जब भी छोटी मछलियां और मेंढक परस्पर खेल रहे होते तो कोई न कोई बड़ी मछली घमंड में चूर हो छोटी मछलियों को डांटते हुए कहती, ‘तुम लोगों से कितनी बार कहा है इन विजातिय कुरूप मेंढकों के साथ मत खेला करो, वे न हमारी बराबरी के हैं और न ही बिरादरी के, वो कहां और हम कहां… वगैरह वगैरह… चलो यहां आओ।
एक दिन एक मछुआरे ने तालाब में जाल फेंक कई मछलियों को अपने जाल में फंसा लिया। यह देख बची मछलियां विलाप करने लगी कि कोई तो उन्हें मछुआरे के चंगुल से छुड़ाए, यदि वे बाहर जाती हैं तो मछुआरा उन्हें भी पकड़ कर ले जाएगा, वे बिल्कुल असहाय और बेबस हो गई। तभी समस्त मेंढक मिलकर एक साथ बाहर आए और मछुआरे के शरीर पर उछल-कूद मचाने लगे। मेंढकों से बचने तथा उन्हें अपने शरीर से अलग करने के लिए बिना एक पल भी रुके मछुआरे ने अपने दोनों हाथों से मेंढकों को उठा-उठा कर इधर-उधर फेंकना शुरू कर दिया, जैसे ही मछुआरे के हाथ से जाल छूटा वैसे ही सारी मछलियां जाल से निकल कर पुन: तालाब में चली गई, इसके बाद मेंढकों ने भी फटाफट तालाब में छलांग लगा दी।
इस घटना के बाद छोटी मछलियां जहां खुशी से चहक रही थीं. वहीं बड़ी मछलियां बेहद शर्मसार थीं। उन्होंने खुद को श्रेष्ठ समझने की गलती के लिए मेंढकों से माफी मांगते हुए कृतज्ञता व्यक्त कर उनकी तरफ यह कहते हुए दोस्ती का हाथ बढ़ाया, ‘अब हमें समझ में आ गया है कि ऊंच-नीच और जात-पात से रहित समाज हमेशा स्वस्थ, समृद्ध और सशक्त होता है।
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