झूठ या प्रतिज्ञा-गृहलक्ष्मी की कहानियां
Jhuth ya Pratigya

Hindi Story: “मुझे माफ कर दो मां, आज के बाद मैं कभी भी चोरी नहीं करूंगा।” अमर अपनी मां शकुंतला से कहता है। शकुंतला कहती है, “सिर्फ चोरी नहीं बल्कि प्रतिज्ञा कर के आज के बाद से तू कभी भी मुझसे झूठ नहीं बोलेगा। कोई ऐसी बात नहीं करेगा जिससे मुझे दुख पहुंचे और हमेशा एक सच्चा देशभक्त बनके रहेगा।” “मैं प्रतिज्ञा करता हूं मां ऐसा कोई काम नहीं करूंगा।” अमर अपनी मां का हाथ पकड़ कर प्रतिज्ञा लेता है।
शकुंतला गोली गांव में रहने वाली एक साधारण सी औरत थी। गांव में कपड़ा बनाने की फैक्ट्री में काम करके अपना घर चलाती और अमर की पढ़ाई का खर्चा उठाती थी। वह अच्छी मां ही नहीं जिसने अपने बेटे को अच्छी पढ़ाई और संस्कार दिए बल्कि एक सच्ची देशभक्ति भी थी।
जब उसकी शादी अमर के पिता सुरेन्द्र से हुई तो बहुत खुश थी। उसे लगा था जैसे सारा जहां उसे मिल गया है। सुरेंद्र उसका बहुत ध्यान रखता था और उससे बहुत प्यार भी करता था। अमर के पैदा होने के वक्त उसने घर, शकुंतला और अपना काम बहुत अच्छे से संभाला था। स्वर्ग जैसा सुंदर माहौल था उसके घर में।
तभी एक दिन जब सुरेंद्र घर में नहीं था तो पुलिस उसके बारे में पता करने आती है। “सुरेंद्र कहां है?” पुलिस वाला पूछता है। “वह घर में नहीं है। आपको क्या काम है?” शकुंत्ला जवाब देती है। “तुम्हारा पति एक देशद्रोही है। उसने देश के बहुत बड़े दुश्मन का साथ दिया है। कल जो पास के शहर में बम फटा था जिसमें कईं लोगों ने अपनी जान गवांई और कईं घायल हुए, उसमें तुम्हारे पति का भी हाथ था। जल्दी बताओ वह कहां है।” शकुंतला चौंक जाती है। वो कहती है, “जब वह आएंगे मैं आपको खुद ही ख़बर कर दूंगी।” सुरेंद्र के घर पर न मिलने पर पुलिस उस वक्त वहां से चली जाती है। कुछ देर बाद जब सुरेंद्र वापस लौटता है तभी पुलिस उसे धर दबोच लेती है।

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शकुंतला के सामने सुरेंद्र अपना गुनाह कबूल कर लेता है। “मुझे माफ कर दो शकुंतला, मैंने पैसों की खातिर यह काम किया। मैं बुरा आदमी नहीं हूं। उतना बड़ा हादसा होगा मुझे नहीं पता था।” शकुंतला मौन रहती है, वह कुछ कह नहीं पाती और पुलिस उसके सामने ही सुरेंद्र को पकड़ कर ले जाती है। उसके बाद से शकुंतला ने सुरेंद्र की शक्ल भी नहीं देखी थी। पता चला था कि कुछ साल बाद वह जेल से छूट गया था। लेकिन ना तो वह घर आया और न ही शकुंतला ने पता करने की कोशिश की थी।
आज जब अमर ने पहली बार चोरी करी तो वह डर गई थी कि अमर कहीं अपने पिता के नक्शे कदम पर न चलने लगे।
अमर बढ़ती उम्र का बच्चा था। वह ज़्यादा बड़ा नहीं था पर बचपन से उसने अपनी मां को मेहनत करते देखा था। इसलिए अपनी उम्र से वह कहीं ज़्यादा समझदार बच्चा था।
एक दिन अमर देर रात को अपने कमरे में बैठा पढ़ रहा था। कुछ दिनों बाद उसके इम्तहान शुरू होने वाले थे। शकुंतला दूसरे कमरे में सो रही थी। अमर को लगा उसकी खिड़की के पास कोई है। वह थोड़ा डर ज़रूर गया था पर उसने फिर भी टोर्च की मदद से बाहर जाकर देखा तो वह चौंक गया। बाहर उसके पिता ज़ख्मी हालत में दीवार के सहारे खड़े थे। अमर ने दरवाज़ा खोला और उनको अंदर आने में मदद करी। उसने अपने पिता को आराम से चारपाई पर लिटाया और उनके लिए पानी लेने गया। पहले तो उसने सोचा की मां को उठाता हूं पर वह डर गया की मां ना जाने कैसे प्रतिक्रिया करेंगी। कहीं वह पिताजी के इलाज को मन ना करके पुलिस को ही ना बुला लें। वह उसी कश्मकश में था कि पिता के कराहने की आवाज़ आती है। उसने कमरे का दरवाज़ा बंद करा और पिता को पानी पिलाया। अमर दवाई का डिब्बा लेकर आता है। रूई से उनके ज़ख्मों को साफ करता और फिर दवाई के डब्बे से ट्यूब निकालता है। दवा लगाने से पहले वह पिता के कपड़े बदलने में मदद करता है। अपना कुर्ता पजामा निकलता है और उनको पहनने में मदद भी करता है। उसके कपड़े पिताजी को करीब करीब अच्छे से आ जाते हैं। अमर पिता के फटे कपड़ों को पलंग के नीचे रखकर उनको दवाई लगाता है।
अमर की इतनी सेवा से सुरेंद्र का दिल भर आता है, “मुझ जैसे बुरे पिता की कोई इतनी सेवा कैसे कर सकता है। तुझे और तेरी मां को सिवाय दुख के मैंने कुछ नहीं दिया। आज भी मैं पुलिस के हाथों ही ज़ख्मी हुआ हूं। कभी भी पकड़ा या मारा जा सकता हूं। अमर पिता का हाथ पकड़ कर कहता है, “ पिताजी मैं सब जानता हूं, लेकिन आप मेरे पिता भी हैं। आपको इस हालत में मैं अकेला नहीं छोड़ सकता था। आपने आज तक जो भी कुछ करा वह सब गलत किया लेकिन आपकी तरफ जो मेरा फ़र्ज़ है उसे मैं निभाऊंगा। आप रूकिए, मैं आपके लिए कुछ खाने को लाता हूं।” अमर अपने पिता के लिए रसोई से चुपचाप खाना लाता है। खाना खाकर और थोड़ा आराम करके मुंह अंधेरे ही सुरेंद्र चला जाता है। रात भर का जगा हुआ अमर थक कर सो चुका था। जब उठता है तो उसको अपने पिता वहां नहीं दिखते। सुबह जब शकुंतला सफाई के लिए उसके कमरे में आती है तब पलंग के नीचे उसे कपड़े दिखते हैं। वह समझ नहीं पाती कि वह किसके कपड़े हैं। वह सोचती हैं, “जब अमर स्कूल से आएगा तब पूछूंगी।”
स्कूल से आते ही मां के कुछ कहने से पहले ही अमर उसको सारी बात सच-सच बता देता है। शकुंतला सुनकर स्तब्ध रह जाती है। वह अमर से कुछ नहीं कहती और चुपचाप अपने काम में लग जाती है। एक तरफ तो उसकी मां यह सोचकर दुखी था कि उसके बेटे ने उसे झूठ बोला था लेकिन दूसरी तरफ यह सोचकर मन में सुकून भी था कि अमर ने एक अच्छे बेटे होने का फर्ज़ निभाया था। कुछ दिनों तक वह ऐसे ही चुपचाप अपने काम में लगी रहती है। एक दिन अमर बेचैन होकर मां से पूछ लेता है “मां आप उससे नाराज़ हैं? मैंने प्रतिज्ञा तोड़ी, आपसे झूठ बोला। मैं तो बस एक अच्छे बेटे का फर्ज़ पूरा कर रहा था एक पिता की तरफ। आपसे सच छुपाया, झूठ बोला और अपनी प्रतिज्ञा तोड़ी। मुझे जो चाहे सज़ा दो मां पर मुझसे बात करो। मुझे क्षमा करो मां।” शकुंतला रोते हुए कहती है, “ प्रतिज्ञा तोड़ना गलत है बेटा लेकिन हालात को देखते हुए तेरा झूठ प्रतिज्ञा पर भारी है। तूने फ़र्ज़ की खातिर झूठ बोला। एक इंसान की मदद के लिए झूठ बोला, पर तूने खुद ही मुझे सारी बातें अपने आप बता दीं। इस तरह तूने अपने प्रतिज्ञा भी कायम रखी। मुझे तुझसे कोई शिकायत नहीं है।”
कुछ दिन बाद शकुंतला और अमर को कहीं से खबर मिलती है कि पुलिस के साथ मुठभेड़ में सुरेंद्र की मौत हो जाती है। शकुंतला चुपचाप प्रभु के सामने हाथ जोड़कर बस खड़ी रह जाती है।