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सन्नाटा – गृहलक्ष्मी कहानियां

उसका नाम कुछ फूलमती, चमेली या गुलाबो तजऱ् का है जिसे वह कभी स्वीकार नहीं कर सका। उसका पति उसे राधा कहता था। पर यह नाम भी उसे नाकाफी लगा। तब उसने उसे एक नाम दे दिया था- दिवा…

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एक कप चाय – गृहलक्ष्मी कहानियां

अनिमेष ऑफिस से आते ही कहने लगे परसों दिल्ली जाना होगा, मीटिंग है चाहो तो तुम भी साथ चलो सबसे मिलना हो जायेगा। सबसे मिलने का मोह मैं भी ना छोड़ सकी, हां कहकर जाने की तैयारी में जुट गई। सुबह कब बीत जाती है पता नहीं लगता सबसे मिल-मिलाकर बातें करने में मालूम ही नहीं चला, कब दो बज गए। मन हुआ घर का एक चक्कर लगाकर पुरानी यादें ताजी कर लूं।

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किताबों का प्रहरी – गृहलक्ष्मी कहानियां

जब ललिता नहीं रही तो खुद को उन्होंने उसी कमरे में फिक्स कर लिया, किताबों के बीच में उनकी पतली चौकी लगी थी और उस पर विराजमान वो माने खुद को उन अनबोलती किताबों का प्रहरी मानते थे…

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गृहलक्ष्मी की कहानियां : गुमराह बच्चे

सुबह के नौ बजे थे। स्कूल के गेट के पास चार-पांच लड़कियां सजी धजी सी खड़ी थी और बार बार सड़क की तरफ देख रही थी मानो किसी की राह देख रही हों। आज स्कूल में बच्चों की छुट्टी थी और बच्चों को स्कूल नहीं आना था। इतने में उन्होंने मैडम की गाड़ी आती देखी तो इधर उधर छुपने लगी। मैडम ने उन्हें देख लिया था।

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मां की ममता – गृहलक्ष्मी कहानियां

मां इतनी सुन्दर, इतनी गोरी चिट्टी, उसे खुद पर गर्व हो आया था कि उसकी मां सबसे सुन्दर और सबसे प्यारी है…। सुबह हो या शाम, उसने खुद को मां की ही गोद में पाया, फिर अचानक ऐसा क्या हो गया कि मां उसे बिना बताए ही चली गई।

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गृहलक्ष्मी की कहानियां : एक चालाकी ऐसी भी

पापा के दोस्त पाण्डेय जी के दो बेटे और एक बेटी हैं। पांडेय अंकल सरकारी नौकरी में थे। अपनी जिंदगी में उन्होंने अपने तीनों बच्चों को पढ़ाया लिखाया, पहले बेटी की शादी की और फिर बड़े बेटे की। बड़ा बेटा उसी शहर में प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता था।

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इज्ज़त या आत्मसम्मान – गृहलक्ष्मी कहानियां

डाइनिंग हॉल में बैठकर परिवार के सभी लोग नाश्ता कर रहे थे । मेहता जी एवं उनके बेटों के बीच बड़ी-बड़ी बातें हो रहीं थीं, कभी कॉरपोरेट ऑफिस तो कभी सुप्रीम कोर्ट तो कभी विधान सभा के मसलों पर और सुझाव दिए जा रहे थे।

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गृहलक्ष्मी की कहानियां :  मरूस्थल में गंगाजल

कृति ने अपने विवाह का आमन्त्रण पत्र ही सीधे-सीधे वरुण के हाथ में रख दिया और वरुण को जैसे करंट लग गया। कोई दस-बारह साल बाद तो नहीं मिल रही थी कृति उससे बल्कि करीब पांच वर्षों से वो दोनों एक ही कार्यालय में काम कर रहे थे। यहां तक कि कल रात देर तक काॅफी के बहाने वरुण उसी के साथ था, पर वरुण का मन ही कहां भरता था।

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गृहलक्ष्मी की कहानियां : मां तो मां ही होती है

मेरे पड़ोस के घर आज 4-6 दिन हुये पोता हुआ। सब बड़े ही खुश हैं, मैं भी अपने काम जल्दी निपटा कर जाना चाह रही हूं शिखा, चार-पांच दिन तो हो गये अभी इन लोगों के यहां वो नाचने गाने वाले नहीं आये, कब आयेगें। आ जायेगे मां जी, आप क्यों परेशान हैं।

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आखिर बदल गई कलिका – गृहलक्ष्मी कहानियां

कलिका एक जागरूक युवती थी। उसने अपने से भी ज्यादा मेधावी और प्रतिभा सम्पन्न गिरीश से प्रेम विवाह किया था। कलिका शिमला से पूना जब गिरीश के घर पर आई तो उसने कुछ ही दिनों में महसूस किया कि गिरीश का व्यवहार बहुत ही सामाजिक है। नागपुर से सटे दूर दराज के गांव से उनके परिचितों को पूना बुलाकर नौकरी व्यवसाय में मदद करना गिरीश को सुकून देना था।

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