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bhootnath by devkinandan khatri

दारोगा को तो भूतनाथ ने ठीक कर लिया और अच्छी तरह धोखे में डालकर उसका दोस्त भी बन बैठा, मगर जब वह दारोगा से बिदा होकर नागर के मकान से बाहर निकला तो उसका ध्यान रामेश्वरचंद्र वाली दुकान की तरफ गया और वह सोचने लगा कि वहाँ मैं हरनामसिंह को कैद कर आया हूँ और अपने को उस पर प्रकट भी कर चुका हूँ, वह इस बात को जान चुका है कि उसे गदाधरसिंह ने कैद किया है, ऐसी अवस्था में मुझे उचित है कि अगर मैं अपने को दारोगा का दोस्त बनाया चाहता हूँ तो हरनामसिंह से भी दोस्ती का ढंग रचूँ और उसके दिल से इस खयाल को दूर कर दूँ कि उसे कैद करने वाला भूतनाथ है।

अगर ऐसा न हुआ तो जब कभी हरनामसिंह छूटेगा और दारोगा के पास पहुँचेगा तो मेरी चालबाजी प्रकट हो जाएगी और दारोगा मुझे झूठा और दगाबाज समझकर मुझसे खटक जाएगा, अस्तु ऐसी तरकीब करनी चाहिए कि हरनामसिंह के दिल में मेरी तरफ से दुश्मनी का खयाल न रहे और उसे विश्वास हो जाय कि मेरा कैद करने वाला भूतनाथ नहीं बल्कि कोई दूसरा ही है।

रास्ते में चलते-ही-चलते भूतनाथ ने इन बातों पर विचार किया और कोई तरकीब सूझ जाने पर पीछे की तरफ लौटे कर पुन: दारोगा से मुलाकात करने के लिए नागर के मकान में घुस गया।

आधे घंटे के बाद जब भूतनाथ अपनी असली सूरत में नागर के मकान के बारह निकला तो तेजी के साथ चलकर सीधा रामेश्वरचंद्र वाली ऐयारी की दुकान में पहुंचा।

अबकी दफे भूतनाथ ने रामेश्वरचन्द्र से मिलने के लिए एक परिचय का शब्द बना लिया था जिसमें किसी तरह का धोखा न हो।

अस्तु सामना होने पर भूतनाथ रामेश्वरचंद्र को एकांत में ले गया और परिचय देने तथा लेने के बाद जो कुछ घटना हुई थी सब बयान करके अंत में बोला, “इस समय मैं इसीलिए यहाँ आया हूँ कि हरनामसिंह को कैद से छुड़ा कर अपना दोस्त बनाऊँ।

यद्यपि मैं अपने हाथ से उसे कैद कर चुका हूँ परन्तु उसे धोखा देने के लिए अच्छा सामान भी अपने साथ लाया हूँ। तुम जल्द ताला खोलकर मुझे उसके पास तहखाने में ले चलो। (कुछ सोच कर) नहीं, मैं अकेला ही उसके पास जाऊँगा।”

इतना कहकर भूतनाथ ने अपना जो कुछ इरादा था और भविष्य में जो कुछ किया चाहता था पुन: रामेश्वरचंद्र ने बयान किया और इसके बाद तहखाने का ताला खोलकर हरनामसिंह के पास पहुँचा और बोला-

भूतनाथ : वाह-वाह हरनामसिंह, तुम इतने बड़े ऐयार होकर इस तरह कैदखाने की हवा खा रहे हो!

हरनामसिंह : यह सब तुम्हारी ही बदौलत है! यद्यपि मैं ऐयार हूँ परन्तु तुम्हारा मुकाबला किसी तरह भी नहीं कर सकता।

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भूतनाथ : भला तुम इस विषय में मुझे क्यों बदनाम करते हो? यद्यपि तुमने मेरे शागिर्द को धोखा देकर भैया राजा के साथ-ही-साथ उसे भी कैद कर लिया था, परन्तु मैंने तुमसे उसका बदला कुछ भी नहीं लिया बल्कि इस समय तुम्हें इस कैद से छुड़ाने के लिए आया हूँ।

हरनामसिंह : यदि तुम वास्तव में गदाधरसिंह हो तो मैंने जो कुछ कहा है वह नि:सन्देह सच है। परन्तु तुम्हारी बातों से मुझे आश्चर्य होता है। तुम खुद अपने हाथ से मुझे कैद कर गये हो और अब कहते हो कि मैं तुम्हें छुड़ाने के लिए आया हूँ!

भूतनाथ : बेशक् तुम्हें आश्चर्य होगा, परन्तु मैं तुम्हारे इस आश्चर्य को अभी-अभी दूर किये देता हूँ। मेरी बातें सुनने से तुम्हें अच्छी तरह संतोष हो जाएगा। मैं कई दिनों के बाद इस दुकान में आया हूँ। रामेश्वरचंद्र से मुलाकात होने पर मुझे सब हाल मालूम हो गया।

भैया राजा और रामेश्वरचंद्र को कैद से छुड़ाने और तुम्हें यहाँ कैद करने वाला वास्तव में भैया राजा का दोस्त दलीपशाह था जिसने अपने को गदाधरसिंह बनाकर तुम्हें धोखे में डाला और अपने मित्र भैया राजा को छुड़ा कर ले गया।

मेरे शगिर्द को इस कैद से छुड़ा कर उसने बेशक् मुझ पर भी अहसान किया परन्तु तुम्हारे ऊपर मेरी शिकायत शुरू से बनी रही है। इस समय मैं दारोगा साहब का काम कर रहा हूँ इसीलिए तुम्हारे साथ भी दोस्ताना ही बर्ताव करना पड़ता है। लो पहिले तुम इस चिट्ठी को पढ़ो।

इतना कहकर भूतनाथ ने हरनामसिंह के हाथ-पैर खोल दिये और दारोगा साहब को लिखी हुई एक चिट्ठी उसके हाथ में दी जिसे उसने चिराग की रोशनी के सामने ले जाकर अच्छी तरह पढ़ा।

हरनामसिंह : इस चिट्ठी के पढ़ने से मुझे विश्वास हो गया कि तुम्हारा कहना ठीक है। नि:सन्देह दारोगा साहब ने बुरा धोखा खाया, परन्तु यदि तुम बराबर उसका साथ दोगे तो उन पर किसी तरह की आँच न आ सकेगी और यह तुम्हारे तथा उन दोनों ही के लिए सौभाग्य की बात होगी।

इस समय जैपाल सिंह का पता लगाना बहुत जरूरी है, अस्तु अब हम तुम जल्द इस तहखाने के बाहर निकलो और मेरे साथ जैपाल की खोज में चलो। मुझे जैपाल का कुछ पता लग भी चुका है अस्तु रास्ते में सब बातें होती रहेंगी और उधर जो कुछ घटना हो चुकी है वह सब मैं तुमसे बयान करूँगा।

हरनामसिंह : मैं हर तरह से तुम्हारा साथ देने के लिए तैयार हूँ।

भूतनाथ : अच्छा तो आओ, मेरे पीछे चले आओ।

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