रात के 10:00 बज चुके थे ।सड़क छोड़कर रमेश धीरे धीरे पुल की तरफ बढ़ रहा था। सामने पुल नजर आ रहा था। रमेश ने एक बार जी भर कर उस सड़क को देखा, कितनी यादें जुड़ी हैं इस सड़क के साथ। इस सड़क के इस पार कुछ ही दूर पर तो उसका घर था और दूसरी ओर स्कूल ।हालांकि स्कूल भी थोड़ा दूर ही था, लेकिन उस की बिल्डिंग इतनी बड़ी थी, कि दूर से ही नजर आती थी।
Tag: कविता कहानी
रानी माँ का चबूतरा – गृहलक्ष्मी कहानियां
आज रात को जब चबूतरे पर बैठक लगी तो औरतों की चर्चा का विषय पूर्णिमा को होनेवाला आयोजन था। कौन क्या पहनेगी, पूजा की थाली में क्या ले जाएगी, क्या मनौती मानेगी आदि बातों पर चर्चा हो रही थी कि रामी अपनी छोटी बहिन धन्नी को लेकर पहुँची। बूढ़े काका ने अपनी चिलम दूसरे के हाथ में थमाते हुए कहा, ‘बड़ी देर कर दी रामी। शायद बहिन की खातिर में लगी थी।’
शायद – गृहलक्ष्मी कहानियां
जहाज़ की बत्तियाँ जलीं तो लगा, जैसे पानी में बिछी अँधेरे की चादर में अनेक दरारें पड़ गई हों। चारों ओर बल्बों की झूलती बंदनवार देखकर ही राखाल को खयाल आया कि इस बार वह दीवाली घर पर ही मनाएगा। कितना अच्छा होता, किसी तरह वह पूजा पर ही पहुँच पाता।
एक बार और – गृहलक्ष्मी कहानियां
सारा सामान बस पर लद चुका है। बस छूटने में पाँच मिनट बाकी है। ड्राइवर अपनी सीट पर आकर बैठ गया है। सामान को ठीक से जमाकर कुली नीचे उतर आया है और खड़ा-खड़ा बीड़ी फेंक रहा है। अधिकतर यात्री बस में बैठ चुके हैं, पर कुछ लोग अभी बाहर खड़े विदाई की रस्म अदा कर रहे हैं। अड्डे पर फैली इस हल्की -सी चहल-पहल से अनछुई-सी बिन्नी चुप-चुप कुंज के पास खड़ी है। मन में कहीं गहरा सन्नाटा खिंच आया है। इस समय कोई भी बात उसके मन में नहीं आ रही है, सिवाय इस बोध के कि समय बहुत लंबा ही नहीं, बोझिल भी होता जा रहा है। लग रहा है जैसे पाँच मिनट समाप्त होने की प्रतीक्षा में वह कब से यहाँ खड़ी है। कुंज के साथ रहने पर भी समय यों भारी लगे, यह एक नयी अनुभूति है, जिसे महसूस करते हुए भी स्वीकार करने में मन टीस रहा है।
असामयिक मृत्यु – – गृहलक्ष्मी कहानियां
सब-कुछ जहाँ का तहाँ थम गया।
गति महेश बाबू के हृदय की बंद हुई थी, पर चाल जैसे सारे घर की ठप्प हो गई। अधूरा बना हुआ मकान और अधकचरी उम्र के तीन बच्चे।
खोटे सिक्के – गृहलक्ष्मी कहानियां
‘जी, इन्हें कहाँ रक्खूँ?’
एक सहमी-सी आवाज़ पर सब घूम पड़े। देखा, एक छोटा लड़का थैली हाथ में लिए भयभीत-सा खड़ा है।
ब्यूटी पार्लर शरणम् गच्छामि…!! – गृहलक्ष्मी कहानियां
पहले महिलायें घर में चूल्हा-चौका देखती थी आज उन्हें खुद ऐसा बनना होता है कि वह दूसरो को अपने लुक से चौंका दे। पहले उसे अबला माना जाता था लेकिन अब उसे बला की खूबसूरत कहलाने में यकीन है।
बूढ़ा गिद्ध – हितोपदेश की रोचक कहानियां
गंगा नदी के किनारे एक बहुत बड़ा पेड़ था। इस पेड़ पर बहुत से पक्षी रहा करते थे। एक दिन एक बूढ़ा गिद्ध वहाँ आया और पक्षियों से बोला कि “क्या वह इस वृक्ष के खोल में रह सकता है।” सभी पक्षियों ने बूढ़े गिद्ध की आयु को देखते हुए, उसे वहाँ रहने की इजाजत दे दी। वे अपने हिस्से के भोजन में से भी कुछ भोजन उसे खाने को दे देते।
हृदय परिवर्तन – गृहलक्ष्मी कहानियां
यूं तो जि़ंदगी हमेशा कोई न कोई सबक उम्र भर ही देती रहती है, लेकिन कई बार इसके सबक जीना सिखाने के लिए, पहले मौत की दहलीज़ तक पहुंचा देते हैं। रमेश और रीता के बिखरते घरौंदे का अंजाम क्या हुआ, ये बताती इस कहानी में कई टूटते घरों को बचाने की ताकत है।
विधवा – गृहलक्ष्मी कहानियां
कुछ लोग इंसानियत की बहुत सुंदर-सुंदर बातें करते हैं। कुछ लोग इंसान होते हैं। क्या फर्क है इन दोनों बातों में, इसी पर गहरी रोशनी डालती है वरिष्ठ साहित्यकार आबिद सुरती की ये कहानी-
