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bhootnath by devkinandan khatri

भूतनाथ ने जो कुछ बातें छिपकर सुनीं वह उसके लिए बड़े ही ताज्जुब की थी। हम इस जगह पर यह नहीं कह सकते कि इन बातों को सुनकर भूतनाथ के दिल की क्या अवस्था हुई अथवा इससे उसके दिल पर क्या असर पड़ा, हाँ इतना जरूर मालूम होता है कि इस समय भूतनाथ का दिल उसके काबू में नहीं है और वह बहुत ही बेचैन हो रहा है।

भूतनाथ इस फिक्र में था कि किसी तरह इन दोनों को गिरफ्तार करना चाहिए परन्तु इस समय वह किसी तरह ऐयारी नहीं कर सकता था क्योंकि जिनको वह गिरफ्तार किया चाहता था वे घोड़े पर सवार जा रहे थे और भूतनाथ अपनी असली सूरत में था इसलिए कोई अच्छी कार्रवाई करना बहुत कठिन था परन्तु इस मौके को वह छोड़ भी नहीं सकता था।

कई सायत तक वह खड़ा सोचता और उन दोनों सवारों की तरफ देखता रहा। इस बीच में उस कोई बात याद आ गई, वह झट से एक पेड़ के नीचे बैठ गया और जो कुछ उसे करना था बड़ी तेजी और फुर्ती के साथ किया अर्थात् बटुए में से नकाब निकालकर अपने चेहरे पर लगाई, इसके बाद एक शीशी निकाली जिसमें बहुत-सी गोलियाँ भरी हुई थीं, उनमें से एक गोली निकाल कर अपने मुँह में रखी और दो चिट्ठियाँ जो लिफाफे में बंदर थीं और दो चाँदी की डिबियाएँ निकाल कर जेब में रखने के बाद बटुआ बंद कर उन दोनों सवारों का पीछा किया जो आपस में बातें करते हुए धीरे-धीरे चले जा रहे थे।

थोड़ी ही देर में भूतनाथ उन दोनों सवारों के पास पहुँचा और सामना रोक कर दोनों को सलाम किया, साथ ही जेब में डिबिया और चिट्ठी निकाल कर एक-एक डिबिया और एक-एक चिट्ठी दोनों के हाथ में देते हुए कहा, “एक औरत ने जो अभी-अभी (हाथ का इशारा करके) उस तरफ जा रही है ये चीजें आपको देने के लिए मुझे भेजा है और कहा कि बातचीत करने की धुन में यह डिबिया और चिट्ठी आप लोगों को देना मैं बिलकुल ही भूल गई थी।”

दोनों सवारों ने ताज्जुब के साथ भूतनाथ के हाथ से डिबिया और चिट्ठी ले ली और पूछा, “तम कौन हो और उन्हें कहाँ मिले? वे तो वहाँ हम लोगों के पास अकेली ही आई थी!”

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भूतनाथ : इसका जवाब देना मैं उचित नहीं समझता। जो कुछ काम मेरे सुपुर्द किया गया उसे पूरा कर चुका और जाता हूँ।

एक सवार : ठहरो, ठहरो, इस डिबिया और चिट्ठी को देख तो लेने दो, शायद कुछ जवाब देने की जरूरत पड़े।

भूतनाथ : बहुत अच्छा मैं ठहरता हूँ, आप देख लीजिए।

इतना कहकर भूतनाथ एक किनारे खड़ा हो गया और उन दोनों का तमाशा देखने लगा। उन्होंने पहिले तो डिबिया खोली और देखा कि उसमें नरम मोम की तरह कोई खुशबूदार चीज भरी हुई है। डिबिया खुलने के साथ ही उसके अन्दर की खुशबू ने उन लोगों का दिमाग मुअत्तर कर दिया, यहाँ तक कि उन डिबियों को अच्छी तरह सूंघे बिना उनसे रहा न गया। इसके बाद डिबियाँ बंद करके जेब में रखीं और चिट्ठी खोल कर पढ़ने लगे।

उन चिट्ठियों में कुछ अजीब कुटुंगे हर्फ लिखे हुए थे जो बिलकुल ही समझ में नहीं आते थे। समझ लेना चाहिए कि वे चिट्ठियाँ खाली बारीक लकीरों ही से भरी हुई थीं और केवल लोगों को धोखा देने के लिए भूतनाथ के बटुए में पड़ी रहा करती थी। चिट्ठी पढ़ते-पढ़ते उन्हें देर हो गई मगर फिर भी वे दोनों कुछ समझ न सके, आखिर एक ने भूतनाथ की तरफ देख के कहा, “यह आखिर क्या है?”

भूतनाथ : सो मैं क्या जानूँ!

एक : उसने क्या कहकर तुम्हें हमारे पास भेजा है?

भूतनाथ : कुछ भी नहीं, जो कुछ होगा उसी चिट्ठी में लिखा होगा।

दूसरा : यह चिट्ठी तो पढ़ी ही नहीं जाती!

भूतनाथ : तो मैं क्या करूँ?

पहिला : मालूम होता है कि तू हमसे चालाकी खेलता है!

भूतनाथ : शायद ऐसा ही हो।

इतना कहकर भूतनाथ कई कदम पीछे हट गया और गौर से उन दोनों की तरफ देखने लगा।

भूतनाथ के ढंग और उसकी बातों ने उन दोनों को क्रोधित कर दिया और उन्हें इस बात का शक हो गया कि हो-न हो यह कोई ऐयार है क्योंकि डिबिया के अन्दर की खुशबूदार चीज के सूंघने से उनके ऊपर धीरे-धीरे बेहोशी का असर होता जा रहा था। बातचीत करते-करते यद्यपि दोनों बेकार हो चुके थे तथापि क्रोध में भर अपने को रोक न सके और घोड़ा बढ़ाकर भूतनाथ पर हमला किया। पैंतरा बदलकर भूतनाथ ने उनका वार बचा लिया और इधर-उधर घूम-फिर कर उन दोनों के चक्कर लगाने और शरीर हिलाने का मौका दिया। कुछ ही देर बाद वे अपने को संभाल न सके और दोनों बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़े।

सबके पहिले भूतनाथ ने दोनों घोड़ों पर कब्जा किया और उन्हें किनारे ले जाकर बागडोर के सहारे एक पेड़ के साथ बाँध दिया, इसके बाद बारी-बारी से उन दोनों आदमियों को उठाकर घोड़े के पास ले गया। धीरे-धीरे बड़ी होशियारी मुस्तैदी के साथ भूतनाथ ने उन दोनों को घोड़ों पर रख कर बागडोर से बाँधा और दोनों घोड़ों की लगाम थामे हुए अपने घर का रास्ता लिया। इस समय वह अपनी कार्रवाई पर दिल-ही-दिल में खुश होता हुआ सोच रहा था कि ‘कल इन दोनों के बदले में मैं अपने किसी शागिर्द को लेकर उस औरत से मिलूँगा और देखूँगा कि किस्मत क्या रंग दिखाती है।’

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