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कथा-कहानी

संडे की सुबह, अभी बिस्तर में ही था कि डोरबेल बज उठी। ‘कौन होगा इतनी सुबह?’ मन में सोचा। घड़ी पर नजर डाली, ‘अभी तो नौ भी नहीं बजे।

‘ नौकरीपेशा वालों के लिए संडे का दिन किसी जन्नत से कम नहीं होता। यही तो एक दिन होता है, जिस दिन वे अपनी मरजी से कुछ पल (पूरा दिन नहीं) गुजार पाते हैं, वरना तो पूरे सप्ताह कलम घिसाई और बॉस की झिड़कियां ही नसीब में होती हैं।

अल्ला-अल्ला खैरसल्ला! लिहाफ हटाना ही पड़ा, क्योंकि डोरबेल के साथ निरंतर छेड़छाड़ जारी थी।

‘नमस्ते भाई साहब!’ खींसे निपोरते हुए वह आदमी हमें कुछ-कुछ आतंकवादी सरीखा लगा, जो सुबह-सुबह हमारी नींद में खलल डालने जैसा अक्षम्य अपराध करने के बावजूद हमें देख मुस्कुरा रहा था। ‘जी कहिए, कैसे कष्ट दिया?’ हमने बिना लाग-लपेट के सीधा सवाल कर दिया।

वह भी कम घाघ नहीं था। वह ‘येन केन प्रकारेण’ भीतर घुस आने को आतुर दिखाई दे रहा था, पर हमारे द्वारा पूरे दरवाजे को ठीक वैसे ही कवर किया हुआ था, जिस तरह शादी के दौरान बहन भैया को भीतर आने से रोका करती है और फिर कुछ हासिल करके ही हटती है।

लिहाजा, उनकी दाल नहीं गली। ‘ऐसा है श्रीमान, हम महिला सशक्तीकरण जागरण प्रकोष्ठ से हैं और महिलाओं को शक्ति प्रदान करने का बीड़ा उठाकर निकले हैं। आपसे हमें बहुत उम्मीद है कम से कम पांच हजार तो हों ही, उस से ज्यादा देना चाहें तो आपकी इच्छा! उन्होंने रसीद बुक निकाल ली।

‘आप महिलाओं को सशक्त करना चाहते हैं? उन्हें ताकतवर बनाना चाहते हैं? उन्हें पावरफुल बनाने निकले हैं?’ ‘हां-हां, आप बिल्कुल सही पकड़े हैं। कितने की काटूं?’ वे झट मुद्दे पर आ गए। अब एक्शन में आने की बारी हमारी थी। ‘दारा, गामा, रंधावा, सतपाल का नाम सुने हैं? नहीं सुने हैं, तभी बहक रहे हैं।

‘ हमने बॉल फेंकी। ‘हां सुने हैं, सुने हैं। बड़े नामी पहलवान हुए हैं। तो?’ वे सतर्क हो चुके थे। ‘पहले उनको जाकर सशक्त कीजिए, फिर देखेंगे।’ हमने कहा तो वे हंसने लगे।

‘आप तो मजाक अच्छा कर लेते हैं। ये सब लोग तो पहले से ही शक्तिमान स्वरूप हैं, इन्हें कैसे?’ ‘मजाक की शुरुआत आपने की या मैंने? अरे भैया, काहे उल्टे बांस बरेली भेज रहे हो? मेरा आशय समझे कि नहीं?’ अभी हमारी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि श्रीमतीजी ने पीछे से गिरेबां पकड़ कर खींचा, ‘भीतर चलकर मटर छीलिए और हां मुन्ना को भी संभालना है। फिर बाजार से सामान… लिस्ट तैयार है!’

‘भाभीजी प्रणाम, आप से मिलकर…’ वे सज्जन बात पूरी नहीं कर पाए, क्योंकि हमारी श्रीमतीजी ने उन्हें ऐसी नज़रों से घूरा कि वे जड़वत हो गए। ‘अब भी कुछ समझना बाकी है?’ हमने ‘लाइव डेमो’ का हवाला दिया तो वे सकपका गए।

‘बात तो आपकी सही है भाई साहब, पर अब मैं खाली हाथ ‘शांतिजी’ के पास कैसे जाऊं? वे मुझे कच्चा चबा जाएंगी, फाड़ डालेंगी मुझे?’ ‘कौन शांति जी? पर आप तो महिला सशक्तीकरण के लिए उतावले हो रहे थे ना? हमने व्यंग्य किया। घबराहट में वे बगले झांकने लगे। ऊपरवाला भी इतना सशक्त नहीं होगा, जितना हमारी भारतभूमि की ये नारियां हैं। सशक्त ही करना है तो हम-आप जैसे पुरुषों को करिए, जिनकी दशा ‘दांतों के बीच जीभ’ सरीखी बनी हुई है।

कैसे हम पुरुष वर्ग तिल-तिलकर जीने को मजबूर हैं, क्या तुम नहीं जानते?’ हमारे तर्कों के सामने वे ताश के महल की भांति ढह गए।

‘आपने मेरी आंखें खोल दीं भाई साहब। अब चलता हूं। मुझे भी मटर छीलने हैं घर जाकर, वरना खाना नहीं मिलेगा।’ वे रोने लगे तो हमने उन्हें अपना रुमाल देकर ‘पुरुष सशक्तीकरण’ यज्ञ में अपनी आहूति दे डाली।

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