मुंशी तोताराम संध्या के समय कचहरी से घर पहुंचे, तो निर्मला ने पूछा – उन्हें देखा, क्या हाल है? मुंशी ने देखा कि निर्मला के मुख पर नाम-मात्र को भी चिन्ता का चिह्न नहीं है, उसका बनाव-श्रृंगार और दिनों से कुछ गाढ़ा हुआ है। मसलन वह गले में हार न पहनती थी, पर आज वह भी गले में शोभा दे रहा था। झूमर से भी उसे बहुत प्रेम न था, पर आज बह भी महीन रेशमी साड़ी के नीचे, काले-काले केशों के ऊपर फानूस के दीपक की भांति चमक रहा था।
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मुंशीजी ने मुंह फेरकर कहा – बीमार है, और क्या हाल बताऊं?
निर्मला – तुम तो उन्हें यहाँ लाने गए थे?
मुंशीजी ने झुंझलाकर कहा – वह नहीं आता तो क्या मैं जबरदस्ती उठा लाता – कितना समझाया कि बेटा, घर चलो, वहाँ तुम्हें कोई तकलीफ न होने पाएगी, लेकिन घर का नाम सुनकर उसे दूना ज्वर हो जाता था। कहने लगा – मैं यहाँ मर जाऊँगा, लेकिन घर न जाऊँगा। आखिर मजबूर होकर अस्पताल पहुंचा, और क्या करता?
रुक्मिणी भी आकर बरामदे में खड़ी ही गई, बोली – वह जन्म का हठी है। यहाँ किसी तरह न आएगा और यह भी देख लेना, वहाँ अच्छा भी न होगा!
मुंशीजी ने कातर स्वर में कहा – तुम दो-चार दिन के लिए वहाँ चली जाओ, तो बड़ा अच्छा होगा बहिन! तुम्हारे रहने में उसे तस्कीन होती रहेगी। मेरी, बहिन, मेरी विनय मान लो। अकेले वह रो-रोकर प्राण दे देगा। बस, ‘हाय अम्मा, हाय अम्मा!’ की रट लगाकर रोया करता है। मैं वहीं जा रहा हूं मेरे साथ ही चलो। उसकी दशा अच्छी नहीं। बहिन, वह सूरत नहीं रहे। देखें, ईश्वर क्या करते है?
यह कहते-कहते मुंशीजी की आंखों में आंसू बहने लगे, लेकिन रुक्मिणी अविचलित भाव से बोली – मैं जाने को तैयार हूं। मेरे वहाँ रहने से अगर मेरे लाल के प्राण बच जाये तो मैं सिर के बल दौड़ी जाऊँ, लेकिन मेरी बात गिरह में बांध लो भैया! वहाँ वह अच्छा न होगा। मैं उसे खूब पहचानती हूं। उसे कोई बीमारी नहीं हैं, केवल घर से निकाले जाने का शोक है। यही दुःख ज्वर के रूप में प्रकट हुआ। तुम एक नहीं लाख दवा करो – सिविल सर्जन को ही क्यों न दिखाओ, उसे कोई दवा असर न करेगी।
मुंशीजी – बहिन, उसे घर से निकाला किसने? मैंने तो केवल पढ़ाई के ख्याल से वहाँ भेजा था।
रुक्मिणी – तुमने चाहे जिस ख्याल से भेजा हो; लेकिन यह बात उसे लग गई। मैं तो अब किसी गिनती में नहीं हूं मुझे किसी बात में बोलने का कोई अधिकार नहीं। मालिक तुम, मालकिन तुम्हारी स्त्री। मैं तो केवल तुम्हारी रोटियों पर पड़ी हुई अभागिन विधवा हूं। मेरी कौन सुनेगा और परवाह करेगा? लेकिन बिना बोले रहा नहीं जाता। मंसा तभी अच्छा होगा, जब घर आएगा जब तुम्हारा हृदय वही हो जाएगा, जो पहले था।
यह कहकर रुक्मिणी वहाँ से चली गई। उसकी ज्योतिहीन, पर अनुभवपूर्ण आंखों के सामने जो चरित्र हो रहे थे, उनका रहस्य वह खूब समझती थी; और उसका सारा क्रोध निरपराधिन निर्मला पर ही उतरता था! इस घर की दशा बिगड़ती ही जायेगी। पर उसके प्रकट रूप से न कहने पर भी उसका आशय मुंशीजी से छिपा नहीं रहा। उसके चले जाने पर मुंशीजी ने सिर पर उठा लिया और सोचने लगे। उन्हें अपने ऊपर इस समय इतना क्रोध आ रहा था कि दीवार से सिर पटककर प्राणी का अन्त कर दे। उन्होंने क्यों विवाह किया था? विवाह करने की जरूरत क्या थी? ईश्वर ने उन्हें एक नहीं, तीन तीन पुत्र दिये थे। उनकी अवस्था भी 50 के लगभग पहुंच गई थी, फिर उन्होंने क्यों विवाह किया?
क्या इसी बहाने ईश्वर को उनका सर्वनाश करना मंजूर था? उन्होंने सिर उठाकर एक बार निर्मला की सहास, पर निश्चल मूर्ति देखी और अस्पताल चले गए। निर्मला की सहास छवि ने उनका चित्त शांत कर दिया था। आज कई दिनों के बाद उन्हें यह शांति मयस्सर हुई थी। प्रेम-पीड़ित हृदय इस दशा में क्या इतना शांत और अविचलित रह सकता है? नहीं, कभी नहीं। हृदय की चोट भाव कौशल से नहीं छिपाई जा सकती। अपने चित्त की दुर्बलता पर इस समय उन्हें अत्यन्त क्षोभ हुआ। उन्होंने अकारण ही संदेह को हृदय में स्थान देकर इतना अनर्थ किया। मंसाराम की ओर से भी उनका मन निःशंक हो गया। हां, उसकी जगह अब एक नई शंका उत्पन्न हो गई। क्या मंसाराम भांप तो नहीं गया? क्या भांपकर ही तो आने से इंकार नहीं कर रहा है? अगर वह भांप गया है, तो महान् अनर्थ हो जायेगा। इस कल्पना से ही उनका मन दहल उठा; उनकी देह की सारी हड्डियां मानो इस हाहाकार पर पानी डालने के लिए व्याकुल हो उठी।
उन्होंने कोचवान से घोड़े को तेज चलाने को कहा। कई दिनों के बाद उनके हृदय मण्डल पर छाया धन फट गया था और प्रकाश की लहरें अन्दर से निकलने के लिए व्यग्र हो रही थीं। उन्होंने सिर निकल कर देखा कोचवान सो तो नहीं रहा है। घोड़े की चाल उन्हें इतनी मन्द कभी न मालूम हुई थी। अस्पताल पहुंचकर लपके हुए मंसाराम के पास गए। देखा तो डॉक्टर साहब उसके सामने चिंता में मग्न खड़े थे। मुंशीजी के हाथ-पांव फूल गए। मुंह से शब्द न निकल सका। भरभरायी हुई आवाज में बड़ी मुश्किल से बोले – क्या हाल है डॉक्टर साहब? यह कहते-कहते वह रो पड़े और जब डाक्टर साहब के उनके प्रश्न का उत्तर देने में एक क्षण विलंब हुआ, तब तो उनके प्राण वही समा गए। उन्होंने पलंग पर बैठकर अचेत बालक को गोद में ले लिया देह तवे की तरह जल रही थी। मंसाराम ने एक बार आंखें खोलीं। आह कितनी भयंकर और उसके साथ ही कितनी दीन दृष्टि थी! मुंशीजी ने बालक से कंठ से लगाकर डॉक्टर से पूछा – क्या हाल है डॉक्टर साहब? आप चुप क्यों है?
डॉक्टर ने संदिग्ध स्वर से कहा – हाल जो कुछ है, वह आप देख ही रहे हैं। 106 डिग्री का ज्वर है- और मैं क्या बताऊँ। अभी ज्वर का प्रकोप बढ़ता ही जाता है। मेरे किए जो कुछ हो सकता है, कर रहा हूं। ईश्वर मालिक है। जब से आप गये हैं एक मिनट के लिए भी यहाँ नहीं हिला। भोजन तक नहीं कर सका। हालत इतनी नाजुक है कि एक मिनट में क्या हो जायेगा, नहीं कहा जा सकता। यह महाज्वर है, बिल्कुल होश नहीं है। रह-रहकर डिलिरियम का दौरा सा हो जाता है। क्या घर पर इन्हें किसी ने कुछ कहा है? बार-बार, ‘अम्मा जी तुम कहां हो’ यही आवाज मुंह से निकलती है।
डॉक्टर साहब कह ही रहे थे कि सहसा मंसाराम उठकर बैठ गया और धक्के से मुंशीजी को चारपाई के नीचे ढकेल, उन्मत्त स्वर में बोला – क्यों धमकाते हैं आप? मार डालिए, मार डालिए, अभी मार डालिए! तलवार नहीं मिलती? रस्सी का फन्दा है। या वह भी नहीं? मैं अपने गले में लगा लूंगा। हाय अम्मा, तुम कहां हो? यह कहते कहते वह फिर अचेत होकर गिर पड़ा। मुंशीजी एक क्षण तक मंसाराम की शिथिल मुद्रा की ओर व्यथित नेत्रों से ताकते रहे; फिर सहसा उन्होंने डॉक्टर साहब का हाथ पकड़ लिया और अत्यन्त दीनतापूर्ण आग्रह से बोले – डॉक्टर साहब, इस लड़के को बचा लीजिए, ईश्वर के लिए बचा लीजिए, नहीं तो मेरा सर्वनाश हो जायेगा। मैं अमीर नहीं हूं लेकिन आप जो कुछ कहेंगे, वह हाजिर करूंगा। इसे बचा लीजिए। मैं – मैं सब खर्च दूंगा! इसकी यह दशा नहीं देखी जाती! हाय, मेरा होनहार बेटा!
डॉक्टर साहब ने करुण स्वर में कहा – बाबू साहब, मैं आपसे सत्य कह रहा हूं कि मैं इनके लिए अपनी तरफ से कोई बात उठा नहीं रखा हूं। अब आप दूसरे डॉक्टरों से सलाह लेने को कहते है। अभी डॉक्टर लहरी, डॉक्टर भाटिया और डॉक्टर माथुर को बुलाता हूं। विनायक शास्त्री को भी बुलाए लेता हूं लेकिन मैं आपको व्यर्थ का आश्वासन नहीं देना चाहता – हालत नाजुक है।
मुंशीजी ने रोते हुए कहा – नहीं डॉक्टर साहब, यह शब्द मुँह से न निकालिए। हालत इसके दुश्मनों की नाजुक हो। ईश्वर मुझ पर इतना कोप न करेंगे। आप कलकत्ता और बम्बई के डॉक्टरों को तार दीजिए। मैं जिन्दगी भर आपकी गुलामी करूंगा। यही मेरे कुल का दीपक है। यही मेरे जीवन का आधार है। मेरा हृदय फटा जा रहा है। कोई ऐसी दवा दीजिए, जिससे इसे होश आ जाये! मैं जरा अपने कानों से इसकी बात सुनूं कि इसे क्या कष्ट हो रहा है? हाय मेरा बच्चा!
डॉक्टर – आप जरा दिल को तस्कीन दीजिए! आप बुजुर्ग आदमी हैं, यों हाय-हाय करने और डॉक्टरों की फौज जमा करने से कोई नतीजा न निकलेगा। शांत होकर बैठिए। मैं शहर के डॉक्टरों को बुला रहा हूं देखिए क्या कहते हैं! आप तो खुद ही बदहवास हुए जाते हैं।
मुंशीजी – अच्छा डॉक्टर साहब, मैं अब न बोलूंगा, जबान न खोलूंगा। आप जो चाहे करें, बच्चा अब आपके हाथ में है। आप ही उसकी रक्षा कर सकते है। मैं इतना ही चाहता हूं कि जरा बस होश आ जाये, मुझे पहचान ले, मेरी बातें समझने लगे। क्या कोई ऐसी संजीवनी बूटी नहीं कि मैं इससे दो-चार बातें कर लेता?
यह कहते-कहते मुंशीजी आवेश में आकर मंसाराम से बोले – बेटा, जरा आंखें खोलो, कैसा जी है! मैं तुम्हारे पास बैठा रो रहा हूं। मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं है, मेरा दिल तुम्हारी तरफ से साफ है।
डॉक्टर – फिर आपने अनर्गल बातें करनी शुरू की। अरे साहब, आप बच्चे नहीं है, बुजुर्ग आदमी हैं, जरा धैर्य से काम लीजिए।
मुंशीजी – अच्छा डॉक्टर साहब, अब न बोलूंगा, खता हुई। आप जो चाहे कीजिए। मैंने सब कुछ आप पर छोड़ दिया। कोई उपाय ऐसा नहीं है, जिससे मैं इसे इतना समझा सकूं कि मेरा दिल साफ है? आप ही कह दीजिए, डॉक्टर साहब, कह दीजिए, तुम्हारा अभागा पिता बैठा रो रहा है। उसका दिल तुम्हारी तरफ से बिल्कुल साफ है। उसे कुछ भ्रम हुआ था। वह अब दूर हो गया। बस, इतना ही कह दीजिए। मैं और कुछ नहीं चाहता। मैं चुपचाप बैठा हूं। जबान तक नहीं खोलता; लेकिन आप इतना जरूर कह दीजिए।
डॉक्टर – ईश्वर के लिए बाबू साहब, जरा सब्र कीजिए, वरना मुझे मजबूर होकर आपसे कहना पड़ेगा कि घर जाइए। जरा दफ्तर में जाकर डॉक्टरों को खत लिख रहा हूँ। चुपचाप बैठे रहिए।
निर्दयी डॉक्टर! जवान बेटे की यह दशा देखकर कौन पिता है, जो धैर्य से काम लेगा? मुंशीजी बहुत गंभीर स्वभाव के मनुष्य थे। वह भी जानते थे कि इस समय हाय-हाय मचाने से कोई नतीजा नहीं, लेकिन फिर भी इस समय शांत बैठना उनके लिए असंभव था। अगर देव-गति से वह बीमार होता, तो वह शांत हो सकते थे, दूसरों को समझा सकते थे, खुद डॉक्टरों को बुला सकते थे। लेकिन क्या यह जानकर भी धैर्य रख सकते थे कि यह सब आग उनकी लगायी हुई है? कोई पिता इतना वज्र हृदय हो सकता है? उनका रोम-रोम इस समय उन्हें धिक्कार रहा था। उन्होंने सोचा, मुझे यह दुर्भावना उत्पन्न ही क्यों हुई? मैंने क्यों बिना किसी प्रत्यक्ष प्रमाण के ऐसी भीषण कल्पना कर डाली? अच्छा, मुझे उस दशा में क्या करना चाहिए था? जो कुछ उन्होंने किया, उसके सिवा वह और क्या करते – इसका वह निश्चय न कर सके। वास्तव में विवाह के बन्धन में पड़ना ही अपने पैरों में कुल्हाड़ी मारना था। हां, यही सारे उपद्रव की जड़ है।
मगर यह मैंने कोई अनोखी बात नहीं की। सभी स्त्री-पुरुष विवाह करते हैं। उनका जीवन आनंद से कटता है। आनंद की इच्छा से ही तो हम विवाह करते हैं। मुहल्ले में सैकड़ों आदमियों ने दूसरी, तीसरी, चौथी यहाँ तक कि सातवीं शादियां की हैं और मुझसे भी कहीं अधिक अवस्था में। वह जब तक जिए, आराम ही से जिए। यह भी नहीं हुआ कि सभी स्त्री से पहले मर गए हों। दुल्हन-तिहाज होने पर भी कितने ही रंडुए हो गए। अगर मेरी-जैसी दशा सबकी होती, तो विवाह का नाम ही कौन लेता? मेरे पिताजी ने पचपनवें वर्ष में विवाह किया था और मेरे जन्म के समय उनकी अवस्था साठ से कम न थी। हां, इतनी बात जरूर है कि तब और अब में कुछ अन्तर हो गया है। पहले स्त्रियाँ पढ़ी-लिखी न होती थीं। पति चाहे कैसा ही हो, उसे पूज्य समझती थीं; या यह बात हो कि पुरुष सब कुछ देखकर भी बेहयाई से काम लेता हो; तो युवती क्यों किसी वृद्ध के साथ प्रसन्न रहने लगी।
लेकिन मैं तो कुछ ऐसा बुड्ढा न था। मुझे देखकर कोई चालीस से अधिक नहीं बता सकता। कुछ भी हो, जवानी ढल जाने पर जवान औरत से विवाह कर के कुछ न कुछ बेहयाई जरूर करनी पड़ती है, इसमें सन्देह नहीं। स्त्री स्वभाव से लज्जाशील होती है। कुलटा की बात दूसरी है साधारणतः स्त्री पुरुष से कहीं ज्यादा संयमशील होती है। जोड़ का पति पाकर वह परपुरुष से हंसी दिल्लगी कर ले, उसका मन शुद्ध रहता है। बेजोड़ विवाह हो जाने से वह चाहे किसी की ओर आंखें उठाकर न देखे, पर उसका चित दुःखी रहता है। यह पक्की दीवार है, उसमें सबरी का असर नहीं होता; यह कच्ची दीवार है और उसी वक्त तक खड़ी रहती है जब तक उस पर सवारी न चलायी जाए।
इन्हीं विचारों में पड़े-पड़े मुंशीजी को एक झपकी आ गई। मन के भावों ने तत्काल स्वप्न का रूप धारण कर लिया। क्या देखते हैं कि उनकी पहली स्त्री मंसाराम के सामने कह रही है – स्वामी, यह तुमने क्या किया? जिस बालक को मैंने अपना रक्त पिला-पिलाकर पाला, उसकी तुमने इतनी निर्दयता से मार डाला! ऐसे आदर्श चरित्र बालक पर तुमने इतना घोर कलंक लगा दिया? अब बैठे क्या बिसूरते हो? तुमने उससे हाथ धो लिया! मैं तुम्हारे निर्दयी हाथों से छीन के उसे अपने साथ लिए जाती हूं। तुम तो इतने शक्की कभी न थे। क्या विवाह करते ही शक को भी गले बांध अपमान सहकर जीने वाले कोई बेहया होंगे! मेरा बेटा नहीं सह सकता। यह कहते-कहते उसने बालक को गोद में उठा लिया और चली गई। मुंशीजी ने रोते हुए उसकी गोद से मंसाराम को छीनने के लिए हाथ बढ़ाया, तो आंखें खुल गई और डॉक्टर लहरी, डॉक्टर भाटिया आदि आधे दर्जन डॉक्टर उनके सामने खड़े दिखाई दिए।
