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सशक्तीकरण – गृहलक्ष्मी कहानियां

सारा देश महिला सशक्तीकरण की राह पर दौड़ा चला जा रहा है और बेचारे पुरुषों की सुध लेने की कोई ज़रूरत ही महसूस नहीं करता। पुरुष सशक्तीकरण की आवश्यकता बताता व्यंग्य

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यही सच है – गृहलक्ष्मी कहानियां

सामने आँगन में फैली धूप सिमटकर दीवारों पर चढ़ गई और कंधे पर बस्ता लटकाए नन्हे-नन्हे बच्चों के झुंड-के-झुंड दिखाई दिए, तो एकाएक मुझे समय का आभास हुआ। …घंटा-भर हो गया यहाँ खड़े-खड़े और संजय का अभी तक पता नहीं! झुँझलाती-सी मैं कमरे में आती हूँ। कोने में रखी मेज़ पर किताबें बिखरी पड़ी हैं, कुछ खुली, कुछ बंद।

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एक बूढ़े आदमी के खिलौने – गृहलक्ष्मी कहानियां

बच्चों के लिए उनके खिलौने, सिर्फ़ निर्जीव खिलौने-भर नहीं होते, बल्कि होते हैं जीती-जागती, सांस लेती जि़ंदगी। जि़ंदगी का यही एहसास कैसे एक बूढ़े की सांसें बढ़ा गया, ढ़िए इस मर्मस्पर्शी कहानी में-

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मैं हार गई – गृहलक्ष्मी कहानियां

जब कवि-सम्मेलन समाप्त हुआ, तो सारा हॉल हँसी-कहकहों और तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज रहा था। शायद मैं ही एक ऐसी थी, जिसका रोम-रोम क्रोध से जल रहा था। उस सम्मेलन की अन्तिम कविता थी, ‘बेटे का भविष्य।’ उसका सारांश कुछ इस प्रकार था

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स्त्री-सुबोधिनी – गृहलक्ष्मी कहानियां

प्यारी बहनो,

न तो मैं कोई विचारक हूँ, न प्रचारक, न लेखक, न शिक्षक। मैं तो एक बड़ी मामूली-सी नौकरीपेशा घरेलू औरत हूँ, जो अपनी उम्र के बयालीस साल पार कर चुकी है। लेकिन इस उम्र तक आते-जाते जिन स्थितियों से मैं गुज़री हूँ, जैसा अहम अनुभव मैंने पाया… चाहती हूँ, बिना किसी लाग-लपेट के उसे आपके सामने रखूँ और आपको बहुत सारे ख़तरों से आगाह कर दूं।

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एक कमज़ोर लड़की की कहानी – गृहलक्ष्मी कहानियां

जैसे ही रूप ने सुना कि उसका स्कूल छुड़वा दिया जाएगा, वह मचल पड़ी-‘मैं नहीं छोडूँगी स्कूल। मैं साफ-साफ पिताजी से कह दूँगी कि मैं घर में रहकर नहीं पढ़ूँगी। घर में भी कहीं पढ़ाई होती है भला! बस, चाहे कुछ भी हो जाए, मैं यह बात तो मानूँगी ही नहीं।

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सच्चा प्रेम – गृहलक्ष्मी कहानियां

शाश्वत ने जैसे ही व्हाट्सएप खोला उसमें किसी अनसेव नम्बर से मैसेज था “शाश्वत जी, मैं मुंबई से निशा..विभावरी की रूममेट हूँ।विभावरी ने खुदकुशी करने की कोशिश की है। बड़ी मुश्किल से बची है ।

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त्रिशंकु – गृहलक्ष्मी कहानियां

‘घर की चहारदीवारी आदमी को सुरक्षा देती है, पर साथ ही उसे एक सीमा में बाँधती भी है। स्कूल-कॉलेज जहाँ व्यक्ति के मस्तिष्क का विकास करते हैं, वहीं नियम-कायदे और अनुशासन के नाम पर उसके व्यक्तित्व को कुंठित भी करते हैं…. बात यह है बंधु, कि हर बात का विरोध उसके भीतर ही रहता है।’

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क्या क्या बनाया है बीवी ने – गृहलक्ष्मी कविता

वो कहती है बनाने में घण्टों लगते है… और खाने में पल भर … कभी कुछ बड़े जतन से बनाती है… सुबह से तैयारी करके… कभी कुछ धुप में सुखा के… तो कभी कुछ पानी में भिगो के… कभी मसालेदार.. तो कभी गुड़ सी मीठी… सारे स्वाद समेट लेती हैं … आलू के पराठों में, […]

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