मां इतनी सुन्दर, इतनी गोरी चिट्टी, उसे खुद पर गर्व हो आया था कि उसकी मां सबसे सुन्दर और सबसे प्यारी है…। सुबह हो या शाम, उसने खुद को मां की ही गोद में पाया, फिर अचानक ऐसा क्या हो गया कि मां उसे बिना बताए ही चली गई।
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इज्ज़त या आत्मसम्मान – गृहलक्ष्मी कहानियां
डाइनिंग हॉल में बैठकर परिवार के सभी लोग नाश्ता कर रहे थे । मेहता जी एवं उनके बेटों के बीच बड़ी-बड़ी बातें हो रहीं थीं, कभी कॉरपोरेट ऑफिस तो कभी सुप्रीम कोर्ट तो कभी विधान सभा के मसलों पर और सुझाव दिए जा रहे थे।
गृहलक्ष्मी की कहानियां : मां तो मां ही होती है
मेरे पड़ोस के घर आज 4-6 दिन हुये पोता हुआ। सब बड़े ही खुश हैं, मैं भी अपने काम जल्दी निपटा कर जाना चाह रही हूं शिखा, चार-पांच दिन तो हो गये अभी इन लोगों के यहां वो नाचने गाने वाले नहीं आये, कब आयेगें। आ जायेगे मां जी, आप क्यों परेशान हैं।
आखिर बदल गई कलिका – गृहलक्ष्मी कहानियां
कलिका एक जागरूक युवती थी। उसने अपने से भी ज्यादा मेधावी और प्रतिभा सम्पन्न गिरीश से प्रेम विवाह किया था। कलिका शिमला से पूना जब गिरीश के घर पर आई तो उसने कुछ ही दिनों में महसूस किया कि गिरीश का व्यवहार बहुत ही सामाजिक है। नागपुर से सटे दूर दराज के गांव से उनके परिचितों को पूना बुलाकर नौकरी व्यवसाय में मदद करना गिरीश को सुकून देना था।
मां का प्यार – गृहलक्ष्मी कहानियां
ट्रेन जैसे ही प्लेटफार्म पर रुकी, मैंने इधर उधर नज़रे दौड़ाई। तभी सामने चाय की दुकान पर छह- सात बरस के बच्चे पर निगाह पहुंच गयी। नए पैंट-शर्ट, धूल-धूसरित बाल, फटे गाल, वो लड़का वहां पड़े कुल्हड़ों में बची चाय पीने की कोशिश कर रहा था।
हाय हाय ये महंगाई – गृहलक्ष्मी कहानियां
धन्य है हमारी श्रीमती जी, जिन्होंने महंगाई से जंग लडऩे का संकल्प लिया। लाख समझाया कि तुम्हारे वश की बात नहीं, तो कहने लगी अपनी असफलताओं से ही सबक लेना चाहिए
गृहलक्ष्मी की कहानियां : टेलीफोन
कॉलेज टाइम से वो एक दूसरे को प्यार करते थे। घरवालों ने खुशी-खुशी रिश्ता मंजूर कर लिया, धूमधाम से शादी हुई और कब दो साल गुजर गये, पता ही नहीं चला। पर कल उस फोन की घंटी से जैसे सब कुछ थम सा गया…
कभी न भूलने वाली कहानी – गृहलक्ष्मी कहानियां
बात है सावन महीने में बिहार के सिंहेश्वर नाम के बाबा भोले नाथ की छोटी सी नगरी की जहां बहुत से श्रद्धालु देश विदेश से पूजा करने और बाबा को जल अर्पित करने आते हैं।
संगति का असर – गृहलक्ष्मी कहानियां
दामू दादा सुमित को मेला घुमा कर घर की ओर लौट रहे थे कि मेले में इतना घूमने के कारण सुमित को भूख सताने लगी थी। दामू दादा चूंकि घर से कुछ खाने का लाए नहीं थे, सो नजदीक की किराने की दुकान से बिस्किट का पैकेट खरीद लिया। चलते चलते पैकेट खोलकर अभी वे सुमित को कुछ बिस्किट दे ही रहे थे कि उन्होंने पीछे देखा कि एक कुत्ता बिस्किट को ललचाई नजरों से देख रहा है। दया भाव दिखाते हुए उन्होंने दो तीन बिस्किट उसकी ओर उछाल दिए और शेष बिस्किट अपने झोले में रख लिए।
शक्तिला – गृहलक्ष्मी कहानियां
साबित कर दिया शक्तिला ने कि हिम्मत हो तो कोई नहीं डिगा सकता किसी को भी… और लडक़ी की सबसे बड़ी खूबसूरती है, मुश्किलों से लडऩे का हौसला और सही निर्णय लेने की क्षमता। आज अपने नाम को सार्थक कर लिया था उसने…।
