सारे विकल्प समाप्त हो चुके थे। अब तो मात्र निर्णय लेना था। किसी की सुनी-सुनाई बात नहीं थी। सुनी-सुनाई पर विश्वास भी नहीं किया कभी। आंखों देखी घटना थी। सब ठीक चल रहा था। कम से कम मेरे हिसाब से। दस वर्ष विवाह को हो चुके थे। एक प्यारी सी 8 वर्ष की बेटी थी। अच्छी नौकरी थी। घर में ऐसी कोई कमी न थी कि किसी मजबूरी के तहत कोई अनुचित कदम उठाना पड़े। कमी होती तो शायद ऐसा न होता।
Tag: गृहलक्ष्मी कहानियां
गृहलक्ष्मी की कहानियां सरिता पत्रिका की कहानी गृहशोभा मैगजीन की कहानियाँ मनोरंजक कहानियों और महिलाओं से जुड़ी हर नई खबर स्टोरी इन हिंदी. यहां आपको मिलेगी परिवार, समाज और रोमांस की एक से बढ़कर एक कहानियां. Story in hindi
पुकार – गृहलक्ष्मी कहानियां
उस पाॅश काॅलोनी में सबसे खूबसूरत बंगला सविता का ही था। अपनी किस्मत और मेहनत पर गर्व करती सविता सुबह-शाम फुर्सत के लम्हों में पलकों को ऊपर नीचे झपका कर अपना वो खूबसूरत बंगला अक्सर ही निहार लिया करती। कभी लाॅन में बेंत की आराम कुर्सी पर बैठी-बैठी आत्ममुग्ध होती रहती थी। ऐसे ही खुशी और संतोष भरे किसी पल में अचानक एक पत्थर बंगले के गेट पर आकर लगा। चट से उठकर सविता ने यहां-वहां झांका, आखिर कौन हो सकता है।
मूल्याकंन – गृहलक्ष्मी कहानियां
एक कस्बा था और वहां एक लोकप्रिय नृत्यागंना रहती थी। हालांकि उसका नृत्य उच्च कोटि का तो नहीं था फिर भी होली- दीवाली छठे चैमासे उसको बुलावा आ ही जाता था और वह अपने प्रस्तुति दिया करती थी। नृत्यागंना क्योंकि कस्बे में रहती थी इसलिए उसे हर जगह एक सा ही मानदेय मिलता था। कहीं भी बढ़कर कुछ नहीं।
गृहलक्ष्मी की कहानियां : पौत्र जन्म की खुशियां
पत्नी मुक्त मन से पैसा लुटाने में लगी थी। मैंने उसे समझाया था कि वह पौत्री को ही बेटा मान लें, बावजूद उसके भीतर तमन्नाएं उछालें मार रही थीं कि इस बार तो पौत्र ही हो।
गृहलक्ष्मी की कहानियां : नई राह
गृहलक्ष्मी की कहानियां : एक दिन दोपहर के समय फोन की घन्टी बजी, हेलो- रोहित का गम्भीर एक्सीडेन्ट हो गया है। रोहित के पिता ने बड़ी गम्भीर आवाज़ में कहा। हाथ तो उम्र के कारण कांपते ही थे दादा जी के हाथ से रिसीवर गिर कर झूलने लगा। और दादा जी वही घम्म से गिर […]
मां की सीख – गृहलक्ष्मी कहानियां
एक कबूतर ने बालकनी में रखे शू रैक में दो अंडे दिए थे। मां की लाख हिदायतों के बावजूद रिशू और पम्मी वहां बार-बार जाकर देखते कि अंडों से चूजे निकले हैं या नहीं। अचानक एक दिन रिशु की नजर काले बिलौटे पर पड़ी, उसने उसे तुरंत भगा दिया और पम्मी को बताया। यह सुनकर पम्मी भी चिंतित हो गई।
भेदभाव – गृहलक्ष्मी कहानियां
एक तालाब में खूबसूरत मछलियों के साथ मेंढक भी रहते थे। कुछ छोटी मछलियों को छोड़ कर अधिकांश मछलियां मेंढकों को हेय दृष्टि से ही देखती थीं
डर सबको लगता है – गृहलक्ष्मी कहानियां
सुबह की खिलती धूप चारों तरफ फैली हुई थी। गायत्री खिड़की के पास खामोश बैठी शून्य में कुछ निहार रही थी। तभी उसकी निगाहें सड़क पार गिफ्ट हाउस में आते-जाते ग्राहकों पर पड़ी। गायत्री जब भी डिप्रेशन में होती तो सामने वाली शाॅप की तरफ देखती और सोचती कि इसमें आने-जाने वाले लोग किसी-न-किसी के लिए कोई उपहार खरीद रहे हैं और तब उसे लगता है कि दुनिया में आज भी प्यार भरा हुआ है।
कलूटी – गृहलक्ष्मी कहानियां
एक रेलवे प्लेटफार्म जिसमें दूर-दूर तक सिर्फ खामोश दूरियों का अहसास करातीं पटरियां थीं और दिन भर उस सन्नाटे को तोड़ती रेलगाड़ियों की छक-छक की तेज आवाज। दिन भर में उस प्लेटफार्म में कई घण्टों के अंतराल पर मात्र तीन या चार गाड़ियां रुकती थीं, दूसरी सभी सीधी निकल जातीं।
घिसटती जिन्दगी – गृहलक्ष्मी कहानियां
गर्मी, सर्दी और बरसात हमेशा उसी रूप में आते रहे जैसे सदियों से चले आ रहे थे मगर सालों से उस औरत की दशा में दिन-प्रतिदिन आए बदलाव को देखकर मैं हैरान रही। हर तीन माह में उसका पागलपन पहले की अपेक्षा कुछ ज्यादा ही बढ़ जाता मगर यह कैसा पागलपन था जो सिर्फ तभी दिखाई पड़ता था जब उसके घर में कोई पर्व या उत्सव होता या फिर आसपास के किसी घर में खुशियों का माहौल होता।
