Karbala novel by Munshi Premchand
Karbala novel by Munshi Premchand

चौथा दृश्य: [आधी रात का समय। अब्बास हुसैन के खेमे के सामने खड़े पहरा दे रहे हैं। हुसैन आहिस्ता से आकर खेमे के करीब खड़ा हो जाता है।]

हुर – (दिल में) खुदा को क्या मुंह दिखाऊंगा? किस मुंह से रसूल के सामने जाऊंगा? आह, गुलामी तेरा बुरा हो। जिस बुजुर्ग ने हमें ईमान की रोशनी दी, खुदा की इबादत सिखाई, इंसान बनाया, उसी के बेटे से जंग करना मेरे लिये कितनी शर्म की बात है। यह मुझसे न होगा। मैं जानता हूं, यजीद मेरे खून का प्यासा हो जायेगा, मेरी जागीर छीन ली जाएगी, मेरे लड़के रोटियों के मुहताज हो जायेंगे, मगर दुनिया खोकर रसूल की निगाह का हकदार हो जाऊंगा। मुझे न मालूम था कि यजीद की बैयत लेकर मैं अपनी आक़बत बिगाड़ने पर मजबूर किया जाऊंगा।

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अब यह जान हजरत हुसैन पर निसार है। जो होना है, हो। यजीद की खिलाफत पर कोई हक नहीं। मैंने उसकी बैयत लेने में खास गलती की। उसके हुक्म की पाबंदी मुझ पर फ़र्ज नहीं। खुदा के दरबार में मैं इसके लिये गुनहगार न ठहरूंगा।

[आगे बढ़ता है।]

अब्बास – कौन है? खबरदार, एक कदम आगे न बढ़े, वरना लाश जमीन पर होगी।

हुर – या हजरत, आपका गुलाम हुर हूं। हजरत हुसैन की खिदमत में कुछ अर्ज करना चाहता हूं।

अब्बास – इस वक्त वह आराम फरमा रहे हैं।

हुर – मेरा उनसे इसी वक्त मिलना जरूरी है।

अब्बास – (दिल में) दगा का अंदेशा तो नहीं मालूम होता। मैं भी इसके साथ चलता हूं। जरा भी हाथ-पांव हिलाया कि सिर उड़ा दूंगा। (प्रकट) अच्छा, जाओ।

[अब्बास खेमे से बाहर हुसैन को बुला लाते हैं।]

हुर – या हजरत, मुआफ कीजिएगा। मैंने आपको नावक्त तकलीफ दी। मैं यह अर्ज करने आया हूं कि आप कूफ़ा की तरफा न जाये। रात का वक्त है, मेरी फौज सो रही है, आप किसी दूसरे तरफ चले जाये। मेरी यह अर्ज कबूल कीजिए।

हुसैन – हुर, यह अपनी जान बचाने का मौका नहीं, इस्लाम की आबरू को कायम रखने का सवाल है।

हुर – आप यमन की तरफ चले जायें, तो वहां आपको काफी मदद मिलेगी। मैंने सुना है, सुलेमान और मुख्तार वहां आपकी मदद के लिये फौज जमा कर रहे हैं।

हुसैन – हुर, जिस लालच ने कूफ़ा के रईसों को मुझसे फेर दिया, क्या वह यमन में अपना असर न दिखाएगा? इंसान की गफ़लत सब जगह एक-सी होती है। मेरे लिए कूफ़ा के सिवा दूसरा रास्ता नहीं है। अगर तुम न जाने दोगे, तो जबरदस्ती जाऊंगा। यह जानता हूं कि वहीं मुझे शहादत नसीब होगी। इसकी खबर मुझे नाना की जबान मुबारक से मिल चुकी है। क्या खौफ़ से शहादत के रुतबे को छोड़ दूं?

हुर – अगर आप जाना ही चाहते हैं, तो मस्तूरात को वापस कर दीजिए।

हुसैन – हाय, ऐसा मुमकिन होता, तो मुझसे ज्यादा खुश कोई न होता। मगर इनमें से कोई भी मेरा साथ छोड़ने पर तैयार नहीं है।

[किसी तरह से ऊँ ऊँ की आवाज आ रही।]

हुर – या हजरत, यह आवाज कहां से आ रही है? इसे सुनकर दिल पर रोब तारी हो रहा है।

[एक योगी भभूत रमाए, जटा बढ़ाए, मृग-चर्म कंधे पर रखे हुए आते हैं।]

योगी – भगवन्! मैं उस स्थान को जाना चाहता हूं, जहां महर्षि मुहम्मद की समाधि है।

हुसैन – तुम कौन हो? यह कैसी शक्ल बना रखी है?

योगी – साधु हूं। उस देश से आ रहा हूं, जहां प्रथम ओंकार-ध्वनि की सृष्टि हुई थी। महर्षि मुहम्मद ने उसी ध्वनि से संपूर्ण जगत को निनादित कर दिया है। उनके अद्वैतवाद ने भारत के समाधि-मग्न ऋषियों को भी जागृति प्रदान कर दी है। उसी महात्मा की समाधि का दर्शन करने के लिए मैं भारत से आया हूं, कृपा कर मुझे मार्ग बता दीजिए।

हुसैन – आइए, खुशनसीब कि आपकी जियारत हुई। रात का वक्त है अंधेरा छाया हुआ है। इस वक्त यहीं आराम कीजिए। सुबह मैं आपके साथ अपना एक आदमी भेज दूंगा।

योगी – (गौर से हुसैन के चेहरे को देखकर) नहीं महात्मन् मेरा व्रत है कि उस पावन भूमि का दर्शन किए बिना कहीं विश्राम न करूंगा। प्रभो, आपके मुखारविंद पर भी मुझे उसी महर्षि के तेज का प्रतिबिंब दिखाई देता है। आप उनके आत्मीय हैं?

हुसैन – जी हां, उनका नवासा हूं। मगर आपने नाना को देखा ही नहीं, फिर आपको कैसे मालूम हुआ कि मेरी सूरत उनसे मिलती है?

योगी – (हंसकर) भगवन्! मैंने उनका स्थूल शरीर नहीं देखा, पर उनके आत्मशरीर का दर्शन किया है। आत्मा द्वारा उनकी पवित्र वार्ता सुनी है। में प्रत्यक्ष देख रहा हूं कि आप में वहीं पवित्र आत्मा अवतरित हुई है। आज्ञा दीजिए, आपके चरण-रज से अपने मस्तक को पवित्र करूं।

हुसैन – (पैरों को हटाकर) नहीं-नहीं, मैं इंसान हूं और रसूल पाक की हिदायत है कि इंसान को इंसान की इबादत वाज़िब नहीं।

योगी – धन्य है! मनुष्य के ब्रह्मत्व का कितना उच्च आदर्श है! यह ज्ञान-ज्योति, जो इस देश से उद्भाषित हुई है, एक दिन समस्त भूमंडल को आलोकित करेगी, और देश-देशांतरों में सत्य और न्याय का मुख उज्ज्वल करेगी। हां, इस महार्षि की संतान न्याय-गौरव का पालन करेगी। अब मुझे आज्ञा दीजिए, आपके दर्शनों से कृतार्थ हो गया।

[योगी चला जाता है]

हुसैन – अब मुझे मरने का गम नहीं रहा। मेरे नाना की उम्मत हक और इंसाफ की हिमायत करेगी। शायद इसीलिए रसूल ने अपनी औलाद को हक पर कुर्बान करने का फैसला किया है। हुर, तुमने इस फकीर की पेशगोई सुनी?

हुर – या हज़रत, आपका रुतबा आज जैसा समझा हूं, ऐसा कभी न समझा था। हुजूर, रसूल पाक से मेरे हक़ में दुआ करें कि मुझ रूहस्याह के गुनाह मुआफ़ करें।

[चला जाता है]

हुसैन – अब्बास, अब हमें कूफ़ावालों को अपने पहुंचने की इत्तिला देनी चाहिए।

अब्बास – वजा है।

हुसैन – कौन जा सकता है?

अब्बास – सैदावी को भेज दूं?

हुसैन – बहुत अच्छी बात है।

[अब्बास सैदावी को बुला लाते हैं।]

अब्बास – सैदावी, तुम्हें हमारे पहुंचाने की खबर लेकर कूफा जाना पड़ेगा। यह कहने की जरूरत नहीं कि यह बड़े खतरे का काम है।

सैदावी – या हजरत, जब आपकी मुझ पर निगाह है, तो फिर खौफ़ किस-किस बात का।

हुसैन – शाबाश, यह खत लो, और वहां किसी ऐसे सरदार को देना, जो रसूल का सच्चा बंदा हो। जाओ, खुदा तुम्हें खैरियत से ले जाये।

[सैदावी जाता है।]

हुसैन – (दिल में) सैदावी, जाते हो, मगर मुझे शक है कि तुम जिंदा लौटोगे! तुमने जिसे न दीन की हिफ़ाजत का ख्याल है, न हक़ का, जिसे दुश्मनों ने चारों तरफ़ से घेर नहीं रखा है, जिसको शहीद करने के लिए फौजें नहीं जमा की जा रही हैं, जो दुनिया में आराम से जिंदगी बसर कर सकता है, महज वफ़ादारी का हक़ अदा करने के लिए जान-बूझकर मौत के मुंह में कदम रखा है, तो मैं मौत से क्यों डरूं।

[गाते हैं।]

मौत का क्या उसको हैं, जो मुसलमां हो गया,

जिसकी नीयत नेक हैं, जो सिदकू ईमां हो गया।

कब दिलेरों को सताए फ़िक्र जर और खौफ़ जो,

अज्म सादिक उसका है, जो पाक दामा हो गया।

क्यों नदामत हो मुझे, दुनिया में गर जिंदा रहा,

जाय गम क्या है, जो नज़रे-तेग बुर्रा हो गया।

हो अदू दुनिया में रुसवा, आखिरत में गम नसीब,

मुनहरिफ दीं से हुआ, औं’ नंग-दौरां हो गया।

पांचवां दृश्य: [रात का समय। हुसैन अपने खेमे में सोए हुए हैं। वह चौंक पड़ते हैं, और लेटे हुए, चौकन्नी आंखों से, इधर-उधर ताकते हैं।]

हुसैन – (दिल में) यहां तो कोई नजर नहीं आता। मैं हूं, शमा है, और मेरा धड़कता हुआ दिल है। फिर मैंने आवाज किसकी सुनी! सिर में कैसा चक्कर आ रहा है। जरूर कोई था। ख्वाब पर हकीकत का धोखा नहीं हो सकता। ख्वाब के आदमी शबनम के परदे में ढकी हुई तस्वीरों की तरह होते हैं। ख्वाब की आवाजें जमीन के नीचे से निकलने वाली आवाजों की तरह मालूम होती है। उनमें यह बात कहां! देखूं, कोई बाहर तो खड़ा नहीं है। (खेमे से बाहर निकलकर) उफ् कितनी गहरी तारीकी है, गोया मेरी आँखों ने कभी रोशनी देखी ही नहीं। कैसा गहरा सन्नाटा है, गोया सुनने की ताकत ही से महरूम हूं। गोया यह दुनिया अभी-अभी अदम के गार से निकली है (प्रकट) कोई है।

[अली अकबर का प्रवेश]

अली० – हाज़िर हूं, अब्बाजान, क्या इरशाद है?

हुसैन – यहां से अभी कोई सवार तो नहीं गुजरा है?

अली० – अगर मेरे होश-हवास बजा हैं, तो इधर कोई जानदार नहीं गुजरा।

हुसैन – ताज्जुब है, अभी लेटा हुआ था, और जहां तक मुझे याद है, मेरी पलकें तक नहीं झपकीं, पर मैंने देखा, एक आदमी मुश्की घोड़े पर सवार सामने खड़े होकर मुझसे कह रहा है कि ‘ऐ हुसैन! इराक जाने की जल्दी कर रहे हो, और मौत तुम्हारे पीछे-पीछे दौड़ी जा रही है।’ बेटा, मालूम हो रहा है, मेरी मौत करीब है!

अली० – बाबा, क्या हम हक़ पर नहीं हैं?

हुसैन – बेशक, हम हक़ पर हैं, तो मौत का क्या डर। क्या परवा, अगर हम मौत की तरफ जायें या मौत हमारी तरफ आए।

हुसैन – बेटा, तुमने दिल खुद कर दिया। खुदा तुमको वह सबसे बड़ा इनाम दे, जो बाप बेटे को दे सकता है।

[जहीर, हबीब, अब्दुल्ला, कलबी और उसकी स्त्री का प्रवेश]

अली० – कौन इधर से जा रहा है?

जहीर – हम मुसाफिर हैं। ये खेमे क्या हजरत हुसैन के हैं?

अली० – हां।

जहीर – खुदा का शुक्र है कि हम मंजिल-मक़सूद पर पहुंच गए। हम उन्हीं की जियारत के लिए कूफ़ा से आ रहे हैं।

हुसैन – जिसके लिए आप कूफ़ा से आ रहे हैं, वह खुद आपसे मिलने के लिए कूफा जा रहा है। मैं ही हुसैन बिन अली हूं।

जहीर – हमारे जहे-नसीब कि आपकी जियारत हुई। हम सब-के-सब आपके गुलाम हैं। कूफ़ा में इस वक्त दर व दीवार आपके दुश्मन हो रहे हैं। आप उधर क़स्द न फरमाएं। हम इसलिए चले आए हैं कि वहां रहकर आपकी कुछ खिदमत नहीं कर सकते। हमने हज़रत मुसलिम के कत्ल का खूनी नज़ारा देखा है, हानी को क़त्ल होते देखा है, और गरीब तौआ की चोटियां कटते देखी है। जो लोग आपकी दोस्ती का दम भरते थे, वे आज जियाद के दाहिने बाजू बने हुए है।

हुसैन – खुदा उन्हें नेक रास्ते पर लाए। तकदीर मुझे कूफ़ा लिए जाती है, और अब कोई ताकत मुझे वहां जाने से रोक नहीं सकती। आप लोग चलकर आराम फरमाएं। कल का दिन मुबारक होगा, क्योंकि मैं उस मुकाम पर पहुंच जाऊंगा, जहां शहादत मेरे इंतजार में खड़ी है।

[सब जाते हैं]