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दीप -पर्व मनाएँ पारम्परिक अंदाज में

आज की भागदौड़ और रफ्तार से भागती जिंदगी में हमारी खुशियां और रिश्ते सब पीछे छूटते जा रहे हैं। व्यस्त दिनचर्या के चलते चाहते हुए भी हम अपने और अपनों के लिए वक्त नहीं निकाल पाते। ऐसे में त्योहारों का आना एक बहाना बन जाता है। खुशियों के पल जीने का।

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बरसाने की बारात में चौधरी – गृहलक्ष्मी कहानियां

भले ही खुद के घर में इनकी कौड़ी इज्जत ना हो पर बाहर किसी की मौत हो या शादी, ये अपना ज्ञान बघारने से बिलकुल भी नही चूकते। ऐसी चौधराहट दिखाते हैं कि घर वाले भी बाहर वाले लगने लगते हैं।

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घर की लक्ष्मी – गृहलक्ष्मी कहानियां

माया को उसके सास-ससुर बात-बात पर ताने मारते। उसका पति तो उसे अधिक दहेज न लाने के कारण रोज तानों के साथ-साथ थप्पड़-मुक्के भी मारने लगा। माया की सुबह गलियों से शुरू होती और शाम लात-घूसे लेकर आती। ये सब सहना तो माया की अब नियति बन गया था। रोज-रोज की दरिंदगी को सहते-सहते माया के आंसू सूख चुके थे…

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आशाओं का सूरज – गृहलक्ष्मी कहानियां

महेश एक बहुत ही होनहार और बुद्धिमान बालक था। उसमें सीखने और जानने की अद्भुत ललक थी। उसके हाथों में तो मानो जादू था। वह अपने चित्रों में प्राण डाल देता था। उसके अध्यापक उसकी प्रतिभा से बहुत प्रभावित थे। वह सुबह स्कूल आने से पहले मंदिर अवश्य जाता था ।

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जै हो गैया मैया की – गृहलक्ष्मी कहानियां

शहर की स्वच्छता को चार-चांद लगाते उस सिविल अस्पताल के पिछवाड़े में खाने लायक कुछ ढूंढने वह वह रोज वहां आती थी। वह आती और बड़ी दिलेरी से रोगियों की जूठन या फिर फलों के सड़े गले छिलके तक खाने में वह गुरेज न करती और उस ढेर पर चढ़ती चली जाती, एक ही झटके में, देश के स्वास्थ्य नियमों को ठेंगा दिखाने की नीयत से शायद। इंजेक्शन की सुईयां तो रोगी तक को नहीं चूकती तो फिर उसके नंगे नखों को छलनी करने से क्योंकर कतराती?

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गृहलक्ष्मी की कहानियां : नियति

शादी के बाद से ही परित्यक्ता का जीवन व्यतीत कर रही माधवी के पति ने जब वापसी की इच्छा व्यक्त की तो माधवी और उसके बेटे ने जो निर्णय किया, उस पर उसे गर्व था…

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मेरे सामने वाली खिड़की में – गृहलक्ष्मी कहानियां

मिसेज गुप्ता नारी जाति पर अब तक हुए तमाम अत्याचारों का बदला अकेले गुप्ता जी से ले रही हैं। मेरी उनके साथ पूरी सिमपैथी है, परन्तु मैं विवश हूं उनकी हैल्प करना, मिसेज गुप्ता का कोपभाजन बनना है।

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एक कप चाय – गृहलक्ष्मी कहानियां

अनिमेष ऑफिस से आते ही कहने लगे परसों दिल्ली जाना होगा, मीटिंग है चाहो तो तुम भी साथ चलो सबसे मिलना हो जायेगा। सबसे मिलने का मोह मैं भी ना छोड़ सकी, हां कहकर जाने की तैयारी में जुट गई। सुबह कब बीत जाती है पता नहीं लगता सबसे मिल-मिलाकर बातें करने में मालूम ही नहीं चला, कब दो बज गए। मन हुआ घर का एक चक्कर लगाकर पुरानी यादें ताजी कर लूं।

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गृहलक्ष्मी की कहानियां : गुमराह बच्चे

सुबह के नौ बजे थे। स्कूल के गेट के पास चार-पांच लड़कियां सजी धजी सी खड़ी थी और बार बार सड़क की तरफ देख रही थी मानो किसी की राह देख रही हों। आज स्कूल में बच्चों की छुट्टी थी और बच्चों को स्कूल नहीं आना था। इतने में उन्होंने मैडम की गाड़ी आती देखी तो इधर उधर छुपने लगी। मैडम ने उन्हें देख लिया था।

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