरी कर आये। अमित के लिए स्कूल की ड्रेस, पुस्तकें इत्यादि भी ले आये। अगले सप्ताह से स्कूल खुलने वाले थे। चूंकि स्कूल उनके घर के पास ही था, अमित को स्कूल छोड़ने की जिम्मेदारी सुनील के पिताजी ने अपने ऊपर ले ली।

अब क्या था, हर दिन अमित दादाजी के साथ स्कूल जाता, वहां खूब खेलता और घर आते समय अपना मनचाहा बिस्कुट-टॉफी लेना भी न भूलता था। रास्ते में अपने सारे दिन की घटनाएं वह दादाजी को सुनाता। दोनों ही ख़ुशी में झूमते हुए घर में आते। वक्त का पहिया इसी तरह तेजी से घूम रहा था।

समय के साथ साथ अमित बड़ा हो गया। आज वह आई. आई. टी. में प्रवेश के लिए जा रहा था। उसके माता-पिता को उसके आईआईटी में चुने जाने की खुशी थी। खुश तो दादाजी भी थे, लेकिन फिर भी वे अपने को संभाल ही नहीं पा रहे थे। सोच रहे थे कि कैसे रहेंगे वे अपने इस नन्हे दोस्त के बिना? और यही सोच कर आंसू उनकी आंखों से रुक ही नहीं रहे थे। वे सोचने लगे कि समय यूं ही खुद को दोहराता है। जैसे कल की बात थी, जब उन्होंने सुनील को आई. आई. टी. में भेजा था और आज उसके बेटे को भेज रहे थे। धीरे-धीरे सभी उनसे दूर हो जाएंगे।

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