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किताबों का प्रहरी – गृहलक्ष्मी कहानियां

जब ललिता नहीं रही तो खुद को उन्होंने उसी कमरे में फिक्स कर लिया, किताबों के बीच में उनकी पतली चौकी लगी थी और उस पर विराजमान वो माने खुद को उन अनबोलती किताबों का प्रहरी मानते थे…

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गृहलक्ष्मी की कहानियां – घूंघट में लड़का देखकर भागने लगे

  गृहलक्ष्मी की कहानियां – मैं गुजरात की एक साधारण लड़की हूं। मेरी शादी को दो वर्ष हो चुके हैं लेकिन मैं आज भी वो बात याद करती हूं तो अकेली-अकेली हंसती हूं। शादी के बाद जब मैं पहले दिन अपने ससुराल गई, तब मुझको रात को कमरे में ले गए तब मेरे फई के लड़के ने मुझे […]

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मूंगफली खानी आती है क्या?

  मैं रेलगाड़ी में सफर कर रही थी। मेरे सामने की बर्थ पर एक संभ्रांत परिवार बैठा था। थोड़ी देर में ही हम आपस में घुलमिल गए। एक स्टेशन पर मैंने मूंगफली खरीदी और सामने बैठे बच्चों को भी दी। मैं मूंगफली छीलकर छिलकों को रेल के फर्श पर ही फेंकने लगी। सामने बैठे एक […]

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अपने छोटे भाई के दांत तोड़े

  मैं पहली कक्षा में पढ़ता था। मुझे मेरे दोस्त ने बताया कि जब उसका बहुत दिनों से हिलने वाला दांत टूटा तो उसे सोते वक्त अपने तकिए के नीचे रख दिया, सुबह तकिए के नीचे दांत के पास सिक्का मिला, वह बहुत खुश हो गया। उसने कहा कि यदि फिर उसका दांत टूटा तो वह उसे तकिये […]

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लैपटॉप के सामने रोमांस

मेरे पति रोमांस में जितने आगे हैं, तकनीक में उतने ही पीछे। वे व्हाट्स एप और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया को फालतू लोगों का काम कहकर इन्हें अपनाने में भी परहेज करते हैं। मैं प्रतिदिन रात्रि में अपनी ससुराल में फोन पर बात करती हूं। कुछ दिनों पूर्व की बात है, मैं अपने ससुराल में […]

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बस पुरानी तो टिकट नया क्यों

एक बार मैं अपनी मम्मी के साथ बस में सफर कर रहा था। मैं 7 साल का था। हम सफर करके जब आ गए तो मम्मी से मैंने अपना टिकट ले लिया और अपनी जेब में रख लिया। छुट्टियों की वजह से हम फिर एक दिन बस में गए। बस में काफी भीड़ थी, मम्मी […]

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भाभी आप तो बिलोरन निकली

हमारी नई-नई शादी हुई थी। एक रात सोने में ज्यादा देर हो गई। सुबह नींद खुली तो देखा, धूप चढ़ गई थी। मेरे पति संजय ने मुझे कहा कि तुम पहले बाहर जाओ मैं थोड़ी देर बाद आता हूं। मैं सकुचाते हुए कमरे से बाहर आई और ब्रश वगैरा करके रसोई में जाकर सासू मां […]

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गृहलक्ष्मी की कहानियां : एक चालाकी ऐसी भी

पापा के दोस्त पाण्डेय जी के दो बेटे और एक बेटी हैं। पांडेय अंकल सरकारी नौकरी में थे। अपनी जिंदगी में उन्होंने अपने तीनों बच्चों को पढ़ाया लिखाया, पहले बेटी की शादी की और फिर बड़े बेटे की। बड़ा बेटा उसी शहर में प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता था।

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इज्ज़त या आत्मसम्मान – गृहलक्ष्मी कहानियां

डाइनिंग हॉल में बैठकर परिवार के सभी लोग नाश्ता कर रहे थे । मेहता जी एवं उनके बेटों के बीच बड़ी-बड़ी बातें हो रहीं थीं, कभी कॉरपोरेट ऑफिस तो कभी सुप्रीम कोर्ट तो कभी विधान सभा के मसलों पर और सुझाव दिए जा रहे थे।

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जलेबी मांगने चली गई

  मेरे पापा का ट्रांसफर गांव में होने कारण मैं अपने दादा-दादी के पास रहकर पढ़ती थी। घर में तीन बुआ, चाचा, चाची सभी लोग साथ में रहते। मुझे सभी बहुत प्यार करते थे, मैं सभी की दुलारी थी। मेरी गलती पर मुझे कभी डांटा नहीं जाता था। हमारे पड़ोस में एक मिठाई की दुकान थी। रोज उस […]

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