इस कोरोना नाम के छोटे से वायरस ने ढेर सारे कमाल के काम किए हैं। अब इतने हजार संक्रमित हुए, इतनों की जांच हुई, इतने ठीक हो गए, मास्क, 2 गज की दूरी…
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एक व्हाट्सएप संदेश
मुन्नों कल से तुम्हें फोन मिला- मिला कर थक गई ।अब तुम्हारी तो नई-नई शादी हुई है, तो मजे कर रही होगी ,लेकिन अपनी मैं किससे कहूं। एक तुम ही तो मेरी अपनी हो, इसीलिए व्हाट्सएप कर रही हूं ।
कहानी रुक्कू
उदय प्रकाश वर्तमान में देश के उन लोकप्रिय साहित्यकारों में से एक हैं, जिनकी रचनाएं आम पाठक वर्ग से लेकर साहित्य प्रेमियों के बीच चर्चा में रहती हैं। इस बार हम गृहलक्ष्मी के पाठकों के लिए उदय प्रकाश की शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक से लेकर आए हैं बेहद रोचक कहानी रुक्कू।
सॉफ्ट लैंडिंग
निर्मल के सिर से पिता का साया बचपन में ही उठ गया था। पिता के असमय गुजर जाने के बाद उसके परवरिश की पूरी जिम्मेदारी उसकी मां निरूपा जी के कंधों पर आ गई। दुख के इस भंवर में अचानक घिर आई उनकी जीवन नौका बुरी तरह क्षत-विक्षत हो गई थी, परंतु निर्मल के उज्जवल भविष्य को देखते हुए अपनी इस टूटी हुई नौका को फिर से जोडऩे में वे पूरे प्राणपन से लग गईं।
मुझे माफ़ कर देना- भाग 3
महीने भर बाद हमारा विवाह हो गया। मुझे वो दिन अभी भी याद हैं जब मैंने आखिरी बार तेरा चेहरा देखा था, तूने कोई रोष व्यक्त नहीं किया था, कोई प्रतिवाद नहीं किया था। तूने हम दोनों को मुबारकबाद दी थी और तेरे चेहरे पर खुशी के रंग थे। पर क्या तू वाकई भीतर से खुश थी? नहीं, तुझे बहुत दु:ख हुआ था रवीन्द्र की बेवफाई पर, पर जैसा कि तेरा स्वभाव रहा है, तूने उफ्फ तक नहीं की। अपना दु:ख, अपनी पीर अपने अंदर ही जज़्ब कर ली। विवाह के बाद हम मुम्बई आ गए। पहले रवीन्द्र अपने पिता और भाइयों के संग मिलकर कारोबार करता रहा, फिर उसने अपना बिजनेस अलग कर लिया।
मुझे माफ़ कर देना- भाग 1
डाक में कुछ चिट्ठियाँ आई पड़ी हैं। निर्मल एकबार उन्हें उलटपलट कर देखती है, पर पढऩे को उसका मन नहीं कर रहा। वह जानती है कि ये सभी चिट्ठियाँ पाठकों की तरफ से ही आई हैं, जो नि:संदेह अभी हाल ही में एक पत्रिका में छपे उसके आत्मकथा-अंश को लेकर ही होंगी। अधिकांश में उसकी तारी$फ होगी, कुछ में उसके साथ सहानुभूति दिखाने की कोशिश की गई होगी और हो सकता है, एक-आध चिट्ठी में आलोचना भी हो। पता नहीं क्यों, आजकल पाठकों के आए खतों को वह उतनी बेसब्री से नहीं पढ़ती जितनी बेसब्री से पहले पढ़ा करती थी। उसकी रचना पर यदि कोई खत आता था तो वह सारे काम छोड़कर उसे पढऩे बैठ जाया करती थी। कई-कई बार पढ़ती थी, खुश होती थी। दिनभर एक नशा-सा तारी रहता था उस पर।
द्रौपदी रह चुकी हो
मुझे नाटकों में भाग लेने और लिखने का शौक बचपन से ही रहा है। इसलिए जब मेरी शादी की बात चली तो अपने होने वाले पति की लेखन क्षमता से प्रभावित होकर मैंने रिश्ते के लिए हां कर दी। शादी के कुछ साल बाद एक रोज हमारा किसी बात को लेकर झगड़ा हुआ।
गृहलक्ष्मी की कहानियां – एक दिन अचानक
गृहलक्ष्मी की कहानियां – रचना को आमतौर पर सिरदर्द रहता था। उसे लगता था कि शायद थकान के कारण उसे सिरदर्द हो रहा है और वह एक दर्द की गोली खा लेती थी, जिससे उसे कुछ आराम मिल जाता था और वह फिर से अपने कार्य में लग जाती थी। रचना एक विद्यालय में अध्यापिका […]
कवि सम्मेलन के अध्यक्ष की योग्यता
क्या अध्यक्षता बेवकूफ ही करते हैं- नहीं, बुद्धिमान भी करते हैं- पत्नी जी रहस्यमय ढंग से मुस्करा रही थीं, वे सामने विराजमान रंगीनी देखकर वाह-वाह करते हैं।
गृहलक्ष्मी की कहानियां : सन्धि वार्ता
गृहलक्ष्मी की कहानियां : टिफिन बन गया कि नहीं ? मुझे देर हो रही है।” राजाराम ने चिल्लाकर राजरानी से कहा। उधर से कोई जवाब नहीं आया। राजाराम अंदर देखने गया राजरानी बिस्तर पर लेटी थी। इसका मतलब था, आज भी खाना नहीं बनेगा। महाभारत की रचना शुरू हो चुकी थी। महारानी लेटी पड़ी है […]
